KADLI KE PAAT कदली के पात

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आओ प्रेम-प्रेम खेलें

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आओ प्रेम-प्रेम खेलें

AAO PREM PREM KHELEN

राम कृष्ण खुराना


पवित्र गुरुवाणी में लिखा है कि –

जऊ तऊ प्रेम खेलण का चाऊ,

सिर धरी तली गली मेरी आऊ !

इतु मारगि तुम पैर धरीजै,

सिर दीजै, काण न कीजै !!

अर्थात – यदि तुम्हें प्रेम खेलने का चाव है तो…. ! तो…?…तो… ?? तो क्या ??? यह क्या ? प्रेम-प्रेम खेलने के लिए शर्त ? जी हां ! वाणी में कहा है कि यदि तुम प्यार करना चाहते हो तो… अब यहां “यदि” और “तो” शब्द आ गए तो इसका सीधा सा अर्थ है कि इसमें कोई न कोई शर्त तो अवश्य ही होगी ! वाणी कहती है… तो  तुम्हें प्यार की शर्त माननी होगी ! तुम्हें प्रेम के खेल के नियमों के अनुसार ही प्रेम का खेल खेलना पडेगा ! तुम्हें कुछ बंधनों का पालन करना होगा ! तुम्हें एक सीमा के अंदर रह कर ही प्यार करना होगा ! इस संसार को चलाने के लिए भी तो कुछ नियम बनाए गए हैं ! इस देश का कार्य सुचारु रूप से चल सके उसके लिए भी कुछ कानून लागू किए गए हैं ! तभी दुनिया का, देश का काम ठीक ढंग से चल रहा है ! फिर प्यार के लिए भी तो कोई शर्त, कोई कानून, कोई नियम होना ही चाहिए ! एक गीत याद आ गया -कोई शर्त होती नहीं प्यार में, मगर प्यार शर्तों में तुमने किया !” यहां भी प्यार शर्तों में ? प्यार करने के लिए शर्त लगा दी ! कहते हैं कि प्यार किया नहीं जाता हो जाता है ! इसके अनुसार यदि तुम्हें प्यार हो गया है ! अगर तुम इस डगर पर चलना चाहते हो, इस हाई-वे पर आगे बढना चाहते हो, इस मार्ग को अपनाना चाहते हो, तो तुम्हें प्यार पाने की शर्त को मंज़ूर करना होगा ! तुम्हें प्यार की शर्त के लिए हां…हां…हां…कहना होगा ! तभी तुम प्यार कर सकोगे, प्यार को निभा सकोगे, प्यार में आगे बढ सकोगे, प्रेम पा सकोगे ! मगर प्रेम-प्रेम खेलने के लिए शर्त क्या है ? प्यार का खेल खेलने के नियम क्या हैं ?  प्यार पाने के लिए क्या करना पडेगा ?

इसका उत्तर वाणी की दूसरी लाईन ‌- सिर धरी तली गली मेरी आऊ ! कितनी बडी बात लिख दी है वाणी में ! कितनी गहरी बात ! कितनी अनोखी बात ! जऊ तऊ प्रेम खेलण का चाऊ, सिर धरी तली गली मेरी आऊ ! अर्थात अगर तुम प्रेम का खेल खेलना चाहते हो तो अपना सिर अपनी हथेली पर रख कर मेरी गली में आओ ! यह शर्त है प्रेम का खेल खेलने की ! प्रेम-प्रेम खेलने की ! प्रेम करने की ! सिर्फ वाणी ही ऐसा नहीं कहती ! और लोग भी प्यार-प्यार खेलने के लिए कुछ ऐसी ही शर्त लगा रहे हैं -

ये बाडी है प्रेम की, खाला का घर नाहिं ।
सीस उतारो भूइं धरो, फिर पैठो घर माहि ।!

यह प्रेम की बाडी है, प्रेम का खेत है, प्रेम का आंगन है, प्रेम का घर है ! तुम्हारी खाला का घर नहीं ! तुम्हारी जायदाद नहीं ! तुम्हारी मलकीयत नहीं ! यदि तुम इस घर में आना चाहते हो, यदि तुम इस घर के सदस्य बनना चाहते हो, यदि तुम इस घर में पनाह लेना चाहते हो, तो पहले अपना सिर उतार कर धरती पर रख दो ! जमीन पर रख दो ! अपने आप को मिटा दो ! अपने “मैं” को खत्म कर दो ! अपने अंहकार को समाप्त कर दो ! अभिमान को छोड दो ! किसी ने कहा भी है -

मिटा दे अपनी हस्ती को, अगर कुछ मरतबा चाहे !

कि दाना खाक में मिलकर गुले गुलज़ार होता है !!

दाने को, बीज को, गुले गुलज़ार होने के लिए, फलने-फूलने के लिए, एक बडा पेड बनने के लिए, पहले खाक में मिलना पडता है ! मिट्टी में मिलना पडता है ! अपनी हस्ती को, अपनी इज़्ज़त को, अपनी मान-मर्यादा को मिटाना पडता है ! तब जाकर कुछ मरतबा मिलता है, कुछ इज़्ज़त मिलती है, कुछ मान मिलता है ! इसी तरह से अगर तुम प्यार पाना चाहते हो तो पहले तुम्हें अपने आप को मिटाना होगा ! अपना अंहकार छोडना होगा ! यदि तुम्हारा अंहकार शेष है, यदि तुम में इगो का भाव है ! यदि तुम्हें अपने आप पर घमंड है ! यदि तुम यह मानते हो कि तुम भी कुछ हो, तो प्यार को पाने का सपना मत देखो ! तुम प्यार नहीं पा सकते ! क्योंकि अंहकार प्यार के बीच की बहुत बडी दीवार है !

कबीर ने भी कहा है –

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय !

राजा परजा जेहि रुचे, सीस देई ले जाय ।

प्रेम को पाने के लिए तो सिर देना ही पडेगा ! क्योंकि यह कोई खेत में उगने वाली सब्ज़ी नहीं है ! मैदान में उगने वाला अनाज नहीं है ! हाट-बाजार में बिकने वाली जिंस नहीं है ! दुकान पर बिकने वाली वस्तु नहीं है ! किसी शो-रुम से खरीदा जाने वाला प्रोडक्ट नहीं है ! यहां बडे-छोटे का सवाल भी नहीं है ! आप राजा हैं या प्रजा ! आप मालिक हैं या नौकर ! आप अमीर हैं या गरीब ! आप पुरुष हैं या स्त्री ! कोई बात नहीं ! कोई हर्ज नहीं ! कोई फर्क नहीं ! सबके लिए एक ही नियम है ! एक ही कानून है ! एक ही शर्त है ! जो भी प्रेम-प्रेम खेलना चहता हो ! जिसको भी यह खेल पसंद हो ! जिसको भी यह रुचिकर लगे इसकी कीमत देकर ले जाय ! जी हां, कीमत देकर ले जाय ! अपना सीस, अपना सिर दे कर ले जाय !

आगे बढते हैं – इतु मारगि तुम पैर धरीजै !

यदि तुम इस मार्ग पर पैर रखना चाहते हो तो …..

मोहब्बत की राहों पे चलना सम्भल के !

उपनिषद् कहती है - क्षुरस्य धार इव निशिता दुरत्यया !

अर्थात – यह तेज छुरे की धार पर चलने जैसा दुष्कर है ।

क्योंकि इस आग के दरिया में डूब के जाना है ! डूबने की शर्त पहले है ! डूबने का डर मन में रख कर इस दरिया में कूदना होगा ! और दरिया ? दरिया भी आग का ! तैर कर निकल गए तो उस पार, नहीं तो बंटा धार ! यां बाबू रेल में यां जेल में ! यह कैसा रास्ता है ! यह कैसा मार्ग है ! यह कैसी सडक है ! कहते हैं कि प्रेम की गली बहुत संकरी होती है ! पथरीली होती है ! कांटों भरी होती है ! शायद इश्के मजाजी से इश्के हकीकी यानि कि लौकिक प्रेम से पारलौकिक प्रेम को पाने का रास्ता ! शारीरिक प्रेम से आत्मा का मिलन ! जब प्रेम की आवाज़ खुदा की दरगाह तक पहुंच जाती है ! जब प्रेम स्वयं इश्वर बन जाता है ! मन की सबसे उत्तम अवस्था में पहुंच जाता है ! उस समय मार लैला को पडती है मगर उस मार की लाश मजनू के हाथ पर दिखाई देती है ! कोडे लैला पर बरसाये जाते हैं परंतु उन कोडों की मार की पीडा, उसका दर्द मजनू को होता है ! यह है इश्क हकीकी ! यह है पारलौकिक प्रेम ! प्रेम का सच्चा रास्ता ! प्रेम का सही मार्ग ! सच्चा प्रेमी क्रांतिकारी होता है ! बलिदानी होता है ! त्यागी होता है ! हार न मानने वाला होता है ! इस प्रेम में वफादारी की शर्त है ! इस प्रेम को आप समझौते या एग्रीमेंट की तरह नहीं ले सकते । यह प्रेम शरीर के आकर्षण से ऊपर उठ जाता है !

अंत में गुरुवाणी में कहा है – सिर दीजै, काण न कीजै !

हैं ??? यह क्या बात हुई ! यह क्या कह दिया ? इतु मारगि तुम पैर धरीजै, सिर दीजै काण न कीजै ! यह तो युद्ध की भाषा है ! यह तो लडाई के मैदान का खेल है ! यह प्रेम की भाषा तो नहीं ! यह प्यार का खेल तो नहीं ! क्या प्यार इसी को कहते हैं ?  क्या प्यार ऐसे ही किया जाता है ? मां अपने वीर पुत्र को युद्ध के लिए भेजते हुए उसे मां के दूध की लाज रखने के दुहाई देती है ! एक सुहागन अपने पति को ताकीद करती है कि सीने पर गोली खाना पीठ दिखा कर मत आना ! प्रेम भी युद्ध हो गया ! प्रेम और युद्ध के नियम एक ही समान हो गए ! हां यही सच है ! जहर का प्याला राणा जी भेजा, पीवत मीरा हांसी रे ! युद्ध करो तो युद्ध के नियमों को मानो ! प्यार करते हो तो प्यार की शर्त पूरी करो ! सिर कट जाय परवाह नहीं सिर झुकना नहीं चाहिए ! सिर दे दो पर पीठ मत दिखाओ !

जऊ तऊ प्रेम खेलण का चाऊ, सिर धरी तली गली मेरी आऊ ! इतु मारगि तुम पैर धरीजै, सिर दीजै, काण न कीजै !

अर्थात अगर तुम प्यार का खेल खेलना चाहते हो तो अपना सिर अपनी हथेली पर रख कर आओ ! इस मार्ग पर पैर रखने के बाद फिर सिर भले ही चले जाय पर पीठ मत दिखाना !

राम कृष्ण खुराना

9988950584

khuranarkk@yahoo.in

R K KHURANA

A-426, MODEL TOWN EXTN.

LUDHIANA (PUNJAB) INDIA



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50 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

JLSINGH के द्वारा
March 4, 2011

आपके इस अतुलनीय लेख को पढ़कर मैं तो मंत्रमुग्ध हो गया. क्या प्रतिक्रिया दूं समझ न पाया. विधाता ने क्यों एक ही मन बनाया. दशशीस, बीशभुजा, अष्टभुजा, चतुर्मुख सुना पर मन तो बस एक ही सुना. खुराना साहब, आपको शत शत नमन.

    R K KHURANA के द्वारा
    March 5, 2011

    प्रिय जे एल सिंह जी, सही कहा आपने ! इश्वर मन केवल एक ही बनाया है ! दस बीस नहीं ! आपको मेरे लेख “आओ प्रेम-प्रेम खेलें” ने मन्त्र मुग्ध कर दिया ! मेरे लिखने का मकसद पूरा हो गया ! आपको प्रतिक्रिया के लिए कोटिश धन्यवाद ! राम कृष्ण खुराना

maninder baath के द्वारा
February 15, 2011

respected khuranaji, मुझे आप की रचना कोई शिकायत नहीं बहुत पसंद आई है |

    R K KHURANA के द्वारा
    February 15, 2011

    प्रिय मनिन्द्र जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! ऐसे ही स्नेह बने रखें ! आर के खुराना

February 11, 2011

आदरणीय खुराना जी प्रणाम, आपके मेल लगातार मिल रहे हैं और आपके लेख भी पढ़ रहा हूँ पर समयाभाव के कारण प्रतिक्रिया नहीं दे पाता हूँ. वैसे भी आपको कमेन्ट करना सूरज को दिया दिखाना ही होगा. अगर समय मिले तो इस नाचीज के लेख पर भी नजर डालियेगा. धन्यवाद. http://rpraturi.jagranjunction.com/2011/02/10/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7-%e0%a4%9f%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%95%e0%a5%87/

    R K KHURANA के द्वारा
    February 11, 2011

    प्रिय राजेन्द्र जी आप सभी लोग मुझे इतना प्यार देते हैं की मैं उसका ऋण नहीं उतार सकता ! आप लोगो को मेरी रचनाये अच्छी लगती है ! मेरा लिखना सार्थक हो जाता है ! आप के रचना पढ़ का मैं अपनी प्रतिक्रिया दुगना ! धन्यवाद् सहित आर के खुराना

Nikhil के द्वारा
February 11, 2011

आदरणीय खुराना अंकल, आपने तो खेल-खेल में प्यार जैसे जटिल शब्द की व्याख्या कर दी, इस प्रभावकारी लेख के लिए आपको बधाई.

    R K KHURNA के द्वारा
    February 11, 2011

    प्रिय निखिल जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद आर के खुराना

meesa.v.singh के द्वारा
February 10, 2011

khurana ji namaskar ”udhoo man na bhaye das- bees , ek huto so gayo shyam sang ko aaradhr ish” sundar rachna ke liye thank u . contest ke liye hardik shubhkamnaye iswar aap ko safal banaye

    R K KHURANA के द्वारा
    February 10, 2011

    प्रिय सिंह साहेब, सही कहा है आपने मन दस बीस नहीं है ! मन तो एक ही है और वो किसी एक को ही दिया जा सकता है ! आपकी शुभकामनायों के लिए धन्यवाद ! आर के खुराना

Ramesh bajpai के द्वारा
February 10, 2011

आदरणीय भाई जी इस प्रेम गंगा में सचमुच सराबोर हो गया | आध्यात्मिक रस की फुहारे आनन्दित कर गयी | बहुत बहुत बधाई , हार्दिक शुभ कामनाये |

    R K KHURANA के द्वारा
    February 10, 2011

    प्रिय रामेशे जी, बहुत दिनों के बाद आपकी प्रतिक्रिया मिली ! कहाँ थे आप ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद खुराना

    GULSHAN के द्वारा
    February 16, 2011

    आदरणीय अंकल जी, चरण सपरश    आपकी  सभी  कवीताऔ   कै माघयम  से  हमे याद करते है आपका  बहूत-2 घऩयवाद           आपकागुलशन

    R K KHURANA के द्वारा
    February 16, 2011

    प्रिय गुलशन जी, मैं आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत आभारी हूँ ! धन्यवाद् आर के खुराना

NAVEEN KUMAR SHARMA के द्वारा
February 10, 2011

चाचा जी नमस्ते, चाचा जी आपने प्रेम को बहुत ही अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है लेकिन ये सत्य आज के समाज के बिचारों से बहुत दूर है चाचा जी इस कांटेस्ट के लिए हार्दिक बधाई इस कांटेस्ट में आप ही विनर रहेंगे ऐसा मेरा विश्वास है. नवीन कुमार शर्मा इस्लामनगर रोड बहजोई ( मुरादाबाद) उ. प्र. मोबाइल नंबर – 09719390576

    R K KHURANA के द्वारा
    February 10, 2011

    प्रिय नवीन जी, मेरी रचना आओ प्रेम प्रेम खेलें के लिए आपका स्नेह मिला ! आपकी शुभकामनायों के लिए मैं आपका आभारी हूँ ! धन्यवाद सहित खुराना

allrounder के द्वारा
February 9, 2011

आदरणीय खुराना साहब एक बार फिर से सशक्त लेख पर बधाई ! लगता है पिछली बार की तरह इस बार भी बारात की शोभा आप ही बढाने वाले हैं, मेरी हार्दिक शुभकामनाये आपके साथ हैं …….

    R K KHURANA के द्वारा
    February 9, 2011

    प्रिय सचिन जी, आप लोगो के प्यार ने ही मुझे \\"आओ प्रेम प्रेम खेलें” लिखने के लिए होसला दिया है ! मैं आप लोगो के स्नेह को कभी नहीं भूल सकता ! शुभकामनायों के लिए धन्यवाद ! खुराना

nishamittal के द्वारा
February 9, 2011

आपके सारगर्भित लेख की जितनी प्रशंसा की जाय कम है.शुभकामनाएं.अच्छे लेख के लिए बधाई स्वीकार करें.

    R K KHURANA के द्वारा
    February 9, 2011

    सुश्री निशा जी, मेरी रचना “आओ प्रेम प्रेम खेलें” के लिए आपका स्नेह मिला ! आभार ! कृपया ऐसे ही स्नेह बनाये रखें खुराना

HIMANSHU BHATT के द्वारा
February 9, 2011

खुराना जी….. नमस्कार…. बहुत अच्छा लेख प्रस्तुत किया है….. प्रेम की वृहद् व्याख्या….. से सराबोर…. गूढ़ लेख…. धन्यवाद….

    R K KHURANA के द्वारा
    February 9, 2011

    प्रिय हिमांशु जी, मेरे लेख “आओ प्रेम प्रेम खेलें” पर आपकी प्रतिक्रिया मिली ! बहुत बहुत धन्यवाद खुराना

Bhagwan Babu के द्वारा
February 8, 2011

खुराना जी नमस्कार ये सारी बाते तो गुरुवाणी की है, इस पर कुछ कटाक्ष नही किया जा सकता, क्योकि ये बिल्कुल सत्य है, लेकिन ये सत्य आज भी इस समाज से, समाज के विचारो से बहुत दूर है केवल किताबो मे रहे ये बात तो अच्छी नही लगती, आप और हम कुछ ऐसा करें जिससे प्रेम की ये परिभाषा सभी लोगों को समझ मे भी आ जाये और लागू भी हो जाये धन्यवाद http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2011/02/07/%e0%a4%b8%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e2%80%93-valentine-contest/

    R K KHURANA के द्वारा
    February 8, 2011

    प्रिय भगवान् बाबु जी, आपने सत्य कहा है की आजकल वैसा प्यार देखने को नहीं मिलता ! केवल कागजी बातें रह गयी है ! लेकिन पुरानी यादे ताज़ा हो जाती है ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद खुराना

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 8, 2011

आदरणीय खुराना जी……. प्रेम को बहुत सुंदर तरीके से प्रस्तुत करने के लिए बधाई… इस कॉन्टेस्ट के लिए हार्दिक शुभकामनाये ………….

    R K KHURANA के द्वारा
    February 8, 2011

    प्रिय पियूष जी, आपके प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद ! खुराना

आर.एन. शाही के द्वारा
February 8, 2011

आदरणीय खुराना साहब, गुरुवाणी के उद्धरण की व्यापकता दर्शाता प्रेम पर आपका यह आलेख विलक्षण है । सच्चे प्यार में स्वार्थ, मान और सौदा का अस्तित्व नहीं होता । यदि इनका अस्तित्व है, तो फ़िर वह प्रेम कम, नाटक का मंचन अधिक होता है । उत्प्रेरक रचना के लिये बधाई ।

    R K KHURANA के द्वारा
    February 8, 2011

    प्रिय श्री शाही जी, बहुत दिनों के बाद आपके दर्शन हुए ! आपकी सेहत कैसी है ! “आओ प्रेम प्रेम खेलें” रचना पर आपकी प्रतिक्रिया मिली ! मैं आपका दिल से आभारी हूँ ! खुराना

chaatak के द्वारा
February 8, 2011

आदरणीय खुराना जी, प्रेम के सारे अलौकिक पक्षों को एक साथ पिरो कर प्रस्तुत करने पर आपको धन्यवाद एवं बधाई!

    R K KHURANA के द्वारा
    February 8, 2011

    प्रिय चातक जी, मेरी रचना “आओ प्रेम प्रेम खेलें” पर आपका स्नेह मिला ! आभार खुराना

s.p.singh के द्वारा
February 8, 2011

आदरणीय खुराना जी अच्छे लेख पर आपको बधाई —

    R K KHURANA के द्वारा
    February 8, 2011

    प्रिय श्री सिंह साहेब, आपका स्नेह मिला ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका आभारी हूँ ! खुराना

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 8, 2011

आदरणीय श्री खुराना जी, आपके लिखे लेख की एक बात मुझे बहुत अच्छी लगी की… “तुम प्यार का खेल खेलना चाहते हो तो अपना सिर अपनी हथेली पर रख कर आओ ! इस मार्ग पर पैर रखने के बाद फिर सिर भले ही चले जाय पर पीठ मत दिखाना” शुभकामनाओं सहित आकाश तिवारी http://aakashtiwaary.jagranjunction.com

    R K KHURANA के द्वारा
    February 8, 2011

    प्रिय आकाश जी, प्रेम की परिभाषा यही है की सिर दीजे पर काण/पीठ न कीजिये ! आपकी प्रिअतिक्रिया के लिए आभार खुराना

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 8, 2011

आदरणीय खुराना जी, प्रेम तो ऐसा है ही जिसमें एक हो जाया जाता है| मैं और तुम कुछ भी नहीं सिर्फ़ ‘हम’| साभार,

    R K KHURANA के द्वारा
    February 8, 2011

    प्रिय वाहिद जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत शुक्रगुज़ार हूँ ! ऐसे ही स्नेह बनाये रखिये खुराना

NIKHIL PANDEY के द्वारा
February 8, 2011

सर प्रणाम …………… प्रेम की बहुत लम्बी चौड़ी व्याख्या है .हम जितना लिखे कम ही है …….. एक शब्द में कहू तो प्रेम सहज जीवन का आधार है……….अब सहजता शब्द जितना छोटा है उसकी व्याख्या और व्यवहार उतना ही अधिक विस्तृत…. .. प्रेम कुछ भी नहीं मांगता वह सिर्फ देता है .. व्यक्ति में सहज वृत्ति .. समर्पण की वृत्ति और कुछ भी नहीं ये… मांगना तो इच्छा करना हो गया और इछाये वासना का आधार बन जाती है .. जबकि प्रेम तो केवल देता है और देने वाल बनता है ….. राम सीता ,कृष्ण , मीरा .. राधा ,, लैला ,कबीर तुलसी , ऐसे अनगिनत नाम है जिन्होंने व्यक्तिगत प्रेम से लेकर समष्टिगत प्रेम का ज्ञान दिया और उसे जिया …. यहाँ किसी ने नहीं कहा की अपना शीश दो .. या मैंने अपना शीश दिया … केवल win and win .. अर्थात आराधक भी संतुष्ट और आराध्य भी … प्रेम भी संतुष्ट और प्रेमिका भी …. बहुत अर्थपूर्ण लेख हमें आपसे बहुत कुछ सिखने को मिलता है … धन्यवाद और शुभकामनाये…

    R K KHURANA के द्वारा
    February 8, 2011

    प्रिय निखिल जी, आपको मेरे लेख से कुछ सीखने को मिला ! मेरे लिखने का मकसद पूरा हो गया ! आपके स्नेह के लिए धन्यवाद खुराना

roshni के द्वारा
February 8, 2011

Respectedखुराना जी नमस्कार प्रेम अगर कुछ मांगता है तो बलिदान अपने अहम् का और कुछ नहीं ……… बहुत बढ़िया लेख

    R K KHURANA के द्वारा
    February 8, 2011

    प्रिय रौशनी जी, प्रेम का मतलब ही देना होता है ! जो त्याग नहीं कर सकत वो प्रेम नहीं कर सकता ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद खुराना

abodhbaalak के द्वारा
February 8, 2011

खुराना जी आपकी हर रचना, पिछ्हली से कहीं ज्यादा सुन्दर होती है, इसके बारे में भी यही कहूँगा आपने इसमें गुरुवाणी का बहुत ही खूबी के साथ प्रयोग…. कांटेस्ट के लिए मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    R K KHURANA के द्वारा
    February 8, 2011

    प्रिय अबोध जी, आपको मेरी रचना आओ प्रेम प्रेम खेलें बहुत अच्छी लगी ! जानकर हर्ष हुआ ! आपके स्नेह के लिए आपका आभारी हूँ ! खुराना

vinitashukla के द्वारा
February 8, 2011

बहुत ही सुन्दर विचार खुराना जी. यही हमारा भारतीय जीवन दर्शन भी कहता है. प्रतियोगिता के लिए शुभकामनाएं.

    R K KHURANA के द्वारा
    February 8, 2011

    सुश्री विनीता जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! शुभकामनायों के लिए धन्यवाद ! खुराना

rajni thakur के द्वारा
February 8, 2011

आदरणीय खुराना जी , पवित्र गुरुवाणी के माध्यम से प्रेम की व्याख्या पढ़कर लगा की यह आलेख सच्चे प्रेम के लिए अपने आपमें सम्पूर्ण मापदंड तय करता है .

    R K KHURANA के द्वारा
    February 8, 2011

    सुश्री रजनी जी, “आओ प्रेम प्रेम खेलें” लेख आपको अच्छा लगा ! लिखना सार्थक हो गया ! प्रतिक्रिया के लिए आभार ! खुराना

Alka Gupta के द्वारा
February 8, 2011

श्री खुरानाजी, सादर अभिवादन पवित्र गुरुवाणी के छोटे से दृष्टांत द्वारा प्रेम का एक अद्वितीय स्वरूप पढ़ने को मिला यह बहुत ही उत्तम रचना है ! कॉन्टेस्ट के लिए आपको मेरी हार्दिक शुभकामनाएं !

    R K KHURANA के द्वारा
    February 8, 2011

    सुश्री अलका जी, मेरी रचना “आओ प्रेम प्रेम खेलें” के लिए आपको प्रतिक्रिया मिली ! धन्यवाद ! कृपया ऐसे ही अपना स्नेह बनाये रखें ! खुराना

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
February 8, 2011

आदरणीय श्री खुराना जी, Valentine Contest के लिए आपकी दूसरी रचना तो पहली से भी बढ़ कर है। गुरू-वाणी के माध्‍यम से आज के valentine प्रेम की व्‍याख्‍या अद्भुत वर्णन है। आपनें इसकी जिस तरह व्‍याख्‍या की है वह काबिले-तारीफ है। भक्‍त के प्रेम से युवाओं के प्रेम तक सभी के लिए उपयोगी……. । प्रतियोगिता के लिए शुभकामनाएं। आपके कहे अनुसार मैंनें भी एक रचना पोस्‍ट कर दी है। अरविन्‍द पारीक

    R K KHURANA के द्वारा
    February 8, 2011

    प्रिय अरविन्द जी, आपको मेरी रचना ” आओ प्रेम-प्रेम खेलें” मेरी पहली रचना “मुझको प्यार तुमसे से है” से भी अच्छी लगी ! मेरा लिखना सफल हो गया ! आप जैसे स्नेही मित्रो के प्रोत्साहन से लिखने की प्रेरणा मिलती है ! धन्यवाद खुराना


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