KADLI KE PAAT कदली के पात

चतुर नरन की बात में, बात बात में बात ! जिमी कदली के पात में पात पात में पात !!

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किस्सा देहदान का

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किस्सा देहदान का

राम कृष्ण खुराना

जब टी वी और बीवी दोनो नाराज़ हों तों समय काटना मुश्किल हो जाता है ! हमारे यहां तो लाईट थी परंतु केबल वाले की कालोनी की बत्ती गुल होने के कारण हमारा 32” का टी वी हमें अपने नीले रंग के परदे में से 32 के 32 दांत निकाल कर हमारा मुंह चिढा रहा था ! बीवी को मुझसे हमेशा यह शिकायत रहती है कि मैं घर के काम में उसका हाथ नहीं बटाता ! झाडू-पोंछा से लेकर बर्तन तक सब उसी को करना पडता है !

तभी दरवाजे की घंटी ने अपनी पुरानी आवाज में ट्रिनट्रिनाना शुरू कर दिया ! बाहर कोरियर वाला था ! सरकारी अस्पताल से एक लिफाफा आया था ! लिफाफे में मेरे द्वारा मरने के पश्चात शोध के लिए अपनी देह दान करने का फार्म था ! अस्पताल वालों ने मेरा फार्म यह कहकर लौटा दिया था कि उनके पास मृत-शरीर को रखने की जगह ही नहीं है !

लगभग एक वर्ष पहले एक भाई जी टाईप के नेता हमारी कालोनी में पधारे ! उन्होंने हमें बडी ज्ञान की बातें बताई ! साथ ही धार्मिक सोच से ऊपर उठ कर देहदान करने की प्रेरणा दी ! उन्होंने मरणोपरांत शरीर दान देने का महत्व समझाया और देह दान का संकल्प लिया ! शास्त्रों में कन्यादान को महादान बताया गया है ! आजकल रक्तदान की भी महानता है ! और अब देहदान…… ! तीन बेटियों की शादी करके कन्यादान का पुण्य कमा चुका हूं ! 5-6 बार रक्तदान  भी कर चुका हूं ! परंतु देहदान का ख्याल कभी न आया ! सोचा विद्यार्थियों के शोध कार्य के लिए हम भी अपनी देह का दान करेंगे !

अस्पताल में रिसेप्शन की कुर्सी खाली देखकर निराशा हुई ! तभी धवल वस्त्रों में एक ‘सिस्टर’ प्रकट हुई ! उसे रोककर मैंने अपने देहदान के शुभ विचार से अवगत कराया ! हमारी ओर बिना देखे एक कमरे की ओर इशारा करके वह दूसरी ओर चल दी !

कमरे में एक सज्जन फाईलों के स्थान पर मेज़ पर समोसे, पेस्ट्री और चाय सजा कर उनका आनन्द लेते मिले ! मैंने उन्हें अपने आने का मकसद बताया ! उन्होंने मुंह में समोसा ठूंसते हुए बैठने का इशारा किया ! 15-20 मिनट तक उदरपूर्ति करने के पश्चात वो मुझसे मुखातिक हुए !

“वो ऐसा है कि, अब बताईये आपकी समस्या क्या है ?”

”मेरी कोई समस्या नहीं है ! मैं तो मरणोपरांत अपनी देह-दान करने आया हूं !” मैने उन्हें बताया !

“अच्छा-अच्छा बाडी डोनेट करेंगें ?” उन्होंने अपने दांत में फसे समोसे के टुकडे को अपनी जीभ से पीछे ढकेल कर अंदर गटकते हुए कहा – “वो ऐसा है कि, उसके लिए आपको एक ‘विल फार्म’ भरना पडेगा !”

”तो दे दीजिये फार्म मैं अभी भरकर दे देता हूं !” मैंने खुश होकर कहा !

“वो ऐसा है कि, हमारे जो बडे बाबू हैं वो आज पी वी आर में अपनी पत्नी के साथ नई पिक्चर देखने गए हैं ! आप कल आईये !” उन्होंने रूखा सा जवाब दिया !

“फार्म तो आप भी दे सकते हैं ! दे दीजिए मैं भर कर दे देता हूं !” मैंने आग्रह किया !

“वो ऐसा है कि, फार्म बडे बाबू की अलमारी में हैं ! चाबी उनके पास ही है ! आप कल आईये !” इतना कहकर वो सज्जन “अटैचड” वाशरूम में घुस गए !

दूसरे दिन भी बडे बाबू की कुर्सी खाली देखकर बहुत कोफ्त हुई ! कमरे में वही सज्जन मौजूद थे ! मैंने उन्हें नमस्कार करके फार्म मांगा !

“वो ऐसा है कि, बडे बाबू दो-तीन दिन तक बिज़ी रहेंगें !” उन्होंने अपना पुराना तकिया कलाम दोहराते हुए बताया !

”क्यों ?” मैंने किंचित क्रोध से पूछा !

“वो ऐसा है कि, हमारे बडे साहब के डागी जी का कल हैप्पी बर्थ-डे है ! बडे बाबू बर्थ-डे पार्टी की व्यवस्था करने में व्यस्त हैं ! आप दो-तीन दिन बाद आईये !” उन्होंने दो टूक फरमान जारी कर दिया !

”कमाल है ? हम यहां सेवा भाव से अपनी देह का दान करने आए हैं और आप लोग सरकारी नौकरी छोडकर साहबों की चापलूसी करने में लगे हैं ! कुत्ते का जन्म दिन…. ???” क्रोध से मेरा चेहरा लाल हो गया !

“वो ऐसा है कि, हम लोग तो साहबों के रहमो करम पर ही जीते हैं !” उस सज्जन ने मुझे समझाया ! “हम लोगों की कांफिडेन्शिल रिपोर्ट तो बडे साहब ही बनाते हैं न ! अगर हम उनका कहना नहीं मानेंगें तो हमारे बच्चे तो भूखे ही मर जायेंगें !”

चोथे दिन बडे बाबू को कुर्सी पर बैठा देखकर जान में जान आई ! वो मोबाईल पर व्यस्त थे ! किसी से पैसे के लेन-देन की बात चल रही थी ! बातों से लग रहा था कि सरकार की तरफ से मुफ्त दवाईयों की नई खेप आने वाली थी ! उसे ही बाज़ार में बेचने की डील चल रही थी ! लगभग आधे घंटे बाद साहब मेरी तरफ मुडे-“सर बताईये, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं !” उनके शब्दों में चाशनी घुली हुई थी !

“मुझे देहदान के लिए फार्म चाहिए !” मैंने कहा !

दो मिनट तक सोचने की मुद्रा में बैठे रहे ! फिर अलमारी में से एक फाईल निकाल कर कागज़ों का एक पुलिन्दा मुझे थमा कर बोले – “सर ज़रा इन सभी फार्मों की 10-10 फोटोकापियां करवा लाईये !”

”देहदान के लिए इतने फार्म भरने पडेंगें क्या ?” मैं कागज़ों के ढेर को देखकर घबरा गया !

”सर, आप इतनी बडी देह का दान करना चाहते हैं पर आपका दिल बहुत छोटा है !” बडे बाबू ने मुझे घूरते हुए कहा ! “आप इनकी फोटोकापी करवा कर लाईये फिर मैं आपको देहदान का सरल तरीका भी बताऊंगा !”

जब मैं फोटोकापी करवा कर लाया तो उन फार्मों में से बडे बाबू ने एक फार्म निकाल कर मुझे पकडा दिया ! मुझे बहुत गुस्सा आया ! मैंने कहा –“आपने इस एक फार्म के लिए मुझसे इतने सारे फार्मों की फोटोकापियां करवा ली ! मेरे 150 रूपये खर्च हो गए !”

“सर क्या है न कि अस्पताल में फार्मों की, स्टेशनरी की और दवाईयों की हमेशा कमी बनी रहती है ! इसलिए हमें आप जैसे दानी महापुरूषों की सेवा लेनी पडती है ! सर, आप तो देह-दान करने जा रहे हैं फिर थोडे से पैसों का क्या लालच ? यह पैसे साथ थोडे ही जायेंगें !” बडे बाबू ने बनावटी हंसी हंसकर कहा !

”क्यों ! सरकार आप लोगों को हर चीज़ देती है ! वो कहां जातीं है ?” मैंने रोष प्रकट किया !

“सर क्या है न कि सरकार की तरफ से जो सामग्री हमें मिलती है उसके हिस्से तो पहले ही निश्चित हो जाते हैं ! हम आफिस की रूटीन के खिलाफ कोई भी काम नहीं कर सकते ! चपरासी से लेकर नेता तक ओहदे के हिसाब से सबका हिस्सा बंधा हुआ है !” बडे बाबू ने बडी ढीढता से उत्तर दिया ! “सर अभी मुझे बडे साहब की बीवी को क्लब छोडने जाना है ! आज उनका ड्राईवर छुट्टी पर है ! आप घर जाईये और इतमिनान से बैठ कर पूरा फार्म भरकर ले आईये !”  इतना कहकर बडे बाबू तेजी से बाहर निकल गए !

मैं फार्म भरकर खुश हुआ कि चलो आज यह काम भी निपट गया ! लेकिन फार्म देखकर बडे बाबू भडक उठे –“यह क्या सर, आपने पूरा फार्म तो भरा ही नहीं ! इस फार्म में यहां दो लोगों की गवाही की जरूरत है ! फिर उन दोनो गवाहों की और आपकी तरफ से एक हल्फिया ब्यान देना होगा जिसमें यह लिखा हो कि आप अपनी खुशी से देहदान कर रहे है किसी दबाव में नहीं और वो ब्यान मजिस्ट्रेट से अटैस्ट करवाना होगा ! तब यह फार्म जमा होगा !”

“परंतु इसकी क्या आवश्यकता है ? मैं खुद आपके सामने आकर अपने हाथों से अपनी मर्जी से फार्म भर कर दे रहा हूं ! फिर इसमें शंका कैसी ?” मैंने प्रतिवाद किया !

“सर, हम तो कानून के बन्धे हुए हैं ! इसके बिना फार्म जमा नहीं होगा !” बडे बाबू ने दो टूक निर्णय सुना दिया !

अगले दिन कचहरी गए ! 15 रूपये वाला स्टाम्प पेपर 20 रूपये में मिला ! हल्फिया ब्यान टाईप करने वाले ने भी हमें खूब निचोडा ! मैजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर करवाने के लिए किसी वकील की गवाही भी जरूरी थी ! उसकी भी फीस अदा की ! रब रब करते शाम को पांच बजे जाकर काम पूर्ण हुआ !

सारी औपचारिकतायें पूरी करके हम बडे बाबू के सामने खडे थे ! उन्होंने दोबारा फार्म का सूक्ष्म निरीक्षण किया ! आश्वस्त होकर एक पर्ची पर पावती देकर बोले – “सर, आपका फार्म जमा कर लिया है ! अब आप एक हफ्ते बाद आकर अपना डोनर कार्ड ले जाईयेगा ! वो डोनर कार्ड हमेशा आपको अपनी जेब में रखना होगा ! जिससे मृत्यु के पश्चात आपके रिश्तेदार डोनर कार्ड के साथ आपकी बाडी यहां सौंप सकें !”

डोनर कार्ड लेकर हम खुश थे कि चलो मरने के बाद भी हमारा शरीर कई विद्यार्थियों का भला करेगा ! मैं मन ही मन उस दिन की कल्पना करने लगा जब मैं मरूंगा तो सभी साथी-सम्बन्धी राम नाम सत्य कहते हुए हमारी अर्थी अस्पताल के बरामदे में रखेंगें तो सभी डाक्टर दौडे दौडे आयेंगे और मेरे शरीर को बडी हिफाजत से रिसर्च रूम में चीर फाड कर नए विद्यार्थियों को बतायेंगें कि देखो यह दिल है, यह गुर्दा है आदि आदि !  कितनी जाने बचाने के लिए वे शोध कार्य करेंगें ! हमारी देह भी किसी के काम आयेगी यह सोच कर हम अन्दर ही अन्दर अपने आप पर गर्व मह्सूस कर रहे थे !

अवसोस, आज वो इच्छा पत्र (विल फार्म) अस्पताल वालों ने हमें कोरियर के द्वारा वापिस भेज दिया था !

हम फार्म लेकर अस्पताल पहुंचे और बडे बाबू से फार्म कोरियर से वापिस भेजने का कारण पूछा

तो वो बोले – “सर बात ऐसी है कि हमारे बडे साहब के साले साहब की कोरियर की एजेंसी है ! सो अस्पताल के जितने भी डाक्यूमेंट हैं वो उनकी कोरियर से ही भेजे जाते हैं ! फार्म क्यों वापिस भेजा है इसका जवाब तो सर आपको बडे साहब ही देंगें ! आप उनसे मिल लीजिए !”

हमने बडे साहब के सामने पेश होकर उनसे फार्म वापिस करने का कारण पूछा तो वे बिफर पडे  – “देखिए, बात ऐसी है कि हमारे पास केवल 40 शव रखने का प्रबन्ध है ! और हमारे पास 600 से अधिक फार्म जमा हो चुके हैं ! इसलिए हमने यह फार्म वापिस लौटाने शुरू कर दिए हैं !”

“लेकिन जिन्होंने विल फार्म जमा करवाए हैं वो तो अभी जिन्दा हैं !” मैंने तर्क दिया ! “क्या आप ऐसा सोचते हैं कि 600 लोग जिन्होंने फार्म जमा करवाए हैं वो सारे अभी एक ही दिन में मर जांयेगे ?”

”देखिए बात ऐसी है कि ग्राहक की तरह मौत का भी कोई भरोसा नहीं ! आप लोग तो आराम से अर्थी पर लेटकर अपने मुंह में डोनर कार्ड दबा कर यहां आ टपकेंगें ! हमारे लिए तो मुसीबत हो जायगी न ! हम आपके आत्मा विहीन शरीर को कहां कहां ढोते फिरेंगें ! इसलिए हम सबके फार्म वापिस लौटा रहे हैं !” बडे साहब ने अपने तेवर दिखाए !

बडे साहब की बात सुनकर हमारा दिल टूट गया ! मरने का सारा जोश खत्म हो गया ! हमारा सारा उत्साह धरा का धरा रह गया ! हमारी मरने की   इच्छा ही मर गई ! सोच रहे हैं कि अब मर कर क्या करेंगें ?

राम कृष्ण खुराना

9988950584

khuranarkk@yahoo.in

http://www.khuranarkk.jagranjunction.com



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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Alok jain के द्वारा
August 2, 2010

किस्सा दॆह दान का मेरे साथ भी घट चुका मैं जब फार्म लेकर गय़ा तो जबाव मिला और बच्चौ के एवम् दो गवाहौ के हस्ताक्षर करवा कर लाऒॊ मेने कहा मे स्वयँ अपनी देह दान कर रहा हूँ क्या मेरे मुर्दा शरीर मेरा अधिकार नहीँ अतः मेँ बिना देह दान के घर वापिस आ गया

    R K KHURANA के द्वारा
    August 3, 2010

    प्रिय अलोक जी, “किस्सा देहदान का” रचना के लिए आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका धन्यवाद् ! यही आज के सरकारी तंत्र की सच्चाई है ! यह लोग हर काम में अपनी जेब भरना चाहते हैं ! फिर कोइ भी कानून आड़े नहीं आता ! राम कृष्ण खुराना

rajkamal के द्वारा
July 31, 2010

चाचा जी ….             अच्छी पोस्ट के लिए बधाई … और हा….. आपका …..वोह वाला …. नया लेख कब तक आएगा … उसका बड़ी ही बेसब्री से इन्तेज़ार है … आपको अपना वादा तो याद रहेगा न …..

    R K KHURANA के द्वारा
    August 1, 2010

    प्रिय राजकमल जी, “किस्सा देहदान का” रचना आपको अच्छी लगी ! प्रतिक्रिया के लिए आपका धन्यवाद् ! जो वडा किया है वो तो निभाना ही पड़ेगा ! शीघ्र प्रस्तुत कर रहा हूँ ! राम कृष्ण खुराना

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
July 31, 2010

चाचा जी आपने बहुत सही व्यंग लिखा है, मैं भी यही सोचा करता हूँ………………… ये सब कैसे ठीक होगा ……

    R K KHURANA के द्वारा
    August 1, 2010

    प्रिय शैलेश जी, आपको मेरा व्यंग \"किस्सा देहदान का\" पसंद आया ! जानकर अच्छा लगा ! आपके स्नेह के लिए धन्यवाद् ! राम कृष्ण खुराना

शिवेंद्र मोहन सिंह के द्वारा
July 27, 2010

इस देश के हालात बहुत ज्यादा बिगड़ गए हैं, अब अल्लाह ही मालिक है. बहुत सुंदर लेख के लिए आपका शुक्रिया.

    R K KHURANA के द्वारा
    July 27, 2010

    प्रिय शिवेंद्र जी, मेरी रचना “किस्सा देहदान का” के लिए आपका प्यार पाकर मन प्रसन्न हो गया ! बाबूयों ने सभी सरकारी अदारों को बदनाम कर दिया है ! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद राम कृष्ण खुराना

Arvind Pareek के द्वारा
July 26, 2010

प्रिय श्री खुराना जी, किस्‍सा बस दिल को किस कर गया । बहुत अच्‍छा लगा । आपनें लिखा है – बडे साहब की बात सुनकर हमारा दिल टूट गया ! मरने का सारा जोश खत्म हो गया ! हमारा सारा उत्साह धरा का धरा रह गया ! हमारी मरने की इच्छा ही मर गई ! सोच रहे हैं कि अब मर कर क्या करेंगें ?  लेकिन आज के जमानें में जी कौन रहा हैं यहां तो सभी मुर्दा है । तभी तो भ्रष्‍टाचार जैसे मुद्दे आज भी सर उठाये खड़ें हो और बाबुगिरी की जयजयकार हो रही है । हॉं आपने मुझसे पुछा था कि यह टैग शब्द क्या है ! हम जो शीर्षक देते है उसके अनुसार तो सिमिलर अर्तिक्ले में रचनाये नहीं आ रही ! टैग अलग से बनाना पड़ता है क्या ? टैग वह शब्‍द हैं जो आपके लेख में आए हैं और आप चाहते हैं कि उन शब्‍दों के आधार पर भी विभिन्‍न सर्च इंजन आपके लेख को दिखाएं - जैसे इस लेख ‘किस्सा देहदान का’ में से किस्‍सा, देहदान, बडे बाबू, इच्छा पत्र (विल फार्म), अस्‍पताल आदि । ये सभी इस लेख के टैग हो सकते हैं और आप चाहें तो ऐसे शब्‍द भी टैग के रूप में जोड़ सकते है जो लेख में नहीं हैं । लेकिन आपको इसके लिए जब आप नई पोस्‍ट Add करते हैं तो Add new पर क्लिक करने के बाद दिखनें वाली स्‍क्रीन पर आपके दायें हाथ की और देखना होगा । वहां Post Tags के ठीक नीचे Add new tag तथा उसके साथ Add लिखा दिखेगा । आप जिन शब्‍दों को टैग के रूप में लेख से जोड़ना चाहते हैं उन्‍हें Add new tag पर क्लिक कर टाईप कर दें अथवा पहले से कहीं टाईप किए शब्‍दों को कॉपी कर यहां पेस्‍ट कर दें फिर Add बटन दबा दें । इस तरह जो शब्‍द आप टैग के रूप में देंगें यदि वही शब्‍द मेरे या मिश्रा जी के या चातक जी आदि के किसी लेख के भी टैग शब्‍द होगें तो उन लेखों के नीचे आपका लेख का शीर्षक सीमिलर आर्टिकल के रूप में नजर आएगा । ये टैग आप अपने पुराने लेखों में भी डाल सकते हैं । इसके लिए आप पहले एडिट करने की प्रक्रिया के अनुसार लेख को एडिट के लिए खोलिए तत्‍पश्‍चात् उपरोक्‍त प्रक्रिया अनुसार ही टैग एड कर दीजिए । आशा है इससे काफी कुछ स्‍पष्‍ट हो गया होगा ।

    R K KHURANA के द्वारा
    July 26, 2010

    प्रिय अरविन्द जी, मेरी रचना “किस्सा देहदान का” के लिए आपका स्नेह मिला ! आजकल जो भ्रष्टाचार अदि व्याप्त है उसके लिए तो हम लिख लिख कर ही चेता सकते है ! हमारे बस में और क्या है ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए थे दिल से शुक्रिया ! हाँ अपने टैग लगाना सिखाया उसके लिए दोबारा धयान्यवाद ! इसी पोस्ट पर आप देख सकते है की टैग मैं रचनाये आ गयी है ! धन्यवाद राम कृष्ण खुराना

Raj के द्वारा
July 24, 2010

नमस्कार चाचू, आप अभी देहदान के चक्कर में ना पड़ें । हमें आपकी लेखों का इन्तज़ार करने की बजाए अख़्बार मे एक शोक समाचार पढ़ना पड़ेगा और हम ये नहीं चाहते । और यूँ ही इन सरकारी नौकरों के पोल खोलते रहिये शायद इनको अक़्ल आ जाए। राज

    R K KHURANA के द्वारा
    July 24, 2010

    प्रिय राज जी, मेरी रचना “किस्सा देहदान का” में सरकारी नौकरशाही की पोल खोलने के लिए आपकी प्यार भरी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद् ! राम कृष्ण खुराना

kmmishra के द्वारा
July 23, 2010

चाचा प्रणाम । बेकार में सेंटी हो रहे हैं । अभी तो प्रथम पुरस्कार वाला लैपटाप भी नहीं लिया और देहदान की बात सोचने लगे । और वो मेडिकल कालेज वाले जूनियर डाक्टरों को देहदान वाली बाडी की जरूरत नहीं पड़ती । उनको जब जरूरत होती है तो वो खुद ही किसी बेड से कोई मरीज उठा कर मार डालते हैं । आपके व्यंग के चक्कर में अस्पताल के बाबू के सरकारी धंधे का प्रकाशन हो गया । गरीब के पेट पर लात पड़ गयी । हे भगवान । हमको हंसाने के चक्कर में आप अपनी देह की कहां कहां फजीहत करवाते फिरते हैं । मुंह दबा कर हंस रहा हूं कि कोई देख न ले । फिर लोग कहेंगे कि चाचा हैरान ओर भतीजा शैतान ।

    R K KHURANA के द्वारा
    July 24, 2010

    प्रिय मिश्र जी, अपने ठीक कहा है ! आजकल अफसरशाही हावी है और आम आदमी को उसका मुवावजा भुगतना पड़ता है ! हर जगह यही हाल हो गया है ! खैर मुंह दबा कर हंस रहे तो ठीक है ! मुझे तो आपकी शर्ट का फिकर लग जाता है ! हमारी बहु व बच्चों को आशीर्वाद कहियेगा ! धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना

rita singh 'singh' के द्वारा
July 23, 2010

अंकल जी , सादर अभिवादन I बेहतरीन व्यंग(लेख) , रोचक वर्णन , बहुत -बहुत बधाई आपको इस पोस्ट के लिए I विषय बहुत अच्छा लगा I धन्यवाद I

    R K KHURANA के द्वारा
    July 24, 2010

    प्रिय रीता जी मेरी रचना “किस्सा देहदान का” के बारे आपका स्नेह मिला ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद राम कृष्ण खुराना

Nikhil के द्वारा
July 23, 2010

नमस्ते चाचाजी, आपके नए पोस्ट की प्रतीक्षा थी, आशानुरूप बहुत ज्ञान्वार्द्हत और उत्कृष्ट कोटि का लेख. आभार, निखिल झा

    R K Khurana के द्वारा
    July 24, 2010

    प्रिय निखिल जी, मेरी रचना “किस्सा देहदान का” पर आपकी स्नेह मिला ! आपके आशानुरूप रचना बन पड़ी है तो मेरा लिखना सफल हो गया ! आपकी प्रतिक्रिया मुझे सहस देती है ! बहुत बहुत शुक्रिया ! राम कृष्ण खुराना

chaatak के द्वारा
July 23, 2010

चाचाजी, आपने तो हिन्दुस्तान भेडिया-धसान कहावत का चरितार्थ लिख दिया आपका व्यंग तो सचमुच आँखें खोलने वाला है लेकिन ये बाबू जाति का प्राणी बड़ी मोटी खाल का होता है इसे बेधने के लिए सिर्फ व्यंग बाणों से काम चलने वाला नहीं| बहुत ही अच्छी पोस्ट, बधाई!

    R K Khurana के द्वारा
    July 24, 2010

    प्रिय चातक जी, आजकल बाबू लोगो की वजह से आम आदमी कितना परेशान होता है यह किसी से छिपा नहीं है ! उसी की एक बानगी है यह ! आपकी लोगो की प्रतिक्रिया पाकर और लिखने का होसला मिलता है ! धन्यवाद राम कृष्ण खुराना

NAVEEN KUMAR SHARMA के द्वारा
July 23, 2010

चाचा जी नमस्ते, चाचा जी मैंने आपका लेख किस्सा देहदान का पढ़ा बहुत ही अच्छा लिखा है आपने सरकारी दफ्तरों का एक तरह से सजीव वर्णन किया है कि कैसे कैसे सरकारी दफ्तरों में जनता को कई कई दिनों तक वेवकूफ बनाया जाता है

    R K Khurana के द्वारा
    July 24, 2010

    प्रिय नवीन जी, आपको मेरा लेख “किस्सा देहदान का” अच्छा लगा जानकर हर्ष हुआ ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना


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