KADLI KE PAAT कदली के पात

चतुर नरन की बात में, बात बात में बात ! जिमी कदली के पात में पात पात में पात !!

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मौत का दुख

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मौत का दुख

राम कृष्ण खुराना

घर में बडा होना भी पाप है ! आफिस से आओ तो घर की चिंता ! इस मंह्गाई में घर चलाना कितना मुशिकल है ? वो तो भला हो वर्मा जी का जिन्होंने पिता जी की “डेथ आन ड्यूटी” दिखा कर पेंशन लगवा दी है ! थोडा सा सहारा मिल जाता है ! वरना……..!

आफिस से थके हारे घर में आओ तो घर का सामान जुटाने दौडो ! नमक-तेल के चक्कर ने घनचक्कर बना दिया है ! त्यौहार मनाना तो दूर दो जून की रोटी के भी लाले पडे हुए हैं ! 15 तारीक के बाद से ही जेब खनकने लगती है ! यदि कोई बिमारी-रिश्तेदारी टपक पडे तो राम ही मालिक ! खेलने खाने की जवानी इन्हीं धंधों में खप रही है ! पिताजी थे तो कोई चिंता नहीं थी कहां से क्या प्रबन्ध करते हैं, यह उनका सिरदर्द था ! हम तो आर्डर देने के आदी थे !

थका-हारा दफ्तर से आया हूं ! लंच बाक्स मेज पर पटक कर मां को चाय बनाने को कहा ! मां रसोई में चली गई ! मैं धम्म से खाट में धंस जाता हूं ! बूट उतार कर उसमें जुराबें खोंस देता हूं ! आज शरीर टूटा सा है ! आफिस में भी सारा दिन मूड खराब रहा ! कुछ भी करने को दिल नहीं करता था ! फाईल उठाता तो लगता जैसे उसमें मनों वज़न हो !

ठांय ………!

दरवाजा खुला होने के कारण पटाखे की आवाज़ अन्दर आ जाती है !

प्रत्येक दीवाली की तरह पिछ्ली दीवाली को भी पिता जी पटाखों का ढेर उठा लाए थे ! पप्पू को गोदी में उठाकर तथा उसे दिखा-दिखा कर पटाखे चलाते ! फुलझडी जला कर उसके हाथ में पकडा देते ! वह थोडा-थोडा डरता व आनन्द लेता हुआ हो-हो करके फुलझडी को उपर-नीचे घुमाता और खुश होता ! पिताजी कभी बम चलाते तो कभी चकरी ! पप्पू जब उछल-उछल कर तालियां बजाता तो पिता जी भी खुशी से झूम उठते ! ऐसे ही हंसी खुशी के वातावरण में दीवाली कब चली गई पता ही न चला !

ठांय ……..!

बाहर किसी बच्चे ने पटाखे के पलीते को आग दिखा दी थी !

मेरा ध्यान टूट जाता है ! परसों दीवाली है ! सभी घरों में चहल-पहल है ! परंतु हमारे यहां मातम का सा सन्नाटा है ! भीतर भी, बाहर भी ! इसी वर्ष पिता जी की मृत्यु हुई है ! उनकी मृत्यु के पश्चात यह पहली दीवाली है ! भगवान भी बडा बेरहम है ! यदि उसे मेरा ख्याल नहीं था तो भोली-भाली मां का तो ख्याल किया होता ! 10 वर्ष की गुड्डी पर तो निगाह डाली होती ! साढे चार साल के पप्पू पर तो तरस खाया होता !

“ठांय…….!”

तभी पप्पू मेरे सामने आ जाता है ! वह फिर पटाखों की मांग करता है ! मैं उसे बुरी तरह से डांट देता हूं ! मैं तो पहले ही सारे दिन का परेशान बैठा हूं ! पिताजी सिर पर नहीं हैं ! इसे पटाखों की सूझ रही है ! लोग क्या कहेंगे, बाप की मौत का ज़रा सा भी गम नहीं ?

पप्पू चकित सा निर्मिमेष मेरी ओर देखता खडा रहता है ! मां चाय का कप लेकर आती है तथा पप्पू को इस प्रकार खडा देखकर बडे प्यार से पूछ्ती है – “क्या बात है पप्पू ?”

मां का ममता भरा स्वर सुनकर जैसे लावा सा फूट पडता है ! वह अपने नन्हें से हाथ से मेरी ओर इशारा करता है ! उसकी आंख में दो बूंद आंसू टपक पडते हैं ! वह गुस्से से भर कर कहता है – “मां, भैया बहुत गन्दे हैं !” अत्यधिक क्रोध के कारण उसका चेहरा तमतमाने लगता है ! गला अवरुध हो जाता है ! थोडी सांस लेकर वह फिर कहता है – “भैया बहुत गन्दे हैं ! मुझे पटाखे लेकर नहीं देते !”

फिर मां की ओर मुड कर कहता है – “मां, तुम भी बहुत गन्दी हो ! तुम झूठ बोलती हो कि पिताजी टूर पर गए हैं ! सभी मोहल्ले वाले कहते हैं कि पिता जी मर गए हैं !”

मां उसकी बात सुनकर उसे सीने से चिपटा लेती है ! मां की आंखों से टप-टप आंसू गिरने लगते हैं !

पप्पू मां की पकड ढीली करके फिर पूछता है – “मां पिता जी जिन्दा नहीं हो सकते ? भैया तो जिन्दा हैं ! पर बहुत गन्दे हैं ! मुझे पटाखे नहीं लेकर देते ! आज पिता जी होते तो मैं बन्दूक लेता !”

पप्पू का यह वाक्य मेरे दिल पर हथौडे सा लगा ! मैं उस भूत की याद में इस वर्तमान को भुला बैठा था ! पिताजी के मरने का दुख शायद मुझे भी इतना नहीं हुआ होगा जितना इस मासूम हृदय को हुआ है !

मैं चाय का प्याला मेज पर रख देता हूं ! दौड कर पप्पू को गोद में उठा लेता हूं ! उसके गालों, माथे और गर्दन को बदहवास सा चूमने लगता हूं ! पप्पू मेरे इस अप्रत्याशित व्यवहार को  समझ नहीं पाता ! मैं उसे उसी प्रकार उठाये-उठाये ही बाहर की ओर दौड पडता हूं ! मां मुझे बुलाती रहती है मां कहती है चाय तो पी जाओ, ठंडी हो जायगी ! परंतु मुझे मां की आवाज़ सुनाई नहीं देती ! मैं नंगे पांव ही पप्पू को उसी प्रकार उठाए बाज़ार की ओर दौड पडता हूं !

उसे बन्दूक दिलवाने के लिए !

राम कृष्ण खुराना

9988950584

khuranarkk@yahoo.in



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52 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    R K KHURANA के द्वारा
    October 26, 2012

    Virus ??

    R K KHURANA के द्वारा
    October 26, 2012

    Cant understand

    R K KHURANA के द्वारा
    October 26, 2012

    What ??

Carlynda के द्वारा
May 26, 2011

Wow, that’s a really clveer way of thinking about it!

    R K KHURANA के द्वारा
    October 26, 2012

    Thanks

lata kamal के द्वारा
March 29, 2011

नमस्कार खुराना जी ,आपकी इस कहानी से वर्षों पहले की घटना याद आ गयी .मेरे ससुर जी देहांत हो गया था .घर मैं बहुत सारे लोग थे और मेरा सिक्स्थ क्लास मैं पड़ने वाला बच्चा टी .वी. देखना चाहता था बहुत समझाने पर भी नहीं मन तो मैंने दो चांटे लगा दिए .वो बहुत रोया व अपने दादा जी की फोटो के आगे मन ही मन कुछ बोलता रहा .उसकी वो निगाहें मैं आज तक नहीं भूल पाई हूँ.कई रातें जाग कर काटी.पर आज आपकी कहानी पढ़ उन निगाहों का मतलब समझ मैं आया .शायद अब मैं सुकून की नींद सो सकू और अपने बड़े हो चुके बेटे को भी अपनी भावना समझा सकू .आभार

    R K KHURANA के द्वारा
    March 30, 2011

    सुश्री लता जी, मार्मिक रचना, अच्छी रचना, सुंदर, बहुत बढ़िया आदि आदि प्रतिक्रियाएं तो बहुत मिलती हैं ! परन्तु जब आप के द्वारा दी गयी प्रतिक्रिया जैसी कोइ प्रतिक्रिया मिलती है तो मन को एक सकून सा मिलता है और-और भी ज्यादा लिखने को मन करता है ! मेरी इस कहानी ने आपकी पुरानी यादों को ताज़ा कर दिया और आपको अपने बेटे की उन निगाहों का अर्थ समझ में आ गया ! आप अब सकून की नींद सो सकेंगी ! यह इस रचना के लिए आप लोगो की तरफ से बहुत बड़ा इनाम है ! मैं धन्य हो गया ! ऐसी प्रतिक्रियाएं मैं संजो कर रखता हूँ ! परमात्मा आपके बेटे की आयु लम्बी करे और वो हर दिशा में नाम कमाए ! ऐसे इश्वर से मेरी प्रार्थना है ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद शब्द छोटा पड जायगा ! राम कृष्ण खुराना

November 5, 2010

एक हृदयस्पर्शी रचना. आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं.

    R K KHURANA के द्वारा
    November 6, 2010

    प्रिय दीपक श्रीवास्तव जी, मेरी और से भी आपको व आपके परिवार को दिवाली की बहुत बहुत शुभकामनायें ! इश्वर करे यह दिवाली आपके व आपके ;परिवार को सुख शांति व समृद्धि दे ! आपको मेरी कहानी “मौत का दुःख” अच्छी लगी ! आपके स्नेह के लिए आभार ! राम कृष्ण खुराना

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
November 4, 2010

आदरणीय खुराना जी, भाई साहब देर से पढी पर बहुत ही मर्मस्‍पर्शी कहानी है और एक बच्‍चे को बाप के देहांत के बाद परिवार का मुखिया बनने का सही चित्रण किया है। अच्‍छे लेख के लिए धन्‍यवाद आप को एवं आप के परिवार को मेरे परिवार कि ओर से दीपावली की शुभकामनाएं। दीपकजोशी63

    R K KHURANA के द्वारा
    November 4, 2010

    प्रिय दीपक जी, सर्वप्रथम आपको व आपके परिवार को मेरी और से दिवाली की बहुत बहुत शुभकामनायें ! आपको मेरी रचना “मौत का दुःख” बहुत अच्छी लगी ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्वायद राम कृष्ण खुराना

Rita Singh, 'Sarjana' के द्वारा
November 2, 2010

आदरणीय अंकल जी , सादर अभिवादन l दिल छूती हुई एक मार्मिक कहानी l बधाई स्वीकार करे l

    R K KHURANA के द्वारा
    November 5, 2010

    प्रिय रीता जी, मेरी रचना “मौत का दुःख” आपके दिल को छू गयी ! उत्साह वर्धन के लिए आभार ! राम कृष्ण खुराना

Rita Singh, 'Sarjana' के द्वारा
November 2, 2010

आदरणीय अंकलजी , सादर अभिवादन l दिल को छूती हुई बहुत सुन्दर कहानी l बधाई स्वीकारे l

    R K KHURANA के द्वारा
    November 5, 2010

    प्रिय रीता जी, आपको तथा आपके परिवार को दिवाली की शुभ कामनाएं खुराना

NAVEEN KUMAR SHARMA के द्वारा
November 2, 2010

चाचा जी नमस्ते, चाचा जी बहुत ही मर्मस्पर्शी कहानी है भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि हर बालक अपने माता-पिता की छाया में ही पले बढे और उसे हर सुख व त्योहारों की खुशियाँ मिलें वास्तव में हमारे जीवन की डोर ऊपर वाले के हाथ में है इसमें हम और आप कुछ नहीं कर सकते नवीन कुमार शर्मा बहजोई (मुरादाबाद ) उ . प्र . मोबाइल नम्बर – 09719390576

    R K KHURANA के द्वारा
    November 3, 2010

    प्रिय नवीन जी, मेरी रचना “मौत का दुःख” आपको अच्छी लगी ! आपके उत्साहवर्धन के लिए आभारी हूँ ! राम कृष्ण खुराना

    Evaline के द्वारा
    May 26, 2011

    That’s really swrhed! Good to see the logic set out so well.

Arvind Pareek के द्वारा
November 2, 2010

आदरणीय श्री खुराना जी, बाल मानस को परिभाषित करती आपकी यह रचना मर्मस्‍पर्शी है । आपनें सुख व दुख के बीच की महीन रेखा के दर्शन करा दिए । दुर्घटना व लोग क्‍या कहेंगें का डर हमें ऐसी परिस्थितियों में गम की ओर ही धकेलता है । लेकिन यदि हम सोच लें कि जीवन की डोर किसी और के हाथ है तो सब कुछ सहज होने लगता है । बाल मन निर्मल व स्‍वच्‍छ होता है । लेकिन जिंदगी की सच्‍चाई सब से ज्‍यादा उसमें ही बसती है । बहुत सुंदर रचना मेरी बधाई स्‍वीकार करें । साथ ही आपकों व जागरण जंक्‍शन के सभी ब्‍लागर्स एवं पाठकों को मेरी ओर से दीपावली की शत्-शत् शुभकामनाएं । अरविन्‍द पारीक (भाईजीकहिन)

    R K KHURANA के द्वारा
    November 3, 2010

    प्रिय अरविन्द जी, आपकी टिपण्णी में भी आपके लेखकीय गुण प्रदर्शित होते हैं ! यही अनुभव मैंने आपकी प्रतिक्रिया मेरी रचना “मौत का दुःख” पर पढ़ कर किया ! बाल मन की सचाई ने आज की झूठी मान्यतायों को तिलांजली देने के लिए मजबूर कर दिया और पप्पू के लिए नंगे पाँव ही बन्दूक लेने के लिए दौड़ पड़ा ! आपके स्नेह के लिए धन्यवाद राम कृष्ण खुराना

    Sundance के द्वारा
    May 26, 2011

    Snudos great to me BWTHDIK

s.p.singh के द्वारा
November 2, 2010

आदरणीय खुराना जी एक सामयिक, सामाजिक ,मर्मस्पर्शी, अति सवेंदनशील लघुकथा के लिए बधाई,, लगता है यह लघुकथा कही मेरे आसपास ही घटित हुई है, दीपावली की शुभ कामनाओं सहित, धन्यवाद .

    R K KHURANA के द्वारा
    November 3, 2010

    प्रिय सिंह साहेब, आपने ठीक ही कहा है ! लेखक जो भी लिखता है वह उसके आस-पास ही घटित होता है और थोड़ी सी उसकी कल्पना होती है ! यही बात मेरी रचना “मौत का दुःख” में भी है ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद ! राम कृष्ण खुराना

Alka Gupta के द्वारा
November 2, 2010

श्री खुराना जी , बहुत संवेदनायुक्त मर्मस्पर्शी कहानी है। …….ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि हर बालक  अपने माता-पिता की ही छत्र-छाया में ही पले और उसे हर सुख व त्योहारों की खुशियाँ मिलें….. 

    R K KHURANA के द्वारा
    November 3, 2010

    प्रिय अलका जी, मेरी रचना “मौत का दुःख” के लिए आपकी प्रतिक्रिया मिली ! सभी बच्चे अपने माँ बाप की छात्र छाया में रह कर आनंद का अनुभव करे यही इश्वर से प्रार्थना है ! राम कृष्ण खुराना

mihirraj2000 के द्वारा
November 1, 2010

खुराना जी आपकी कथा और कथाओं की तरह ही लाजबाब है. लग रहा था की किसी उत्कृष्ट किताब की कोई उत्कृष्ट रचना पढ़ रहा हूँ. आपको भी दिवाली की शुभकामनाये.

    R K KHURANA के द्वारा
    November 3, 2010

    प्रिय मिहिर जी, आपको मेरी रचना “मौत का दुःख” लाजवाब लगी ! मेरा लिखना सार्थक हो गया ! आपके स्नेह के लिए आभारी हूँ राम कृष्ण खुराना

NIKHIL PANDEY के द्वारा
November 1, 2010

सर प्रणाम .. मन को छू लेने वाली मार्मिक कथा ……….यही कहूँगा की इश्वर करे सभी के लिए त्यौहार शुभ हो और ऐसी कोई दुखद घटना न हो…. साथ ही सभी को दीपावली की ढेरो शुभकामनाये

    R K KHURANA के द्वारा
    November 2, 2010

    प्रिय निखिल जी, “मौत का दुःख” रचना पर आपकी प्रतिक्रिया मिली ! दीपावली की आपको भी शुभकामनायें ! राम कृष्ण खुराना

roshni के द्वारा
November 1, 2010

आदरनिये खुराना जी ……. किसी भी परिवार में ये हादसा ये दुःख दिल दहलाने वाला होता है . बाहर दुनिया खुशियाँ मानती है मगर घर के अन्दर मौत से भी भयानक चुप्पी होती है सब उस जाने वाले की याद में आंसू बहा कर दिवाली मानते है …..भगवन से दुआ है की किसी भी बच्चे के सर से उसके माबाप का साया न उठे….

    R K KHURANA के द्वारा
    November 2, 2010

    प्रिय रौशनी जी, ऐसे हादसे दिल को दहला देते है यह बात सत्य है ! परन्तु इश्वर की माया आजतक कोइ नहीं जन सका ! फिर भी हम उस परम पिता से सबके सुख के लिए प्रार्थना करते हैं ! आपको मेरी रचना “मौत का दुःख” के लिए आपके स्नेह के लिए आभार राम कृष्ण खुराना

parveensharma के द्वारा
November 1, 2010

चाचा जी, दिल को छू लेने वाली कहानी…..भगवान् करे इस दीवाली पर सभी पप्पुओं के पापा उनके साथ ही रहें और उन्हें बंदूक ही नहीं, बल्कि चकरी, अनार और फूलझड़ी भी दिलाएं…..

    R K KHURANA के द्वारा
    November 2, 2010

    प्रिय परवीन जी, आपको मेरी रचना \"मौत का दुःख\" अच्छी लगी जानकर हर्ष हुआ ! भगवान आपकी हर इच्छा पूरी करे ! राम कृष्ण खुराना

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 1, 2010

आदरणीय खुराना जी…………. आपकी इस कहानी ने एक छोटा सा सवाल खड़ा किया है……. मैंने ये कई बार देखा है or भोग भी है……….. और मज़बूरी वश ढो भी रहा हूँ (मतलब आज भी उन बातों को मानता हूँ…) की लोग क्या कहेंगे, ……………… की मौत का ज़रा सा भी गम नहीं ? या मरने वाले के मरने के एक साल तक घर में कोई मांगलिक कार्य नहीं होगा………. घर वाले मंदिर में नहीं जायेंगे………. और न जाने क्या………. पर क्या ये दुःख लोगों को दिखाना जरूरी है…………. क्या आप किसी के दुःख में अपने अपनों के लिए खुशियों में शामिल नहीं हो सकते………… क्या फायदा की आप आज चाचा के मरे में मामा के घर खुशियों में नहीं गए और कल मामा को ही कुछ हो गया तो…………. क्यों जिंदा से ज्यादा हम उस मृतक को महत्व दे देते हैं………. जबकि हमारे धर्म ग्रन्थ कहते हैं की वो मरकर कहीं दूसरी जगह जन्म ले लेता हैं………… तो इक जिन्दा आदमी (जो कहीं और जन्म ले चूका है……… )के लिए कई जिन्दों की खुशियों को बढाने में क्या हर्ज़ है………………… ! मैं नंगे पांव ही पप्पू को उसी प्रकार उठाए बाज़ार की ओर दौड पडता हूं ! ये हर बार क्यों नहीं होता…………. बेहतरीन लेख के लिए हार्दिक बधाई…………….

    R K KHURANA के द्वारा
    November 2, 2010

    प्रिय पियूष जी, मेरी कहानी “मौत का दुःख” के बारे में आपने जो लिखा है वो बिलकुल; ठीक है ! मैंने भी इसी बात का जिक्र किया है ! ” मैं उस भूत की याद में इस वर्तमान को भुला बैठा था !” हम लोग दुखी होने का ढोंग ज्यादा करते है ! इसी बात को इस कहानी में नाकारा गया है ! आपकी अमोली प्रतिक्रिया के लिए आभार ! राम कृष्ण खुराना

    Elouise के द्वारा
    May 26, 2011

    AKAIK you’ve got the asenwr in one!

    Skip के द्वारा
    May 26, 2011

    You’re on top of the game. Thanks for shanirg.

आर.एन. शाही के द्वारा
November 1, 2010

आदरणीय खुराना साहब, सादर प्रणाम! सचमुच दीपावली की पूर्वसंध्या पर इस मार्मिक प्रस्तुति से आपने गमगीन कर दिया । लेकिन न जाने कितने घरों के लिये ऐसी कठोर सच्चाइयां लेकर आते हैं हमारे त्योहार । छत्रछाया देने वाले ही अपने यदि उठ जायं, तो उस दारुण दुख की अभिव्यक्ति तो खैर वर्णनातीत होती है । आपने सधे शब्दों से कारुणिक दृश्यों को जीवन्तता प्रदान कर दी । ईश्वर न करे किसी नौनिहाल को इस दीपावली में ऐसी परिस्थितियों का मुंह देखने की नौबत आए । आपको सपरिवार दीपावली की ढेर सारी शुभकामनाएं ।

    R K KHURANA के द्वारा
    November 2, 2010

    प्रिय शाही जी, आपको मेरी कहानी “मौत का दुःख” ने ग़मगीन कर दिया ! वास्तव में दुःख और सुख दोनों जीवन के पहिये है ! दुःख के कारन ही सुख का महत्त्व है ! जब दुःख के बाद सुख आता है तो उकसा महत्त्व समझ में आता है ! आपकी प्रतिकिर्या के लिए दह्न्यवाद राम कृष्ण खुराना

Aakash Tiwaari के द्वारा
November 1, 2010

क्या सर रुला दिया…. आदरणीय श्री खुराना जी, ऐसी कहानिया दिल में एक अजीब सा भय पैदा कर देती है….शायद ये मेरी भावुकता के कारण हो सकता है…मगर बहुत ही मार्मिक कथा…. आकाश तिवारी http://aakashtiwaary.jagranjunction.com

    R K KHURANA के द्वारा
    November 1, 2010

    प्रिय आकाश जी सच्चाई तो सचाई ही होती है ! दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जो त्यौहार मनाने से वंचित रह जाते है ! इश्वर से प्रार्थना है की सबको खुसी प्रदान करे. ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद ! राम कृष्ण खुराना


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