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परमपिता को प्रणाम

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परमपिता  को प्रणाम

राम कृष्ण खुराना

एक राजा था ! उसके राज्य में सब प्रकार से सुख शांति थी ! किसी प्रकार का कोई वैर-विरोध नहीं था ! जनता हर प्रकार से सुखी थी ! परंतु राजा को एक बहुत बडा दुख था कि उसकी कोई संतान न थी ! उसे अपना वंश चलाने की तथा अपने उत्तराधिकारी की चिंता खाए जा रही थी ! मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में जाकर माथा टेका ! कई तीर्थ स्थानों की यात्रा की ! परंतु कोई लाभ न हुआ ! संतान की कमी उसे दिन ब दिन खाए जा रही थी !

बहुत सोच विचार के पश्चात उसने अपने राज्य के सभी विद्वानों, पण्डितों को बुलवाया और उनसे संतान प्राप्ति का उपाय ढूंढने को कहा ! सभी विद्वानों ने विचार विमर्श किया ! राजा की जन्म कुंडली का गहन विश्लेषण किया ! अंत में वे सभी एक मत से एक निष्कर्ष पर पहुंचे !  उन्होंने राजा से कहा कि यदि कोई ब्राह्मण का बच्चा अपनी खुशी से देवता को बलि दे तो आपको संतान की प्राप्ति हो सकती है !

राजा ने विद्वानों की बात सुनी ! उसने सारे राज्य में मुनादी करा दी कि यदि कोई ब्राह्मण का बच्चा अपनी इच्छा से खुशी-खुशी बलि दे देगा तो उसके घर वालों को बहुत सा धन दिया जायगा !

राजा के राज्य में एक बहुत ही गरीब ब्राह्मण था ! कई दिन फाके में ही गुजर जाते थे ! उसके चार लडके थे ! बडे तीन लडके तो अपना काम धंधा करते थे और अपने परिवार को आर्थिक सहयोग देते थे ! परंतु जो सबसे छोटा लडका था वो कोई काम नहीं करता था ! उसका सारा ध्यान हमेशा भगवान भक्ति में लगा रहता था उसका सारा दिन सदकर्म करते हुए भगवान का सिमरण करते ही बीत जाता था ! उसके पिता ने भी मुनादी सुनी ! सोचा यह लडका निठल्ला है ! कोई काम-धंधा भी नहीं करता ! इसको बलि के लिए भेज देते है ! राजा से धन  मिल जायगा तो घर की हालत कुछ सुधर जायगी !

ब्राह्मण अपने चौथे सबसे छोटे लडके को लेकर राजा के पास पंहुचा ! राजा ने उस लडके से पूछा – “क्या तुम बिना किसी दबाव के, अपनी मर्जी से, अपनी खुशी से बलि देने को तैयार हो ?”

“जी महाराज !” लडके ने बडी विनम्रता से उत्तर दिया – “यदि मेरी बलि देने से आपको संतान की प्राप्ति होती है तो मैं खुशी से अपनी बलि देने को तैयार हूं !”

राजा उसका उत्तर सुन कर बहुत प्रसन्न हुआ ! सभी विद्वानों ने सलाह करके बलि देने के लिए शुभ मुहुर्त निकाला और राजा को बता दिया ! लडके के पिता को बहुत सारा धन आदि देकर विदा किया ! लडके को अतिथि ग्रह मे ठहराया गया ! हर प्रकार से उसका ख्याल रखा गया ! अंत में उसकी बलि देने का दिन भी आ गया !

राजा ने लडके को बुलाया और कहा – “आज तुम्हारी बलि दे दी जायगी ! अगर तुम्हारी कोई आखरी इच्छा हो तो बताओ हम उसे पूरी करेंगें !”

“मुझे कुछ भी नहीं चाहिए !” ब्राह्मण पुत्र ने कहा – “ बस मैं बलि देने से पहले नदी में स्नान करके पूजा करना चाहता हूं !”

राजा यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और बोला – “ठीक है ! हम भी तुम्हारे साथ नदी तक चलेंगें !”

उस लडके ने नदी में स्नान किया ! फिर नदी किनारे की रेत को इकट्ठा किया और उसकी चार ढेरियां बना दी !  उसने चारों ढेरिओं की ओर देखा ! फिर एक ढेरी को अपने पैर से गिरा दिया ! फिर उसी प्रकार से दूसरी ढेरी को भी गिरा दिया ! फिर तीसरी ढेरी को भी गिरा दिया अब वो चौथी ढेरी के पास गया ! उसके चारों ओर तीन बार चक्कर लगाया ! हाथ जोडकर उसको माथा टेका ! उसकी वन्दना की और राजा के पास बलि देने के लिए आ गया !

राजा उसका यह सारा करतब बडे ही कौतुहल से देख रहा था ! पहले तो राजा ने सोचा कि बालक है ! रेत से खेल रहा है ! परंतु जब राजा ने देखा कि उसने चौथी ढेरी को हाथ जोड कर प्रणाम किया है तो राजा को इसका रहस्य जानने की इच्छा हुई ! राजा ने बालक से पूछा  “बालक, तुमने रेत की चार ढेरियां बनाई ! फिर उनमें से तीन को तोड दिया और चौथी को प्रणाम किया ! इसका क्या रहस्य है ?”

पहले तो बच्चे ने कोई उत्तर नहीं दिया ! परंतु राजा के दोबारा पूछ्ने पर लडके ने कहा – “राजन, आपने बलि के लिए मुझे कहा है ! मैं बलि देने के लिए तैयार हूं ! आप अपना काम कीजिए ! आपने इस बात से क्या लेना कि मैंने रेत की वो ढेरियां क्यों तोडी हैं !”

राजा को बालक से ऐसे उत्तर की आशा न थी ! राजा ने उससे कहा – “बालक, हमने तुम्हारे पिता को तुम्हारी कीमत देकर तुम्हें खरीदा है ! तुम हमारे खरीदे हुए गुलाम हो ! इसलिए हमारे हर प्रश्न का उत्तर देना और हमारी हर बात को मानना तुम्हारा धर्म बनता है !”

“हे राजन, जब आप जिद कर रहे हैं तो सुनिए !” लडके ने उत्तर दिया  – “जब कोई बच्चा पैदा होता है तो सबसे पहले उसके माता-पिता उसकी रक्षा करते है ! अगर वो आग के पास जाने लगता है तो उसको उससे बचाते हैं  ! उसकी हर प्रकार से रक्षा करने की जिम्मेवारी उनकी होती है ! लेकिन यहां तो मेरे पिता ने ही धन के लालच में मुझे बलि देने के लिए आपके पास बेच दिया ! इसलिए पहली ढेरी जो उनके नाम की बनाई थी वह मैंने ढहा दी !”

लडके ने आगे कहा – “दूसरी जिम्मेदारी राजा पर होती है अपनी प्रजा की रक्षा करने की ! आप ने मुझे अपनी संतान प्राप्ति के लिए बलि देने के लिए खरीद लिया ! तब आपसे क्या प्रार्थना करता ! इसलिए दूसरी ढेरी जो मैंने आपके नाम की बनाई थी वो भी तोड दी !”

“तीसरा भार जीवों की रक्षा करने का देवी-देवताओं का होता है !” बालक ने तीसरी ढेरी का रहस्य बताते हुए कहा – “लेकिन यहां तो देवता स्वयं ही मेरी बलि लेने को तैयार बैठा है ! तो इससे क्या प्रार्थना करनी ? इसलिए मैंने तीसरी ढेरी भी तोड दी !”

“लेकिन चौथी ढेरी का क्या रहस्य है ?” राजा ने पूछा !

“और अंत में सहारा होता है ! भगवान का ! इश्वर का !” बच्चे ने रेत की ढेरियों का रहस्य खोलते हुए कहा – “मेरी बलि दी जानी थी ! सो मैंने अंत में इश्वर से प्रार्थना की ! प्रभु की पूजा अर्चना करके उनसे रक्षा करने के प्रार्थना की ! अब वो ही मेरी रक्षा करेंगें ! वही होगा जो इश्वर को मंजूर होगा ! मैं बलि देने के लिए तैयार हूं !” इतना कहकर वो बालक राजा के पास जाकर सिर झुका कर खडा हो गया !

राजा उस छोटे से बालक की इतनी ज्ञान की बातें सुनकर सन्न रह गया !  राजा ने सोचा मैं इस बालक की बलि दे दूंगा !  ब्राह्मण हत्या भी हो जायगी ! फिर पता नहीं मुझे जो संतान प्राप्त होगी वो कैसी होगी ! प्रजा का ख्याल रखने वाली होगी या नहीं ! कहीं मेरा और वंश का नाम ही न डुबो दे ! यह बालक गुणवान है ! इश्वर भक्त है ! सब प्रकार से मेरे लायक है ! क्यों न मैं इसे ही गोद ले लूं और इसे ही अपना पुत्र बना लूं ! इतना विचार करते ही उसने उस बालक की बलि देने का कार्यक्रम रद्द कर दिया और उस बालक को गोद ले लिया ! कहते हैं उस बालक में अच्छे गुण होने के कारण उसने कई सालों तक राज्य किया और हर प्रकार से प्रजा की रक्षा की ! उसके राज्य में किसी को किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं था !

[एक सतसंग में सुनी कथा के आधार पर ]

राम कृष्ण खुराना

A-426, Model Town Extn.

Ludhiana (Punjab)

9988950584

लुधियाना

khuranarkk@yahoo.in



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40 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

NAVEEN KUMAR SHARMA के द्वारा
November 24, 2010

चाचा जी नमस्ते, चाचा जी आपने बहुत ही अच्छा लेख लिखा है चाचा जी वो बालक वास्तव में बहुत ही ज्ञानी था राजा भी काफी ज्ञानी था क्योंकि यदि कोई और राजा होता तो शायद वो अपने हित के लिए उस ज्ञानी बालक की बलि दे देता जबकि राजा ने ऐसा नहीं किया नवीन कुमार शर्मा बहजोई (मुरादाबाद ) उ . प्र . मोबाइल नम्बर – 09719390576

    R K KHURANA के द्वारा
    November 24, 2010

    प्रिय नवीन जी, अपने ठीक ही कहा है १ राज ने भी उस बालक के ज्ञान को पहचान कर उसका लाभ उठाया और उसके राज्य की रक्षा हो सकी ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
November 24, 2010

आदरणीय श्री खुराना जी, सादर नमस्‍कार, हमें भी सत्संग का लाभ देने का शुक्रिया । तथापि ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कहानी में कहीं ना कहीं कुछ भूल हो गई है । क्‍योंकि तीसरी ढे़री गुरूओं की होनी चाहिए थी जिनकी सलाह पर राजा ने बलि देने का निर्णय लिया था वह बालक उनसे भी अब राजा को उचित सलाह देने का अनुरोध नहीं कर सकता था । तथापि कहानी शिक्षाप्रद है । अच्‍छी प्रस्‍तुति के लिए बधाई । अरविन्‍द पारीक

    R K KHURANA के द्वारा
    November 24, 2010

    प्रिय अरविन्द जी, “परमपिता को प्रणाम” कथा पर आपके विचार मिले ! कहानी में भूल की और जो अपने इशार किया है वो आपकी सोच के अनुसार ठीक है ! परन्तु मैंने जो कहानी सुनी आपको सुना दी ! फिर उस ज़माने में तो लोग देवता को ही बली चढाते थे ! इसलिए इसमें गुरुजनों का जिक्र नहीं हुआ ! आपकी प्रतिक्रिया ने मुझे नई उर्जा दी है ! आभार ! राम कृष्ण खुराना

K M Mishra के द्वारा
November 24, 2010

काका प्रणाम । सवेरे सवेरे सत्संग हो गया और सीख भी मिली कि गुणी , विद्वावन और दंभ रहित लोगों का हमेशा सम्मान करना चाहिये और उनकी रक्षा करनी चाहिये । आभार ।

    R K KHURANA के द्वारा
    November 24, 2010

    प्रिय मिश्र जी, आपको सुबह सुबह सत्संग का आनंद मिल गया ! इससे बड़ी और क्या बात हो सकती है ! आपके स्नेह के लिए बहुत आभार ! राम कृष्ण खुराना

Alka Gupta के द्वारा
November 23, 2010

श्री खुराना जी ,  बालक द्वारा चौथी ढेरी का रहस्य खोलना…….ईश्वर में आस्था…… कहानी बहुत ही भावप्रधान व शिक्षाप्रद है……..

    R K KHURANA के द्वारा
    November 24, 2010

    सुश्री अलका जी, मेरी रचना “परमपिता को प्रणाम” के लिए आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार ! राम कृष्ण खुराना

mihirraj2000 के द्वारा
November 23, 2010

आदरनिये खुराना जी तीसरी ढेरी देवी देवता का था तो उसे गिरा दिया और चौथी भगवान् की उसे नहीं गिराया क्या भगवान् और देवी देवता में कोई खास अंतर है? समझ नहीं आया. वैसे हमेशा की तरह मजेदार कहानी. बधाई.

    R K KHURANA के द्वारा
    November 24, 2010

    प्रिय मिहिर जी, मेरी रचना “परमपिता को प्रणाम” पर आपकी प्रतिक्रिया मिली ! अपने कहा है की भगवान और देवी-देवता में क्या अंतर है ! यहाँ परमपिता परमात्मा से अर्थ उस निराकार इश्वर से है ! फिर पुराने ज़माने में बहुत से पीर पैगम्बरों को भी देवी देवता मानकर उन्मको बलि चढ़ाई जाती थी ! तो इसलिए निराकार ब्रह्म से वे अलग माने

    R K KHURANA के द्वारा
    November 24, 2010

    प्रिय मिहिर राज जी, क्षमा करना कंप्यूटर में कुछ तकनिकी खराबी आ जाने के कारण पहली पोस्ट अधूरी छाप गयी थी ! मेरी रचना “परमपिता को प्रणाम” पर आपकी प्रतिक्रिया मिली ! अपने कहा है की भगवान और देवी-देवता में क्या अंतर है ! यहाँ परमपिता परमात्मा से अर्थ उस निराकार इश्वर से है ! फिर पुराने ज़माने में बहुत से पीर पैगम्बरों को भी देवी देवता मानकर उनको बलि चढ़ाई जाती थी ! तो इसलिए निराकार ब्रह्म से वे अलग माने जाते है ! ऐसे मेरी तुच्छ बुद्धि का मानना है ! फिर सत्संग में सुनी कहानी को मैंने वैसे का वैसे ही रख दिया है ! आप तो जानते है कि ऐसे कथायों में तर्क – कुतर्क के लिए कोइ स्थान नहीं होता ! पुराने ज़माने में तो बिलकुल ही नहीं ! फिर भी आप या कोइ एनी सदस्य जो ज्यादा अच्छा जनता हो कृपया बताने का कष्ट करें ! धन्यवादी हूँगा ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार राम कृष्ण खुराना

    अरुण अग्रवाल के द्वारा
    December 3, 2010

    राम कृष्ण खुराना जी आपकी रचना पड़कर बहुत ही आनंद आया | आपका आभार | भगवान और देवी-देवता में अंतर होता ही है | देवी देवता दो प्रकार के होते है | जड़ और चेतन जड़ देवता जैसे की सूरज चाँद पेड़ पोधे अग्नि वायु आकाश आदि ||जबकि चेतन देवता में माता पिता गुरु आचार्य ,कोई महान व्यक्ति आदि आते है |ये सब इश्वर की व्यवस्था के अंग है | इश्वर एक है जो की निराकार , सर्वशक्ति मान ,न्यायेकारी ,दयालु ,सब काल और देश मे एक सा रहता है ||इश्वर सर्व शक्ति मान है

    R K KHURANA के द्वारा
    December 4, 2010

    प्रिय अरुण जी, आपको मेरी रचना पड़कर बहुत ही आनंद आया ! जानकार मन गदगद हो गया ! मेरी तो कोशिश यही होती है की मैं ऐसी रचना लिखूं जिससे सबका मनोरंजन भी हो और ज्ञान भी बढे ! मेरा लिखना सार्थक हो गया ! फिर आपने जो इश्वर और देवी-देवता में अंतर बताया है उसके लिए मैं आपका दिल से abhari hoon ! apki pratikriya ke लिए फिर से dhanyawad ! Ram Krishna Khurana

priyasingh के द्वारा
November 23, 2010

अत्यंत भावमयी जीवन के कर्तव्यो का पाठ पढ़ाती हुई शिक्षाप्रद कहानी …………………. धन्यवाद आपका इस कहानी को सुनाने के लिए ……….

    R K KHURANA के द्वारा
    November 24, 2010

    प्रिय प्रिय सिंह जी, आपकी प्रतिक्रिया मिली ! अपने अपना समय निकल कर मेरी रचना के लिए अपनी राय दी १ मैं आभारी हूँ ! राम कृष्ण खुराना

    R K KHURANA के द्वारा
    November 24, 2010

    प्रिय प्रिया सिंह जी, क्षमा कीजियेगा पहले आपका नाम गलत प्रिंट हो गया है ! कृपया सही पढ़े ! खुराना

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 23, 2010

आदरणीय खुराना जी………. सुंदर शिक्षाप्रद कहानी ………… हर किसी को उसके कर्तव्य का परिचय कराते हुए……….बच्चे के सुंदर उत्तर…….. बड़ा दुखद है की अभी भी कई जगह बच्चे बली दिये जाते है……

    R K KHURANA के द्वारा
    November 24, 2010

    प्रिय पियूष जी, आपको मेरी कहानी “परमपिता को प्रणाम” से शिक्षा मिली ! अच्छा लगा ! आपकी बात सही है की आजकल भी लोग बलि देने जैसे घृणित कार्य करते है ! इश्वर सबको सदबुद्धि दे ! राम कृष्ण खुराना

Aakash Tiwaari के द्वारा
November 23, 2010

आदरणीय श्री खुराना जी, एक शिक्षाप्रद लेख हमारे सामने प्रस्तुत करने के लिए आपका धन्यवाद…… आकाश तिवारी

    R K KHURANA के द्वारा
    November 24, 2010

    प्रिय आकाश जी, मेरी रचना “परमपिता को प्रणाम” के लिए आपका स्नेह मिला ! धन्यवाद राम कृष्ण खुराना

jalal के द्वारा
November 23, 2010

कहानी अच्छी सीख देती हुई. और अच्छा लगा. बधाई हो

    R K KHURANA के द्वारा
    November 23, 2010

    प्रिय जलाल जी, आपको मेरी कहानी “परमपिता को प्रणाम” अच्छी लगी ! जानकर हर्ष हुआ ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना

s.p.singh के द्वारा
November 23, 2010

आदरणीय खुराना जी, प्रणाम एक बहुत ही अच्छी शिक्षाप्रद कहानी —– वास्तविकता तो यही है परन्तु आज के युग में तो सक्षम व्यक्ति सब को मिटा कर स्वयं को बुलंदी पर पहुचाना चाहता है– हमेशा की भांति आपकी यह रोचक कथा “परमपिता को प्रणाम” के लिए बधाई |

    R K KHURANA के द्वारा
    November 23, 2010

    प्रिय सिंह साहेब, मेरी हमेशा यही कोशिश होती है कि सभी का मनोरंजन भी हो जाय और कुछ शिक्षा भी मिल जाय ! “परमपिता को प्रणाम” पर आपकी प्रर्तिक्रिया से मुझे लगता है कि मेरी यह कोशिश सफल रही हैं ! यह सब आप लोगो के प्यार का ही नतीजा है कि मैं कुछ लिखने में सफल हो जाता हूँ ! प्रतिक्रिया के लिए बहुत आभार ! राम कृष्ण खुराना

chaatak के द्वारा
November 23, 2010

आदरणीय चाचा जी, इतनी अच्छी कहानी पढ़कर मन प्रसन्न हो गया| आपके संस्मरण काफी दिलचस्प और अच्छे होते हैं| एक और बेहतर प्रस्तुति पर बधाई !

    R K KHURANA के द्वारा
    November 23, 2010

    प्रिय चातक जी, सदा की तरह मेरी रचना पर आपका स्नेह मिला ! आप लोगो की प्रतिक्रियाएं मेरे ले उर्जा का काम करती है ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार राम कृष्ण खुराना

Alok Agrawal के द्वारा
November 23, 2010

aapka lekh bahut accha laga.

    R K KHURANA के द्वारा
    November 23, 2010

    प्रिय अलोक जी, आपको मेरी कहानी “परमपिता को प्रणाम” अच्छी लगी ! प्रतिक्रिया के लिए आपका धन्यवाद राम कृष्ण खुराना

abodhbaalak के द्वारा
November 23, 2010

खुराना जी, इश्वर पर विश्वास, कहने को तो सब ही करते हैं पर क्या हम वास्तव में विश्वास करते हैं? इस कहानी में इस बालक का विश्वास इस बात को दर्शाता है की विश्वास ऐसा होता है , बहुत ही सुन्दर रचना और साथ में शिक्षा देने वाला लेख, सदा की भांति सुन्दर रचना, आपका नाम ही अच्छी रचना का पर्याय है, और इसी लिए हमेश आपकी अगली रचना का इंतज़ार रहता है http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    R K KHURANA के द्वारा
    November 23, 2010

    प्रिय अबोध बालक जी, इश्वर इस संसार के कण कण में विद्यमान है ! यदि कोइ इसको नहीं मानता है तो इससे कोइ फर्क नहीं पड़ता ! इश्वर तो है ही ! हर पल हर क्षण हमें उसकी अनुभूति होती रहती है ! बात है समझने की, मानने की, विश्वास करने की ! अपनी प्रतिकिर्या के रूप में अपने जो प्यार दिया है मैं उसका कायल हूँ ! उसके लिए आपको कोटिश धन्यवाद् ! राम कृष्ण खुराना

Dharmesh Tiwari के द्वारा
November 23, 2010

आदरणीय खुराना साहब,प्रेरणादायी कथा को हम सब के बिच रखने के लिए धन्यवाद!

    R K KHURANA के द्वारा
    November 23, 2010

    प्रिय धर्मेश जी, मेरी कहानी “परमपिता को प्रणाम” के लिए आपकी प्रतिक्रिया मिली. धन्यवाद राम कृष्ण खुराना

allrounder के द्वारा
November 23, 2010

एक उच्च कोटि के लेख के लिए आपको हर्द्की बधारी चाचाजी !

    R K KHURANA के द्वारा
    November 23, 2010

    प्रिय सचिन देव जी, मेरी रचना “परमपिता को प्रणाम” पर आपका स्नेह मिला ! धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना

roshni के द्वारा
November 23, 2010

आदरणीय खुराना जी बहुत अच्छी कहानी……. होता वही है जो परम पिता को मंजूर होता है ……… कहते है न अगर अपने मन की न हो तो संजो उस ऊपर वाले की मन की हुई है ……..

    R K KHURANA के द्वारा
    November 23, 2010

    प्रिय रौशनी जी, “परमपिता को प्रणाम” आपको अच्छी लगी ! प्रतिक्रिया के लिए आभार राम कृष्ण खुराना

HIMANSHU BHATT के द्वारा
November 23, 2010

खुराना जी… बहुत ही खुबसूरत कहानी.. .वास्तव में उस छोटे से बालक ने सारा ज्ञान उड़ेल दिया….. पिता की, राजा की, देवी देवताओं की जिम्मेदारिओं का जो उसने वर्णन किया है … वो उन लोगों के लिए बहुत उपयोगी है जो बलि प्रथा को बढ़ावा देते है…… इस प्रभावी व शक्शिप्रद कहानी को इस मंच पर लाने के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया…….

    R K KHURANA के द्वारा
    November 23, 2010

    प्रिय हिमांशु जी, आपको मेरी कहानी “परमपिता को प्रणाम” अच्छी लगी ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ! राम कृष्ण खुराना

nishamittal के द्वारा
November 23, 2010

शिक्षाप्रद अच्छी कहानी खुराना जी.सबसे योग्य तो छोटा बेटा निकला भले ही वी निकम्मा था.

    R K KHURANA के द्वारा
    November 23, 2010

    सुश्री निशा जी, उस परमपिता की मर्जी के बिना कोइ पत्ता भी नहीं हिल सकता ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना


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