KADLI KE PAAT कदली के पात

चतुर नरन की बात में, बात बात में बात ! जिमी कदली के पात में पात पात में पात !!

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कच्चे धागे

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कच्चे धागे

राम कृष्ण खुराना

मुझे मेडिकल में एडमिशन मिल गया था ! मैं बहुत खुश थी ! सभी बहुत खुश थे ! एक छोटे से कस्बे से बडे शहर में आना बहुत अच्छा लग रहा था ! हालांकि शहर में मामा-मामी थे ! उनके बेटे यानि बिट्टू भईया थे ! भाभी थी ! बच्चे थे ! परंतु पढाई की वजह से मैंने होस्टल में ही रहना ज्यादा अच्छा समझा ! इससे रिश्तेदारी में प्यार भी बना रहता है और किसी को कुछ कहने का मौका भी नहीं मिलता ! बीच बीच में मैं समय निकाल कर मामा-मामी और भाभी-बच्चों से मिल आती थी ! बिट्टू भईया का बहुत अच्छा गारमेंट का शो-रूम था ! अच्छा बिज़नेस था ! लेकिन उनसे कभी भेंट नहीं हो पाती थी ! पक्के बिज़नेसमैन बन गए थे  ! पैसे के पीर ! जब भी मैं उनके घर जाती तो भईया अपने शो-रूम में होते ! रात को घर लेट ही आते थे ! उनका बस चलता तो शायद वो रात को भी वहीं सो जाते ! इतवार को और छुट्टी वाले दिन तो उनके शो-रूम में बहुत रश होता था ! सो उनका हाल-चाल भाभी से ही पूछ लेती !

हम तीन बहनें ही हैं ! भाई कोई है नहीं ! मैं सबसे छोटी हूं ! सभी मुझे बहुत प्यार करते हैं ! मामा-मामी के साथ बिट्टू भईया भी कभी कभार हमारे यहां हमें मिलने आते रह्ते थे ! परंतु जब से उन्होंने शो-रूम खोला है उनका आना जाना लगभग न के बराबर ही हो गया था ! दोनो बडी बहने दुबली-पतली थीं ! मेरा शरीर थोडा भरा हुआ था ! हालांकि मैं इतनी मोटी नही थी पर बिट्टू भईया मुझे “मोटो” कहकर चिढाते थे ! मैं भी उनको “सुकडू” कहकर अपना बदला चुका लेती थी ! वो जब भी हमारे यहां आते तो मुझे बहुत प्यार करते थे ! मेरे लिए हमेशा कोई न कोई उपहार लेकर आते !

छोटा कस्बा था ! सभी एक दूसरे से प्यार से रहते थे ! सभी एक दूसरे को जानते थे तथा दुख सुख में बराबर शरीक होते थे ! भाई की कमी क्या होती है उस समय मालूम न था ! मैं छोटी थी ! मेरे लिए राखी का मतलब आस-पडौस के लडकों को राखी बांध देना और बदले में टाफी-चाकलेट और मिठाई आदि ले लेना भर था ! राखी बांधने के जो पैसे मिलते थे वो मां रख लेती थी ! थोडी सी बडी हुई तो सोचती थी कि अपना भी भाई होना चाहिए था ! फिर भी इस बात को लेकर कभी ज्यादा मलाल नहीं रहा ! हर राखी पर मां या बडी दीदी बिट्टू भईया को राखी डाक से भेज देतीं थीं ! जब भी हमारे घर से कोई कभी उनके घर जाता या उनके घर से कोई हमारे घर आता तो हमे राखी बांधने (डाक से भेजने) के बदले सूट या कोई अन्य उपहार मिल जाता था !

घर से कभी इस प्रकार इतने दिनो के लिए दूर नहीं रही थी ! पहली बार होस्टल में आई थी ! होस्टल की जिन्दगी भी एक अलग तरह की जिन्दगी होती है ! अपने घर से दूर ! मां-बाप से दूर ! अपनी निजी दुनिया से दूर ! जहां आपको अपने सभी काम खुद ही करने पडते हैं ! अपना ख्याल भी खुद ही रखना पडता है ! अपना भला-बुरा भी खुद ही समझना पडता है ! सम्भल गये तो ठीक वरना बिगडने में कोई देर नही लगती ! जहां आप अपने दिल की हर बात हर किसी से नहीं कह सकते ! सहेलियां थीं ! रूम-मेट भी थी ! लेकिन फिर भी ऐसा लगता था कि कहीं न कहीं कोई कमी है ! कोई चीज़ ऐसी है जो होनी चाहिए थी लेकिन है नहीं ! कोई अपना नहीं था ! कभी कभी दिल बहुत ही उदास हो जाता था ! दिल करता था सब कुछ छोड कर इस पिंजरे तो तोड कर भाग जाऊं ! फिर डाक्टर बनने के सपने के बारे में सोच कर मन मसोस कर रह जाती !

राखी का त्यौहार नज़दीक आ रहा था ! मां हर बार मुझे फोन पर बिट्टू भईया को राखी बांधने की हिदायत देना नहीं भूलती थीं ! साथ में उनकी मनपसन्द मिठाई ले जाने की ताकीद भी रहती थी ! मैं पहली बार बिट्टू भईया को राखी बांधने जा रही थी ! मैं पहली बार ‘अपने’ भाई को राखी बांधने जा रही थी ! मैं बहुत खुश थी ! बहुत उत्साहित थी ! जैसे कोई प्रतियोगिता जीतने जा रही होंऊ ! मन ही मन कई मनसूबे बनाती ! राखी कहां से लेनी है ! किस तरह की लेनी है ! उस पर क्या लगा होना चाहिए ! यदि कुछ लिखा हो तो क्या लिखा होना चाहिए ! फिर मिठाई में क्या लेना है ! मोतीचूर के लड्डू ! नहीं ! सोहन पापडी ! नहीं ! बंगाली रसगुल्ले ! नहीं…नहीं…नहीं ! काजू की बर्फी ! काजू… की… बर्फी ! हां…यह…. ठीक… है ! काजू की बर्फी ही ठीक रहेगी ! लेकिन काजू की बर्फी कहां से ली जाय ! यहां सबसे अच्छी दुकान कौन सी है ? किससे पूंछू ? मामी के घर में से तो किसी से भी नही पूछ्ना है ! उनको बताये बिना ही सरपराईज़ देना है भईया को ! बस बर्फी का डिब्बा और राखी का पैकेट लेकर चुन्नी से अपना सिर ढककर चुपचाप भईया के पास जाकर बैठ जाउंगी ! पहले प्लेट में थोडा सा पानी लेकर सिन्दूर और चावल को अच्छी तरह से मिक्स करके भईया को बडा सा तिलक लगाउंगी ! फिर सुन्दर सी राखी बांधूगी ! उसके साथ ही रेशम की डोरी बांध दूंगी ! भईया की लम्बी उम्र के लिए भगवान से प्रार्थना करूंगी ! उसके बाद डिब्बे में से बर्फी निकाल कर इकट्ठे चार-पांच टुकडियां भईया के मुंह में ठूस दूंगी !

राखी के एक दिन पहले क्लास से दो पीरियड मिस करके बाज़ार गई ! कई दुकाने घूमी ! कई तरह की राखियां देखी ! सबसे अच्छी लेने के चक्कर में तीन-चार घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चला ! बहुत माथा पच्ची करने के बाद एक सुन्दर सी राखी खरीदी ! साथ में डिज़ाईनदार सफेद नगों वाली रेशम की डोरी ली ! सिन्दूर आदि की रेडीमेड प्लेट ली ! अपने रूम में पहुंची तो वारडन मैम का बुलावा आ गया ! इतनी देर होस्टल से गायब रहने के लिए खूब डांट पडी !

राखी खरीद कर मैं बहुत खुश थी ! कई बार लिफाफे में से निकाल कर निहार चुकी थी ! फिर निकालती फिर देखती और सहला कर रख देती ! मन भरता ही नहीं था ! कितनी सुन्दर लगेगी भईया की कलाई पर यह राखी ! कितने मजबूत होते हैं ये कच्चे धागे ! कितना प्यार, कितना विश्वास झलकता है इन रीति-रिवाजों में ! बहन-भाई के प्यार को दर्शाने वाला यह त्यौहार किसी ने बहुत सोच समझ कर बनाया होगा ! काजू की बर्फी कल सुबह ही लेनी पडेगी ! रात को लेकर रख ही नहीं सकती थी ! यह जो होने वाली डाक्टरनियां हैं न मेरी सहेलियां, इनको पता चल गया न कि मिठाई आई है तो पांच मिनट में पूरा डिब्बा खत्म ! भूखी हैं बिलकुल ! कल सुबह जल्दी उठना पडेगा ! नहा-धोकर राखी वगैरह लेकर काजू की बर्फी अच्छे से पैक करा के फिर बिट्टू भईया के घर जाऊंगी ! बिलकुल सुच्चे मुंह ! बिना कुछ खाये-पीये ! कहते हैं कि बहन को सुच्चे मुंह भाई को राखी बांधनी चाहिए ! सच्चे मन से भगवान से भाई की लम्बी उम्र की दुआ करनी चाहिए !

रात को बार बार नींद खुल जाती थी ! ठीक से सो ही नही पाई ! चिंता थी कि कहीं देर न हो जाय ! उठ उठ कर घडी देखती ! सुबह पांच बजे के बाद ऐसी घुरकी लगी कि सात बजे आंख खुली ! जल्दी जल्दी सब काम निपटाये ! नहा-धोकर नया सूट पहना ! निकलते निकलते नौ बज गए ! बहुत देर हो गई थी ! अभी बर्फी लेनी बाकी थी ! बाहर आई तो चारों तरफ भीड ही भीड थी ! कहीं कारों-बसों की चिल्ल पों तो कहीं स्कूटर-मोटर साईकिल की तेज रफ्तारी ! सभी लदे पडे थे ! सभी भाग रहे थे ! किसी के पास बात करने का भी समय नही था ! कोई बस, कोई रिक्शा, कोई आटो खाली नहीं था ! बहुत देर तक इंतज़ार करती रही ! बडी मुश्किल से एक टैक्सी मिली ! सुन्दर डिज़ाईन वाले डिब्बे में बर्फी का गिफ्ट पैक बनवाया ! भईया के घर जाने के लिए भागी भागी बस स्टाप पर आ गई ! जो भी बस आती सवारियों से लदी-पदी आती ! यहां से तो उनका घर बहुत दूर है ! टैक्सी तो बहुत मंहगी पडेगी ! लेकिन कोई टैक्सी भी दिखाई नहीं दे रही ! सौभाग्य से एक बस स्टाप पर आकर रूकी ! बडी मुश्किल से पायदान पर पैर रखने की जगह बना पाई ! बस से उतर कर दौडती-दौडती मामी के घर पंहुची ! घर पहुंच कर पता लगा कि भईया तो कब के शो-रूम में चले गए हैं ! सारी मेहनत, सारी दौडधूप, सारी तैयारियां बेकार ! लेकिन नहीं आज तो राखी है ! फिर तो यह त्यौहार एक साल बाद ही आयेगा !  और मैं तो भईया को पहली बार राखी बांधने जा रही थी ! अपने भईया को ! कोई बात नहीं ! मैं शो-रूम में जाकर ही राखी बांध दूंगी ! लेकिन शो-रूम तक जाने में लगभग दो घंटे लग जायेंगें ! दो बसे बदलनी पडेंगीं ! परवाह नहीं ! उठ कर चल दी ! मामी और भाभी रोकते-बुलाते रहे ! पर मैं न रूकी ! रूकी तो भैया के शो-रूम में जाकर !

शो-रूम में पहुंचते पहुंचते एक बज गया था ! सुबह से कुछ खाया पीया भी नहीं था ! भूख और भागदौड के कारण जान निकल रही थी ! लेकिन मैं अपनी मंज़िल पर पहुंच गई थी ! भईया को राखी बांध कर फिर आराम से खाऊंगी ! प्यास भी बहुत लगी हुई थी ! भईया अपने आप ही कुछ खिला-पिला देंगें ! शो-रूम में रश था ! भईया और मामा जी काउंटर पर थे ! भईया बिल बना रहे थे मामा जी पैसे ले रहे थे ! सभी सेल्समैन अपने अपने काम में व्यस्त थे !

मैं मिठाई का डिब्बा और राखी लेकर भईया के पास काउंटर पर चली गई ! भईया ने एक बार मेरी तरफ देखा ! फिर काम में लग गए ! मैं वहीं पर खडी इंतज़ार करती रही ! दस-पंद्रह मिनट तक इंतज़ार करने के बाद मैंने भईया से कहा – “सारी भईया, देर हो गई ! असल में मैं पहले आपके घर गई थी ! लेकिन आप यहां आ गए थे ! बसों के धक्के खाते खाते आपके पास पहुंची हूं ! मैंने सुबह से कुछ खाया भी नहीं है ! आप थोडा टाईम निकाल कर पहले राखी बंधवा लो !”

भईया ने एक बार नज़र उठा कर मेरी ओर देखा ! हाथ से रूकने का इशारा किया और फिर बिल बनाने लग गए ! बिल बनाकर मेरी ओर मुडे ! काउंटर पर रखा मेरे द्वारा लाया गया बर्फी का डिब्बा और राखी का पैकेट उठाकर काउंटर के नीचे एक तरफ रख दिया ! गल्ले में से कुछ सौ-सौ के नोट निकाल कर मेरी ओर बढा दिए ! मैं अवाक भईया को देखने लगी ! मेरा माथा घूम गया ! मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि मैं क्या करूं ! मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि मैं क्या कंहू ! मेरे आंसू बेकाबू हो रहे थे ! मेरा दिमाग काम ही नहीं कर रहा था ! मैं वहां पर खडी नहीं रह पा रही थी ! मैं एकदम से बाहर की ओर भागी ! मुझे नहीं पता कि मैं होस्टल कैसे पहुंची ! बस अपने कमरे में आकर बिस्तर में मुंह गडा कर बहुत रोई……बहुत रोई…..रोती रही…..रोती रही !

इस बात को आज 27 साल हो गए हैं ! उसके बाद मैं किसी की कलाई पर यह “कच्चे धागे” बांधने का साहस नहीं  जुटा पाई !

राम कृष्ण खुराना

9988950584

khuranarkk@yahoo.in

http://www.khuranarkk.jagranjunction.com



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58 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
July 14, 2012

आपकी लेखनी में जादू है सर कितनी गहरी भावनाओं से तैयार कहानी है. शुक्रिया सर

    R K KHURANA के द्वारा
    July 14, 2012

    प्रिय यमुना जी, मेरी कहानी “कच्चे धागे” पर आपकी प्रतिक्रिया ने मेरे लिए उर्जा का काम किया है ! आपका धन्यवाद् ! राम कृष्ण खुराना

    R K KHURANA के द्वारा
    September 29, 2012

    what ?

    R K KHURANA के द्वारा
    September 29, 2012

    Virus ????

    R K KHURANA के द्वारा
    July 14, 2012

    what ???

Kailan के द्वारा
May 26, 2011

Hey, subtle must be your midlde name. Great post!

    R K KHURANA के द्वारा
    July 14, 2012

    Thanks

Bryson के द्वारा
May 26, 2011

You’re a real deep thinker. Thanks for shraing.

    R K KHURANA के द्वारा
    July 14, 2012

    Dear Mr. Bryson, Thanks for your comments

Alka Gupta के द्वारा
December 6, 2010

श्री खुराना जी, अभिवादन   , मर्म को छूने वाली बहुत ही मार्मिक कहानी है। 

    R K KHURANA के द्वारा
    December 7, 2010

    सुश्री अलका जी, मेरी रचना “कच्चे धागे” आपके दिल को छू गई ! आपके स्नेह के लिए अति आभारी हूँ ! राम कृष्ण खुराना

kmmishra के द्वारा
September 8, 2010

चाचा प्रणाम । हाल आफ फेम में आने के लिये बहुत बहुत बधाई । आपका मेल न मिला होता तो मुझे पता ही न चलता । इधर आप भी छुट्टी पर चले गये हैं ।

    R K KHURANA के द्वारा
    September 9, 2010

    प्रिय मिश्र जी, आपकी बधाई के लिए धन्यवाद् तथा वो अंग्रेजी में कहते हैं न “सेम टू यू” ! मुझे मालूम था की आप व्यस्त हैं इसलिए मैंने आपको मेल डाली थी ! मैं छुट्टी पर नहीं हूँ बस कुछ परेशानी सी चल रही है ! जब भी कुछ लिखने बैठता हूँ तो मन एकाग्रचित नहीं हो पाता ! फिर भी मैं जल्दी ही एक रचना लेकर आप लोगो के सेवा में उपस्थित हो रहा हूँ !

Arvind Pareek के द्वारा
September 8, 2010

प्रिय श्री खुराना जी, जागरण जंक्शन “हॉल ऑफ फेम” में चयनित होने पर बहुत-बहुत बधाई । आप इसी तरह आजीवन हमें अपनी अच्‍छी-अच्‍छी रचनाओं से सरोबार करते रहें । अरविन्‍द पारीक

    R K KHURANA के द्वारा
    September 8, 2010

    प्रिय अरविन्द जी, “हॉल ऑफ फेम” में चयनित होने पर आपकी बधाई के लिए मैं दिल से आपका आभारी हूँ ! आपका स्नेह हमेशा मिलता रहता है और मेरा होसला बढ़ता रहता है ! धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना

R K KHURANA के द्वारा
September 6, 2010

प्रिय साथियों, आज जागरण जंक्शन द्वारा मुझे जागरण जंक्शन “हॉल ऑफ फेम” में चयनित किया गया है ! इसके लिए आप सब लोगो को लाख लाख बधाई ! यह सब आप लोगो के स्नेह, आशीर्वाद और विश्वास के कारण ही संभव हो सका है ! आप लोगो के प्यार के बिना मेरा इस मुकाम पर पहुंचना कठिन था ! इसके साथ ही मैं जागरण जंक्शन टीम का भी धन्यवादी हूँ जिसने मुझे इस काबिल समझा ! मैं आपको विश्वाश दिलाता हूँ की मैं आप लोगो के विश्वास को बरकरार रखूंगा ! एक बार फिर धन्यवाद सहित ! राम कृष्ण खुराना

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
September 6, 2010

बहुत ही मार्मिक कहानी लिखी है आपनें । बहुत अच्‍छी लगी । मैं इस मंच पर भाईजी की कृपा से यानि पारीक जी के सहयोग से आया हूँ । मैंनें अपनी यात्रा की एक पोस्‍ट लिखी है । इस पर आपके विचार चाहूँगा । दीपक जोशी

    R K KHURANA के द्वारा
    September 6, 2010

    प्रिय दीपक जी, मेरी कहानी \"कच्चे धागे\" के लिए आपका स्नेह मिला ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए मैं बहुत आभारी हूँ. ! आप सब लोगों की शुभकामनायों का ही परिणाम है की मुझे आज \"जागरण जक्शन के हाल ऑफ फेम\" में स्थान मिला है फिर आपने अरविन्द जी का नाम लिया है जो की हमारे बहुत ही प्रिय है ! मैं उनका बहुत आदर करता हूँ ! मेरे लेख जो की \"कदली के पात\" के अंतर्गत प्रकाशित हो रहे है यह उनके दिए गए टाईपिंग के टिप्स पर ही संभव हो सका ! मेरा उन्हें नमस्कार कहना ! धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना

    दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
    September 10, 2010

    अरविन्‍द जी को मैंनें आपका नमस्‍कार पहुँचा दिया है । वे आपकी बहुत तारीफ कर रहे थे व आपको भी नमस्‍कार बोला है । सोमवार को मैं अपनी अगली पोस्‍ट डालनें का प्रयास करूँगा । आशा है आप अवश्‍य अपनी राय से अवगत करायेंगें ।

    R K KHURANA के द्वारा
    September 10, 2010

    प्रिय दीपक जी, अपका बहुत बहुत धन्यवाद ! आपको अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा ! खुराना

    Kalie के द्वारा
    May 26, 2011

    Now that’s sublte! Great to hear from you.

    Melloney के द्वारा
    May 26, 2011

    You’re a real deep tihenkr. Thanks for sharing.

    R K KHURANA के द्वारा
    July 31, 2012

    OK

    R K KHURANA के द्वारा
    September 29, 2012

    Thanks for your comments

    R K KHURANA के द्वारा
    October 29, 2012

    Thank you Kalie

    R K KHURANA के द्वारा
    October 29, 2012

    Thanks Melloney

Piyush Pant के द्वारा
September 2, 2010

बहुत सुन्दर कहानी है ये…… वास्तव में हमें आपस में बाँधने वाले ये रिश्ते ही है….. और जब तक इन रिश्तों के प्रति सम्मान है ………….तब तक जीवन का महत्व है…….. अन्यथा और है ही क्या. दुनिया में…………….. बहुत अच्छा लगा पढ़ कर………….

    R K KHURANA के द्वारा
    September 2, 2010

    प्रिय पियूष जी, आपको मेरी कहानी “कच्चे धागे” अच्छी लगी जानकर होसला बढ़ गया ! ऐसे ही स्नेह बनाये रखें १ राम कृष्ण खुराना

K M Mishra के द्वारा
August 27, 2010

सच में आज राखी के धागे की कीमत बस सौ के कुछ नोट या फिर साड़ी या सूट । प्रेम का यह स्रोत भी अब सूखने लगा है ।

    R K KHURANA के द्वारा
    August 28, 2010

    प्रिय मिश्र जी, मेरी कहानी “कच्चे धागे” के बारे आपका स्नेह प्राप्त हुआ ! आज के रिश्तों तो उजागर करना ही मेरा उद्धेश्य था ! आप लोगो के प्यार से लगता है मैं इसमें सफल रहा हूँ ! आपकी अमूल्य प्रतिक्रिया के लिए आभार हूँ ! राम कृष्ण खुराना

sumityadav के द्वारा
August 27, 2010

भावनाओं से जुड़ी और आज के दौर में रिश्तों के बीच आई दूरियों और औपचारिकता को प्रदर्शित  करती कहानी। त्यौहार भी अब बस औपचारिकताएं ही रह गई हैं जिन्हें निभाना पड़ता है। अब पहले जैसी रिश्तो की गर्माहट खत्म हो चुकी है। 

    R K KHURANA के द्वारा
    August 27, 2010

    प्रिय सुमित जी, रिश्तो का बनावटीपन ही रह गया है आजकल ! बोझ को उतारने की ओपचारिकता भर निभाते हैं हम लोग ! मेरी कहानी “कच्चे धागे” के लिए आपकी प्रतिक्रिया ने मेरा होसला बढाया है ! धन्यवाद राम कृष्ण खुराना

NIKHIL PANDEY के द्वारा
August 26, 2010

कथा मार्मिक है पर बदलते समय और परिवेश को चित्रित कर रही है …हम जिंदगी की दौड़ में सबकुछ दांव पर लगाने के लिए तैयार है…भावनाओं को भी… सब चीजो को सौदेबाजी के नजरिये से देखते है

    R K KHURANA के द्वारा
    August 27, 2010

    प्रिय निखिल जी, मेरी रचना “कच्चे धागे” के लिए आपका स्नेह प्राप्त हुआ ! आज कल के रिश्ते केवल पैसे के नजरिये से ही देखे जाते है ! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना

soni garg के द्वारा
August 26, 2010

भाई आजकल अपनी बहिन के प्यार को ऐसे ही तोलते है !

    R K KHURANA के द्वारा
    August 26, 2010

    प्रिय सोनी जी, मेरी कहानी “कच्चे धागे” के बारे आपका स्नेह मिला ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद ! राम कृष्ण खुराना

आर.एन. शाही के द्वारा
August 26, 2010

व्यावसायिकता भावनात्मक रिश्तों की कोमलता के प्रति कितनी निष्ठुर हो सकती है, आपकी ये मार्मिक रचना एक उत्कृष्ट उदाहरण है खुराना साहब । बहुत दिनों बाद ही सही, एक बेहतरीन प्रस्तुति के लिये साधुवाद ।

    R K KHURANA के द्वारा
    August 26, 2010

    प्रिय शाही जी, मेरी रचना “कच्चे धागे” में आपको मार्मिकता की झलक मिली ! मेरा होंसला दुगना हो गया ! आप जैसे शीर्ष लेखक की प्रतिक्रिया उर्जा का काम करती है ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए अति धन्यवादी हूँ ! राम कृष्ण खुराना

Anita Paul के द्वारा
August 26, 2010

आदरणीय खुराना जी, राखी के धागों की लाज रखने वाले बहुत कम होते हैं. अपने सगे भाई को छोड़ बाकी तो इसे यही समझते हैं कि लड़कियों के कमाने का जरिया है राखी. उन्हें ये बिलकुल नहीं भान होता कि ऐसा सोचके वो किसी की भावना के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं.

    R K KHURANA के द्वारा
    August 26, 2010

    प्रिय अनीता जी, आपने दुनिया की चाल को सही पहचाना है ! यही बात मैं भी अपनी कहानी “कच्चे धागे” में बताना छह रहा था ! आपकी प्रतिक्रिया से लगता है की मैं इसमें सफल हुआ हूँ ! आपकी स्नेह के लिए आभार ! राम कृष्ण खुराना

rita singh 'sarjana' के द्वारा
August 25, 2010

आदरणीय अंकल जी , दिल को छु लेने वाली कहानी l भाई -बहनों के पवित्र पर्व राखी महज एक परंपरा नहीं है l आपने इस कहानी के माध्यम से आज की बदलती हुई स्थिति को बहुत सुन्दर ढंग से चित्रित किया है l बधाई स्वीकार करें l

    R K KHURANA के द्वारा
    August 26, 2010

    प्रिय रीता जी, मेरी कहानी “कच्चे धागे” के लिए आपकी प्रतिक्रिया मिली ! कहानी ने आपके ऊपर प्रभाव डाला जानकर अच्छा लगा ! प्रतिक्रिया के लिए आपका शुक्रिया ! राम कृष्ण खुराना

Ramesh bajpai के द्वारा
August 25, 2010

मेरे द्वारा लाया गया बर्फी का डिब्बा और राखी का पैकेट उठाकर काउंटर के नीचे एक तरफ रख दिया ! गल्ले में से कुछ सौ-सौ के नोट निकाल कर मेरी ओर बढा दिए ! मैं अवा…. आदरणीय भाई जी भावनाओ को झकझोरती रचना सब कुछ कह गयी बहुत बहुत आभार

    R K KHURANA के द्वारा
    August 26, 2010

    प्रिय रमेश जी, आपको मेरी रचना “कच्चे धागे” अच्छी लगी ! यह कहानी आजकल के बदलते रिश्तों की कहानी है ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद ! राम कृष्ण खुराना

chaatak के द्वारा
August 25, 2010

बढती भौतिकता ने रिश्तो को अब व्यवहारिक जीवन से बाहर कर दिया है आपकी कहानी न जाने कितने भाई-बहनों की हकीकत है | शायद इसलिए साहित्य को समाज का आइना कहते हैं, बशर्ते लिकने वाला ईमानदार हो| बधाई!

    R K KHURANA के द्वारा
    August 25, 2010

    प्रिय चातक जी, हमेशा की तरह आपका प्यार मेरी कहानी “कच्चे धागे” की प्रतिक्रिया के रूप में मिला ! मैं आप लोगो का दिल से आभारी हूँ जो आप लोग मुझसे इतना स्नेह रखते है ! कहानी यही सफल कहलाती है तो आस पास की लगे ! ईमानदारी तो हर काम में जरूरी है ! इसके बिना तो आप कहानी में रंग भर ही नहीं सकते ! आपके स्नेह के lie dhanyawad ! R K KHURANA

ARVIND PAREEK के द्वारा
August 25, 2010

प्रिय श्री खुराना जी, मन को छु लेने वाली व कहीं गहरे चोट करने वाली कहानी है भाई-बहन के रिश्‍ते पर कच्‍चे धागें । यह काल्‍पनिक भी नहीं लगती । ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई सच्‍ची घटना है । एक अच्‍छी कहानी के लिए आपके ही शब्‍दों में साधुवाद । अरविन्‍द पारीक

    R K KHURANA के द्वारा
    August 25, 2010

    प्रिय अरविन्द जी, आपको मेरी कहानी “कच्चे धागे” छू गयी ! कहानी कहने का मकसद भी यही होता है की पढने के बाद आदमी सोचने पर मजबूर हो जाय ! उसके दिल पर चोट सी लगे ! कहानी को अपने आस पास घटित होता हुआ महसूस करे ! हाँ, आप ने ठीक कहा ! आपके अनुभव की और आपकी पारखी नज़रों की मैं तारीफ करता हूँ ! वास्तव में यह कहानी एक छोटे से सच पर ही आधारित है ! मैंने खुद एक बहन को अपने “बनाये हुए भाई” के हाथों यह पीड़ा भोगते हुए देखा था ! बात बहुत ही पुरानी है ! शायद सन 1962 -63 की होगी ! मैं दिल्ली अपने मामा जी के यहाँ आया हुआ था ! उनका जनरल स्टोर था ! मामा जी के लड़के ने ही ऐसा किया था ! बहुत छोटी सी घटना थी ! मेरे सामने तो वो लड़की आई उसने राखी के लिए कहा तो भाई ने बिना राखी बंधवाए ही उसे पैसे पकड़ा दिए ! बस सिर्फ यही एक लाइन थी जो सच है ! बात मेरे मन में घर कर गयी ! बाकी कहानी तो मेरी कल्पना का ही तानाबाना है ! इधर जागरण से राखी के लिए लिखने का निमंत्रण मिला तो यह बात मेरे मन में कौंध गयी ! सोचा यही सच्चाई बयां कर दूं ! परिणाम आपके सामने है ! आपके स्नेह के लिए आपका धन्यवाद् ! राम कृष्ण खुराना

NAVEEN KUMAR SHARMA के द्वारा
August 25, 2010

चाचा जी आपने बहुत ही मार्मिक और ह्रदयस्पर्शी लेख लिखा है आपने आपने सही कहा है कि आज राखी के बदले पैसों का लेन देन हो गया है आज के दौर में कोई रिश्ता नाता नहीं रह गया है नवीन कुमार शर्मा बहजोई (मुरादाबाद ) उ . प्र . मोबाइल नम्बर – 09719390576

    R K KHURANA के द्वारा
    August 25, 2010

    प्रिय नवीन जी, आजकल की सामाजिक बुराइयां हमारे रिश्तो पर भी असर डाल रही हैं उसी का परिणाम है यह ! मेरी रचना “कच्चे धागे” के लिए आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका धन्यवाद् ! राम कृष्ण खुराना

rkpandey के द्वारा
August 25, 2010

आदरणीय खुराना जी, बेहद मार्मिक और हृदय स्पर्शी रचना है यह. पढ़ कर मन भर आया. राखी के धागों का मोल केवल पैसे का लेनदेन हो चला है शायद ये हमारे संस्कार की कमीं दर्शाता है. दोष कहॉ पर है हमें जानना होगा नहीं तो यह् पर्व केवल एक मखौल बनके रह जाएगा.

    R K KHURANA के द्वारा
    August 25, 2010

    प्रिय पाण्डेय जी, आपको मेरी कहानी “कच्चे धागे” पसंद आई ! जानकर अच्छा लगा ! आज तो हर रिश्ता एक मजबूरी बन कर रह गया है ! इस पवित्र रिश्ते को भी कई लोग दागदार कर रहे हैं ! यह सुनकर मन विचलित हो जाता है ! इसका अंत क्या होगा पता नहीं ! आपके स्नेह के लिए आभार ! राम कृष्ण खुराना


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