KADLI KE PAAT कदली के पात

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प्रभु का सिमरण सबसे ऊंचा

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प्रभु का सिमरण सबसे ऊंचा

एक चोर था ! बडा शातिर ! सभी जानते थे कि वह चोर है ! उस गांव के तथा आस-पास के गांवों में जितनी भी चोरियां होती थीं सबके लिए वही जिम्मेदार था ! परंतु वह इतनी सफाई से चोरी करता था कि कभी पकडा नही गया ! चोरी करने की सभी बारीकियों से वाकिफ ! वो अपनी पत्नी और इकलौते बेटे के साथ गांव के नज़दीक ही पहाडी पर एक झोंपडी में रहता था !  चोरी का सामान भी वहीं पहाडी में एक गुफा में छिपा कर रखता था जिससे तलाशी की नौबत आने पर भी पकडा न जा सके !

चोरी करते-करते उम्र के आखरी पडाव में आ पहुंचा !  अक्सर बीमार भी रहने लगा था !  उसे आभास होने लगा कि अब उसके जीवन के दिन थोडे ही हैं !  एक दिन उसने अपने बेटे को बुलाकर उसे चोरी के सारे गुर सिखा दिये और जहां पर उसने चोरी का सामान छुपाया था वह जगह भी दिखा दी ! भगवान की ऐसी कुदरत हुई कि कुछ दिनों बाद ही वो चल बसा !

अब मां-बेटे अकेले रह गए ! धीरे-धीरे पिता द्वारा छोडा चोरी का सामान समाप्त होने लगा ! तब बेटे ने अपनी मां से कहा – “मां, मैं कुछ काम करना चाहता हूं ! बताओ कौन सा काम करूं !”

“यह भी कोई पूछ्ने की बात है ?” मां ने समझाया -“बेटा तुम्हारे पिता चोरी किया करते थे ! तुम भी उस धंधे को आगे बढाओ और चोरी करो !

 “बिलकुल ठीक है मां ! मैं कल से चोरी करने जाऊंगा” – बेटे ने उत्तर दिया !   

“लेकिन चोरी करने जाने से पहले मेरी दो बातें ध्यान से सुनो और अपनी गांठ बांध लो !” मां ने फिर समझाया – “पहली बात तो यह है कि अगर तुम चोरी के इल्जाम में पकडे जाओ तो कभी भी अपनी चोरी कबूल मत करना ! चाहे लोग तुम्हें जान से ही मार दें ! और दूसरी बात कभी किसी मन्दिर, मस्जिद. गुरुद्वारे या किसी भी धार्मिक स्थान के आगे से नहीं गुजरना !  यदि किसी मजबूरी वश तुम्हें किसी धार्मिक स्थान से गुजरना ही पडे तो अपने दोनो कान अच्छी तरह से बन्द कर लेना जिससे वहां की कोई आवाज़ तुम्हारे कान में न पडे !”

मां की दोनो बातें गांठ बांधकर वो चोरी करने लगा ! अपने पिता की तरह वो भी इतनी चालाकी से चोरी करता कि पकडा नहीं जाता !  परंतु सब गांव वाले जानते थे कि वह चोर है ! 

प्रभु की ऐसी कृपा हुई कि एक दिन वह किसी दूसरे गांव से आ रहा था ! बरसात के मौसम के कारण गांव में जगह-जगह पर पानी भरा हुआ था ! जिस रास्ते से वो अपने घर जाता था पानी के कारण वो रास्ता बन्द हो गया था ! उसने सोचा चलो आज दूसरे रास्ते से चलते हैं ! लेकिन दूसरे ही क्षण उसे ध्यान आया कि उस रास्ते में एक मन्दिर पडता है ! उसे मां की दी शिक्षा याद आ गई ! उसने अपने दोनो कान उंगलियां डाल कर जोर से बन्द कर लिए ! परंतु थोडी दूर जाने पर सडक पर पानी ज्यादा होने के कारण उसका पायजामा भीगने लगा ! तो उसने अपने हाथ कानो से निकाल कर अपना पायजामा उंचा करके पकड लिया ! इसी दौरान वह चोर मन्दिर के सामने पहुंच चुका था ! मन्दिर में एक महात्मा जी प्रवचन कर रहे थे ! उसी सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि – “देवी-देवताओं की न तो कभी आंख झपकती है और न ही उनकी परछाईं पडती है !”

इतनी बात उस चोर के कानों में पड गई ! उसे झट से अपनी मां को दिया हुआ वचन याद आया ! उसने पायजामा छोड कर फिर से अपनी उंगलियां कानों में ठूस लीं ! परंतु उसके कान में महात्मा की देवी-देवताओं वाली बात पड गई थी !

समय गुजरता गया ! चोर अपनी चालाकी से चोरियां करता रहा और घर सुचारू रूप से चलता रहा ! ऐसे ही चोरी करते-करते एक दिन उसने पास के गांव के एक बडे जमींदार के घर चोरी की ! मौके पर चोर पकडा नहीं गया पर सब जानते थे कि चोर वही है ! जमींदार बडा रसूक वाला था ! वो राजा को बहुत सारा अनाज व धन लगान के रूप में देता था ! राज दरबार में उसका बहुत सम्मान था ! जमींदार ने राजा को चोरी होने की शिकायत की तथा उस चोर पर अपना शक जाहिर किया !  

चोर को राजा के सामने पेश किया गया ! परंतु चोर ने अपने आप को निर्दोष बताया ! राजा ने हर तरह से चोर से चोरी उगलवाने का प्रयत्न किया परंतु चोर को मां की सीख याद थी ! उधर जमीन्दार का दबाव बढता जा रहा था तथा सभी गांव वाले उसी को चोर ठहरा रहे थे ! राजा भी परेशान हो गया ! जब तक जुर्म साबित न हो जाय या चोर अपनी चोरी कबूल न कर ले उसे सज़ा नहीं दी जा सकती !

अंत में राजा ने अपने राज्य में घोषणा करवा दी कि जो भी इस चोर से चोरी कबूल्वा देगा उसे इनाम दिया जायगा ! साथ ही यह भी ऐलान कर दिया कि अगर कोई चोरी न कबूल करवा सका तो उसे फांसी दे दी जायगी !

घोषणा सुनकर कई लोग आए ! सबने चोर से अपने अपने तरीके से चोरी कबूल करवाने का प्रयत्न किया लेकिन सफल न हो सके ! अंत में एक महिला ने राजा के पास आकर कहा कि वह इस चोर से चोरी मनवा लेगी ! राजा ने उसे सात दिन का समय दिया और साथ में हिदायत दी कि यदि सात दिनों में वह चोरी नही मनवा पाई तो उसे फांसी दे दी जायगी !

अब वह महिला रोज़ उस चोर के पास आकर तरह तरह से उससे जुर्म कबूल करवाने का प्रयास करती ! ऐसे ही 6 दिन बीत गए ! अब उसके जीवन का केवल एक दिन ही बचा था ! आखरी दिन वह महिला रात को एक देवी का रूप धारण करके उसके पास आई ! आते ही उसने चोर से कहा –“मैं एक देवी हूं ! मैं जानती हूं कि तुमने चोरी की है ! तुम देवी से झूठ नहीं बोल सकते मुझे सच सच बताओ तुमने चोरी कैसे की ?”

वो चोर उस महिला के झांसे में आ गया ! उसने सोचा कि अब देवी से क्या झूठ बोलना ! मुझे सब सच सच बता देना चाहिए ! यह सोचकर वो अभी सारा सच बताने ही वाला था कि उसने देखा कि देवी अपनी पलकें झपका रही थी ! उसने ध्यान से देखा तो उस कमरे में जल रहे दिये से उस देवी की परछांई भी पड रही थी ! चोर को मन्दिर के महात्मा जी की बात याद आ गई ! उन्होंने कहा था कि “देवी-देवताओं की न तो आंख झपकती है और न ही उनकी परछाईं पडती है

फिर इस देवी की तो पलक भी झपक रही है और परछांई भी पड रही है ! चोर समझ गया कि यह तो वही महिला देवी का रूप बनाकर मुझसे जुर्म कबूल करवाना चाहती है ! उसने एकदम से बात बदल कर हाथ जोडकर कहा -“देवी जी, आप तो सब बातें जानती हैं ! मैं चोर नहीं हूं ! मैंने चोरी नहीं की ! यह लोग मुझे जबरदस्ती फसाना चाहते हैं !”

रात बीत गई ! वो महिला भी उससे चोरी कबूल नहीं करवा सकी ! दूसरे दिन राजा ने चोर को बुलाया और कहा –“तुम्हारे खिलाफ चोरी का कोई भी सबूत नहीं मिला है ! अतः तुम पर चोरी का इल्ज़ाम नहीं लगाया जा सकता ! हम तुम्हें बाईज्जत बरी करते हैं ! जितने दिन हमने शक के कारण तुमको बन्दी बनाकर रखा उसके लिए हम तुम्हें ईनाम देंगें !”

इतना कहकर राजा ने उस चोर को बहुत सारा इनाम देकर विदा किया !

चोर इनाम लेकर अपने घर वापिस आ गया ! उसने अपनी मां को वो सारा सामान जो राजा से इनाम के रूप में मिला था दे दिया ! रात को उसकी मां तो सो गई लेकिन वो चोर सो न सका वो चारपाई पर लेटा लेटा सोचता रहा…सोचता रहा ! मैं दिन रात चोरी करता हूं ! पाप की कमाई खाता हूं ! कभी भगवान का नाम नहीं लिया ! मां के कहने पर किसी मन्दिर में नहीं गया ! उस महात्मा कि केवल एक लाईन ही सुनी थी ! सिर्फ एक लाईन ! और उस लाईन ने ही मेरी जान बचा दी ! वरना आज मैं जेल में होता ! अगर मैं अपना जीवन भगवान के चरणों में लगा दूं तो मेरा सारा जीवन संवर जायगा !

प्रातः अपनी मां के उठने से पहले उठकर उसने अपनी मां के पैर छूकर प्रणाम किया और घर से निकल पडा ! फिर उस चोर को किसी ने नहीं देखा !

[ एक सत्संग में सुनी कथा के आधार पर ]

 

http://www.khuranarkk.jagranjunction.com

 



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aniket verma के द्वारा
June 17, 2011

namaste pandit ji mai ANIKET VERMA d.o.b-10 sep 1989, janamsthan- agra, time- 7;25 mere dost nai ban pate h aur jo bante hai wo kuch time baad bolna band kar dete h ek bhai jaisa dost jiska naam rahul usne haal hi mai mjse relatn tod dia hai hum bhai jaise the usme ghamand bahut hai har cheej ka mai chahta hu k wo khud mere paas aaye wo hamesa mjse bolna band kar deta h par janta hu wo mje b acha dost manta h plzzz mera jald hi upay bataye aur jo jaldi kaam kare……..apki kripa hogi

    R K KHURANA के द्वारा
    August 17, 2013

    प्रिय अनिकेत जी, सबसे प्यार से रहिये ! प्यार बांटिये आवर प्यार से बोलिए ! दोस्त अपनी आप बन जायेंगे ! खुराना

प्रेम सिलही के द्वारा
August 10, 2010

बहुत मनोरंजक कहानी है| अच्छी लगी| लेकिन प्रभु का सिमरण सबसे ऊंचा शीर्षक देकर इस कहानी को एक नई संज्ञा देते हुए आप बुद्धिजीवी के मन में एक विवाद खड़ा कर रहे हैं| प्रभु का सिमरण व्यक्तिगत भावना और विश्वास है जो मनुष्य में निरंतर पनपती उस पुण्य आत्मा का अंग है जो उसके जीवन को सार्थक बनाये रखती है| स्वार्थहीन, सत्य का पालन कर वह समाज में अच्छे व्यवहार व कर्मों द्वारा जीवन यापन करता है|  समस्त भारत में भ्रष्टाचार और सामाजिक अनैतिकता के वातावरण में कही यह कहानी और ऐसी ही अन्य कहानियां केवल मनोरंजन हेतु सत्संग में भीड़ एकत्रित करने में अवश्य सफल होती हैं| और हाँ, धर्म के धंधे में बहुत पैसा है| अधिक भीड़, और भी अधिक पैसा| परन्तु प्रश्न है कि सत्संग का क्या हुआ? मंदिर, मस्जिद, गुरद्वारे अथवा दूसरे धार्मिक स्थान को यदि मनोरंजन सभा बना दिया जाये तो धर्म व आदर्श सीखने के लिए कहाँ जाना होगा? स्वतंत्रता के पहले मंदिर बहुत कम संख्या में दूर पहाड़ों में या धार्मिक स्थलों में होते थे जहां केवल श्रदालू भगत पहुँचते थे| जीवन में यह अभ्यास छोटे बड़े सभी में नम्रता को जन्म देता था| घर में बड़े-बूढों के साथ रहते बच्चों में चरित्र का निर्माण होता था| आज जब गली गली मुहल्लों में मंदिर, मस्जिद, और गुरद्वारे स्थित हैं तो इन पन्नों पर भगवान बाबू की प्रतिक्रिया व्यावहारिक रूप से उपयुक्त प्रतीत होती है क्योकि सत्संग में कही इन कहानियों से पथभ्रष्ट हो मनुष्य में प्रभु और धर्म के तत्व को समझने व जीवन में अपनाने की गंभीरता मिट जायेगी|

    R K KHURANA के द्वारा
    August 14, 2010

    प्रिय प्रेम जी, “प्रभु का सिमरन सबसे ऊंचा” कहानी आपको बहुत मनोरंजक लगी ! धन्यवाद् ! परन्तु इसके शीर्षक ने आपको बहस में डाल दिया ! शायद आपको प्रभु का सिमरन ऊंचा होने पर आपत्ति है ! जब भी कोइ रचना पढ़ी जाती है तो उसके पढने वाले उसे अपनी सुबिधानुसार अपने अपने विचार से अलग अलग ढंग से लेते है ! किसी को कोइ बात पसंद आती है तो किसी को कोइ और ! कोइ उसी बात को नापसंद करता है तो कोइ उसकी तारीफ ! आपकी बातों में विरोधाभास मिलता है ! आप उसको मानते भी है परन्तु मानने से इंकार भी करना चाहते है ! आप कहानी को मनोरंजन के साधन के रूप में लेते है भाव को छोड़ देते है ! आपने कहा की स्वतंत्रता के पहले केवल श्रद्धालु भक्त मंदिर जाते थे ! यह कहानियां भी आज की नहीं हैं ! उस ज़माने, या उससे भी पहले के ज़माने की ही हैं ! केवल उसका रूप बदला है ! सन्देश वही है ! आपके कहने के अनुसार बहस के कई मुद्दे बन जायेंगे ! परन्तु उनका परिणाम जो होगा वो आप भी जानते हैं और मैं भी जानता हूँ ! बहस इस बात से शुरू हो सकती है की भगवान है या नहीं ! फिर भगवान् को आप मानते हैं या नहीं ! फिर संतो के प्रवचनों को आप किस प्रकार से लेते है ! केवल मोनोरंजन के लिए या उसमे से कुछ और प्राप्त करने के लिए ! आदि….आदि…! आपको सत्संग पर भी कुछ एतराज़ है ! सत्संग या मंदिर प्रार्थना करने या भगवान् का नाम लेने के लिए एक अलग शुद्ध स्थान माना जाता है ! जिस प्रकार हम रसोई में खाना पकाते है ! शयन कक्ष में सोते है ! गुसलखाने में नहाते हैं उसकी प्रकार मंदिर में, सत्संग में प्रार्थना करते है ! बहस करने के लिए तो बहुत विषय है परन्तु मैं फिर कहूँगा की उसके परिणाम सबको मालूम है ! किसे ने कहा है : चमन को देख तो सिर्फ फूल पात को न देख यानि कि जान को पहचान, खाई बिसात को न देख ! यह मत देखो की सामने वाले ने आपको क्या खिलाया है ! यह देखो की उनसे कितने प्यार से, किस भावना से खिलाया है ! बात आप पुराने ज़माने की कर रहे है ! पुराने ज़माने में श्री राम ने पिता के वचन को निभाने के लिए राज पाठ छोड़ कर १४ साल का बनवास जाने को प्रार्थमिकता दी ! शायद आज का “बुद्धिजीवी” पुत्र अपने पापा से विद्रोह कर देता और अपनी पत्नी को लेकर अलग घर बसा कर रहने लगता ! फिर यदि पुत्र मान जाता तो पत्नी तलाक लेकर मायके चली जाती ! यह तो आप पर निर्भर करता है की आप सत्संग से क्या लेकर जाते है ! ढोंगी बाबायों के कारण आज ‘भगवान्’ पर शक किया जाता है ! लेकिन जरूरी नहीं है की आप ऐसे ‘संतो’ की बात को अँधा धुंध मान लें ! आप तो अपने मतलब की चीज़ निकल के ले जा सकते है ! आप वहां से क्या लेते है यह तो आप पर ही निर्भर है ! आज के आर्थिक युग में हर चीज़ को पैसे की नज़र से ही देखा जाता है ! इसी लिए आपका कहना भीड़ में पैसा बहुत है जायज है ! लेकिन यह कहानिया पथभ्रष्ट नहीं करती ! पथभ्रष्ट होने के लिए आज के नौजवानों के पास और बहुत से साधन है ! जिन्हें रोकने के लिए आप-हम कुछ भी नहीं करते !…. कितनी बहस करेंगे ? कितनी बहस में पड़ेंगे ? क्या लाभ होगा ? आप कहते जाओ मैं सुनता जाऊँगा ! मैं कहता जाऊँगा आप सुनते रहोगे ! अंत ….??? अंत में क्या …..???? खैर ….आपने समय निकाल कर प्रतिक्रिया की आपका आभारी हूँ ! राम कृष्ण खुराना

bhagwanbabu के द्वारा
August 1, 2010

आप इस जागरण मंच पर चाचाजी के नाम से जाने जाते है और एक चाचाजी होने के नाते आपने ठीक वैसे ही कहानी सुनाई, चाहे आपने ये कहानी किसी सत्संग से लेकर लिखी हो या खुद कोई फर्क नही पड्ता। आपने अपना काम बखूबी किया है। इस देश के हर गली में, हर घर में यहाँ तक की टीवी के अनगिनत चैनलो पर रोजाना इतनी सारी कहानियाँ गढी जाती है कि अब ये सारी बातो मे कोई रस नही रह गया है, अगर आप इसे प्रभु का सिमरण कहकर उँचा काम बताते है तो मै आपको बता दूँ कि आने वाली पीढियों मे इस प्रभु के लिये बहुत बडा खतरा साबित होगा। खतरा तो मुझे आज भी दिखाई पड रहा है क्योकि बेवजह के सत्संगो मे जाकर लोग और भी अंधेरे मे जा रहे है। जो सिर्फ प्रभु का सिमरण एक तकिया-कलाम की तरह ले रहे है, जिनसे सिफॅ उन्हें प्रभु का भ्रम है, वो प्रभु के डर की वजह से वो सुमिरन कर रहे है, आप ये बताईये कि ये करने से क्या होगा? कब तक ये ढोंग चलता रहेगा? और आपके कहानी मे महानता चोर की है न कि उस सत्संग की, अगर सत्संग मे खूबी होती तो उस सत्सग मे आये और भी हजारो श्रोता जो थे उनकी कहानी छ्पती, न कि चोर कि। जब कोई किसी काम को पूरी तल्लीनता के साथ डूबकर करता है तो एक दिन ऐसा समय आता है जब उसे उस काम से विरक्ति मिल जाती है, यही बात राजा भर्तृहरि के साथ हुआ, वही इस चोर के साथ हुआ है और कुछ नही ……. http://www.bhagwanbabu.jagranjunction.com

    R K KHURANA के द्वारा
    August 2, 2010

    प्रिय भगवान् बाबू जी, “प्रभु का सिमरन सबसे ऊंचा” के बारे में आपके विचार प्राप्त हुए ! आप कीबात यहाँ तक ठीक है की आजकल के ढोंगी बाबायों के कारण लोगो की इश्वर से आस्था आहत हुई है और लोगो का विश्वास हटता जा रहा है ! परन्तु हमारे संतो ने जो आदर्श रखा था उसका पालन न होने के कारण आज की सारी वयवस्था ही डगमगा गयी है ! आप के अनुभव कुछ और हो सकते है तथा किसी और के अनुभव कुछ और ! इस विषय में बहस करने से कोइ लाभ न होगा ! मानो तो भगवान् है नहीं तो पत्थर ! अपनी अपनी आस्था है ! आपके विचारों और आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
July 31, 2010

चाचा जी बहुत अच्छी कहानी सुनाई आपने | इस पूरे सृष्टि का एक ही संचालक है, उस संचालक की सदैव धायं रखना चाहिए, उसका सम्मान करना चालिए और, उसके प्रति समर्पण होना चाहिए | हमें इस सीख को आत्मसात करना चाहिए |

    R K KHURANA के द्वारा
    August 1, 2010

    प्रिय शैलेश जी, मेरी रचना “प्रभु का सिमरन सबसे ऊंचा” के बारे आपकी प्रतिक्रिया मिली ! प्रभु को हमेशा याद रखना चाहिए ! उसी की कृपा से सब संभव है ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना

NAVEEN KUMAR SHARMA के द्वारा
July 28, 2010

चाचा जी नमस्ते, चाचा जी आपका लेख ” प्रभु का सिमरण सबसे ऊंचा ” पढ़ा बहुत ही अच्छा लिखा है आपने सही कहा है कि प्रभु के सिमरण के बिना इस संसार में कुछ भी नहीं है और प्रभु का सिमरण ही सबसे ऊंचा व बड़ा है यदि मनुष्य प्रभु की आराधना में अपना कुछ समय दे तो वास्तव में उसका कल्याण हो जायेगा ऐसा मेरा मानना है और ऐसा आपका भी मानना है जैसा इस लेख में लिखा है नवीन कुमार शर्मा बहजोई ( मुरादाबाद) मोबाइल नम्बर – 09719390576

    R K KHURANA के द्वारा
    July 28, 2010

    प्रिय नवीन जी, इस बव सागर से पार लगाने के लिए केवल प्रभु का सिमरन ही नाव का काम करेगा ! इसलिए सिमरन तो करना ही पड़ेगा ! आपकी प्रतिक्रिया के ओए धन्यवाद राम कृष्ण खुराना

rachna varma के द्वारा
July 28, 2010

सच ,खुराना साहब आपने बहुत अच्छी कहानी के जरिये प्रभु की महिमा के बारे में बताया आज कल मैं भगवान श्री कृष्ण के बारे में ;इस्कान मंदिर से लायी एक किताब पढ़ रही हूँ उनकी जीवन लीला ,उनका जीवन -दर्शन सब कुछ अद्भुत है बहुत सुकून मिल रहा है अपने भगवान के बारे में जानकर

    R K KHURANA के द्वारा
    July 28, 2010

    प्रिय रचना जी, मेरी रचना “प्रभु का सिमरन सबसे ऊंचा” के लिए आपका स्नेह प्राप्त हुआ ! आपको रचना अच्छी लगी लिखना सार्थक हो गया ! इसी बहाने प्रभु का गुणगान हो गया ! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद् खुराना

roshni के द्वारा
July 27, 2010

R.K. खुराना जी वाह बहुत सुन्दर .. संतवाणी का एक वाक्य भी हमरा जीवन बदलने के लिए काफी है अगर दयां से सुना जाये और ग्रहण किया जाये … आभार सहित

    R K KHURANA के द्वारा
    July 28, 2010

    प्रिय रौशनी जी, प्रभु का सिमरन करके ही हम कुछ पा सकते है ! उसकी इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता ! इस बात को जानना जरूरी है ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद ! राम कृष्ण खुराना

chaatak के द्वारा
July 27, 2010

चाचा जी, कहानी पढ़कर मुझे Morte D’ Arthur की कुछ पंक्तियाँ स्मरण हो आईं- More things are wrought by prayer, Than this world dreams of. …….. For so the whole round earth is every way Bound by gold chains about the feet of God. ***** Nice Story!

    R K Khurana के द्वारा
    July 27, 2010

    प्रिय चातक जी, बहुत भ गंभीर व सुंदर बात कही है ! भगवान् से जो हम ले सकते है वो और कहाँ से मिलेगा ? प्रभु की लीला अपरम्पार है ! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद् खुराना

K M Mishra के द्वारा
July 27, 2010

चाचा जी प्रणाम । ”पहली बात तो यह है कि अगर तुम चोरी के इल्जाम में पकडे जाओ तो कभी भी अपनी चोरी कबूल मत करना !“ यह बात हमारे नेताओं ने भी गांठ बांध ली है इसके अलावा उन्होंने एक नई तकनीकि का इस्तेमाल भी सीखा है । जब वे मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे के सामने से गुजरते हैं तब उनके कानों का कनेक्शन दिमाग से अपने आप ही डिस्कनेक्ट हो जाता है । इसीलिये आज तक किसी नेता को सजा नहीं हुयी । पकड़े भले ही गये हों ।

    R K KHURANA के द्वारा
    July 27, 2010

    प्रिय मिश्र जी, बहुत ही सटीक बात कही है आपने ! फिर यह धार्मिक विषय राजनीतिज्ञों पर कैसे सही उतरता है यह भी आपने अच्छी तरह से समझा दिया ! सचमुच आप अधिवक्ता हो तो बात की खाल भी निकाल लेते हो ! बहुत बहुत धनयवाद ! आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए दिए में घी का काम करती है ! आभारी हूँ आपका ! राम कृष्ण खुराना

शिवेंद्र मोहन सिंह के द्वारा
July 27, 2010

बहुत सुंदर. उसके बिना कोई काम नही हो सकता.

    R K KHURANA के द्वारा
    July 27, 2010

    प्रिय शिवेंद्र जी, आपके स्नेह के लिए आपका धन्यवाद् ! प्रभु को सिमरन ही इस भव सागर से पर लगा सकता है ! राम कृष्ण खुराना

आर.एन. शाही के द्वारा
July 27, 2010

बहुत रोचक कथा । जिस बहाने भी प्रभु का स्मरण हो, कल्याणकारी ही होता है… शाही ।

    R K KHURANA के द्वारा
    July 27, 2010

    प्रिय शाही जी, “प्रभु का सिमरन सबसे ऊंचा” के लिए आपका स्नेह प्राप्त हुआ ! प्रभु को भूलें की भूल किसी को नहीं करनी चाहिए ! यही सीख है इस कहानी मैं ! प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया राम कृष्ण खुराना

seema के द्वारा
July 27, 2010

कहानी बहुत अच्छी लगी और सीख भी मिलती है कि हमें सदैव अच्छे कर्म करने चाहिएं |

    R K KHURANA के द्वारा
    July 27, 2010

    प्रिय सीमा जी, आपको मेरी रचना ““प्रभु का सिमरन सबसे ऊंचा” अच्छी लगी ! यदि भला करेंगे तो हमारा भी भला ही होगा ! यदि किसी के लिए गड्ढा खोदेंगे तो हो सकता है उसमें हम खुद ही गिर जांए ! प्रितिकिर्य के लिए आपका बहुत धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना

Arvind Pareek के द्वारा
July 27, 2010

प्रिय श्री खुराना जी, गुरूओं के वचन सत्‍य होते हैं – मैं अपना जीवन भगवान के चरणों में लगा दूं तो मेरा सारा जीवन संवर जायगा ! बहुत ही सटीक बात कही है । एक अच्‍छी रचना । अरविन्‍द पारीक

    R K KHURANA के द्वारा
    July 27, 2010

    प्रिय अरविन्द जी, मनुष्य चाहे जहाँ भी भटक ले अंत में भगवान् ही उसका बेडा पार लगा सकते हैं ! हमें भगवान की शरण में तो जाना ही पड़ेगा ! चाहे दिल से जाएँ या अनमने से ! उसके बिना गति नहीं है ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना

Nikhil के द्वारा
July 27, 2010

बहुत सकारात्मक रचना अंकल जी. आपकी हर रचना, सर्वश्रेष्ठ. आभार, निखिल झा

    R K KHURANA के द्वारा
    July 27, 2010

    प्रिय निखिल जी, आपको मेरी रचना “प्रभु का सिमरन सबसे ऊंचा” सर्वश्रेठ लगी ! आपके इस स्नेह के लिए मैं तहे दिल से आपका शुक्रिया अदा करता हूं ! आप लोगो का प्यार इसी प्रकार से मिलता रहे मेरा लेखन सफल हो जग्य ! धन्यवाद राम कृष्ण खुराना

    ranmphool BHARDWAJ के द्वारा
    December 6, 2011

    payre chacha ji apki kahani se siksa milti ha jo ki aaj ki duniya bhulne lagi ha ki parbhu hi is jivan ka par lagya ha aapki kahni se bhule log fir parmatma ko samjhne lageghe kahni or guru hi parmatma se milane ki sabse uttam or jordar kadi ha aap ase hi logo ko kahani ke jarye parmatma ke karib pahuche do aage ka rasta fir parbhu savy dikhe de ge aaka RAM phool BHARDWAJ

    R K KHURANA के द्वारा
    December 7, 2011

    प्रिय रमण जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद !


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