KADLI KE PAAT कदली के पात

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आंख नहीं लगती - (हास्य-व्यंग)

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आंख नहीं लगती

राम कृष्ण खुराना

पंजाबी में “आखना” शब्द का अर्थ होता है कहना ! इसके अनुसार जो कुछ भी ह्र्दय का भाव होता है उसे कह देने वाले को ‘आंख’ कहते हैं ! आंख को चख, नयन, लोचन, नेत्र, नज़र आदि कई नामों से पुकारा जाता है ! इसको चख कहने का भी एक कारण है

अब मान लीजिए आपके सामने रसगुल्ले, गुलाब-जामुन, बर्फी, समोसे, पकौडे आदि-आदि रखे हुए हैं ! रसगुल्ले को देखते ही आपके मुंह में पानी आ जाता है ! आप चम्मच को उठाने में भी अपना समय गवाना नहीं चाहते ! अंगूठे और तर्जनी की सहायता से एक रसगुल्ला उठा कर, उसके रस से अपने कपडों को बचाते हुए, थोडा-सा आगे की ओर झुक कर, झट से पूरा का पूरा रसगुल्ला मुंह में गडप कर जाते हैं ! और मुंह को गोल-मटोल करके अपने चेहरे के लगभग 35-36 कोण बनाकर रसगुल्ला खाते हुए कह देते हैं-“यह तो बहुत ही मीठा है !”
उसी प्रकार से समोसे आदि में भी नमक मिर्च की कम या अधिक मात्रा का ज्ञान आप उसे मुंह से चखकर कर सकते हैं ! परंतु यदि कोई सौंदर्य प्रतियोगिता हो रही हो और आपको सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी का चयन करने के लिए कह दिया जाय तो आप उसके सौन्दर्य का स्वाद मुंह से चखकर तो नहीं बता पायेंगें ! यदि ऐसा सम्भव होता तो लोग सौन्दर्य प्रतियोगितायों में चार-चार किलो के डालडा के खाली डिब्बे ले जाते और खुरजा के खुरचन की तरह अच्छे से अच्छा अपना मनपसन्द सौन्दर्य उसमें भर लाते और डिब्बा बन्द करके घर के एक कोने में रख देते ! बस, जब तबियत मचलती एक चम्मच निकालते और मुंह मे रख लेते ! परंतु सौन्दर्य का स्वाद मुंह से नहीं, आंख से ही चखा जा सकता है ! इसी कारण लोग इसे “चख” (चखने वाला) कहने लगे !

नयन से तात्पर्य है “नय नहीं” अर्थात जिसमें ‘नय-नीति-न्याय’ न हो ! नयन में नीति नहीं होती ! यां यूं कह लीजिए कि आंख नीति से काम नहीं लेती ! जो कुछ भी गलत-सही यह सामने देखती है, आईने की तरह, साफ-साफ, वही झट से मस्तिष्क तक पहुंचा देती है ! चाहे उस समय दिल कितना ही दुखी क्यों न हो ! मस्तिष्क कितना ही अशांत क्यों न हो ! इसमें इतनी नीति नहीं होती कि अशांत व दुखी ह्रदय को कष्टकारक घटना बताकर उसे और परेशान न करे ! आंख की इसी आदत के कारण ही उसे लोग “नयन” या “नैन” कहने लगे !

परंतु आप धोखे में मत रहिएगा ! ये नज़रें भी कई नज़ारे करती हैं ! इसके भिन्न-भिन्न पोज़ों के अर्थ भी भिन्न ही होते हैं ! आप स्वंय ही देख लीजिए –

“नज़र उठे तो कज़ा होती है,

नज़र झुके तो हया होती है !

नज़र तिरछी हो तो अदा होती है,

नज़र सीधी हो तो फिदा होती है !”

मैंने कई लोगों से यह प्रश्न किया कि यदि आंखें न होती तो क्या होता ? सबका एक ही रटा-रटाया उत्तर मिला कि यदि हमारी आंखें न होतीं तो हम अन्धे हो जाते, हमें कुछ दिखाई न देता, हम चल-फिर नही सकते थे ! आदि-आदि ! लेकिन मैं इस उत्तर से संतुष्ट नहीं ! इस संसार में कई लोग प्रज्ञाचक्षु हैं तथा अच्छे- अच्छे पदों पर आसीन हैं बिना किसी हिचकिचाहट के हाट-बज़ार हो आते हैं ! तथा आंख वालों से अच्छे हैं ! लेकिन जनाब मैं आपको एक राज़ की बात बता दूं ? सच मानिए, यदि नज़रें न होती तो सबसे अधिक नुकसान औरतों का होता ! विशेषकर सुन्दर औरतों का ! आपने नही सुना -
“यह नज़रें न होती तो नज़ारा भी न होता !
तब इस दुनिया में हसीनों का गुज़ारा भी न होता !!”

यह नयन केवल देखने-पढने के काम ही नहीं आते ! लेने वालों ने तो चुपके से इनसे कई काम ले लिए और आपको पता भी नहीं चला ! “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी” को चरितार्थ करते हुए अपनी-अपनी भावनानुसार लोगों ने इनका कई कामों में प्रयोग किया है !

आधुनिक युग में गगनचुम्बी इमारतों को बनाने के लिए उससे दुगनी-तिगुनी ऊंचाईं के नोटों के ढेर लगाने पडते हैं ! तिस पर हालत यह है कि किराए पर एक कमरा तक नही मिलता ! परंतु कदाचित आपका परिचय कबीर दास जी से नही हुआ होगा ! उनके कथनानुसार आपको इतनी मंहगी सीमेंट और ईंट लेने की आवश्यकता नहीं ! लोहे-सरिए के झंझट में पडने की जरूरत नहीं ! उन्होंने आंखों से बिना “लिंटल’ की कोठरी तैयार कर दी ! इतना ही नहीं उसमें फर्नीच्रर भी फिट कर दिया ! कबीर दास जी कहते हैं -
“नैनों की कर कोठरी, पुतली पलंग बिछाय,

पलकों की चिक डारि के, पिय को लिया रिझाय !”
परंतु यह आंखे बहुत चंचल हैं ! कई बार इनके बोये हुए कांटों से दिल लहुलुहान हो जाता है ! गुनाह यह करती हैं, सज़ा दिल को मिलती है -
तपन सूरज में होती है,

तपना ज़मीं को पडता है !

मुहब्बत आंखों से होती है,

तडपना दिल को पडता है !!
लेकिन उस पर तुर्रा यह है कि निगाहें अपना कसूर मानने को तैयार नहीं ! वे अपना पक्ष प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि –

“फिर न कीजै मेरी गुस्ताख निगाहों का गिला !
देखिए आपने फिर प्यार से देखा मुझको !!”

इसका तात्पर्य यह नही है कि आंख पर इस तपन का कोई असर ही न पडता हो ! जिस् प्रकार से दूध में पानी मिलकर दूध के भाव बिक जाता है, परंतु जब दूध को गर्म करते हैं तो सबसे पहले पानी ही जल कर भाप बनता है ! उसी प्रकार से दिल के तडपने की आंच आंख पर भी पंहुचती है ! तभी लोगो को कहते सुना है “जब से आंख से आंख लगी है, आंख नही लगती !”
दशा यह होती है कि कई-कई रातें आंखों ही आंखों मे कट जाती हैं ! ह्रदय प्रेम के हिंडोले में झूलने लगता है ! तब आंख व दिल दोनों एक-दूसरे से शिकायत करने लगते है ! मीर साहब ने कहा है -
“कहता है दिल कि आंख ने मुखको किया खराब,

कहती है आंख कि मुझे दिल ने खो दिया !

लगता नहीं पता कि सही कौन सी बात है,

दोनो ने मिल के “मीर” हमें तो डुबो दिया !!”

राम कृष्ण खुराना

9988950584

426-ए, माडल टाउन एकस्टेशन,

नज़दीक कृष्णा मन्दिर,

लुधियाना  (पंजाब)

khuranarkk@yahoo.in

http://khuranarkk.jagranjunction.com



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31 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

s.p. singh के द्वारा
April 19, 2012

बहुत ही सुन्दर रचना, बधाई आदरणीय खुराना जी बहुत दिनों के बाद आपकी लेखनी का चमत्कार दिखा है नयनो को विश्वाश ही नहीं होता ऐसा लगा की आपने ” छाप तिलक सब लूटा मोको नैना दिखा के ” , एस पी सिंह. मेरठ

    R K KHURANA के द्वारा
    April 19, 2012

    प्रिय सिंह साहिब, आप जैसे वरिष्ठ लेखक से जब प्रोत्साहन मिलता है तो दिल गदगद हो जाता है ! मेरी रचना आपको अच्छी लगी इसके लिए आभार ! मेरी रचना सार्थक हुई ! राम कृष्ण खुराना

s.p. singh के द्वारा
April 19, 2012

आदरणीय खुराना जी बहुत दिनों के बाद आपकी लेखनी का चमत्कार दिखा है नयनो को विश्वाश ही नहीं होता ऐसा लगा की आपने ” छाप तिलक सब लूटा मोको नैना दिखा के ” बहुत ही सुन्दर रचना, बधाई, एस पी सिंह. मेरठ

    R K KHURANA के द्वारा
    May 7, 2012

    प्रिय सिंह साहेब, आपका स्नेह तो निरंतर मिलता ही रहता है ! दिल से आभारी हूँ ! मेरी रचना “आँख नहीं लगती” के लिए भी आपके स्नेह के लिए आभारी हूँ ! धन्यवाद राम कृष्ण खुराना

Rachna Varma के द्वारा
May 26, 2011

खुराना चाचा जी नमस्कार , बहुत -बहुत बधाई!! वास्तव में बढ़िया लिखा है आपने धन्यवाद !

    R K KHURANA के द्वारा
    May 26, 2011

    प्रिय रचना जी, मेरी रचना “आँख नहीं लगती” के लिए आपका स्नेह मिला ! आभारी हूँ ! धन्यवाद राम कृष्ण खुराना

lata kamal के द्वारा
March 31, 2011

नमस्कार खुराना जी ,आपने सही पहचाना .मैं इस मंच की नयी पाठिका हूँ .मेरा सौभाग्य कि आरम्भ में ही आपकी रचना पढने को मिली .आँख शब्द का बहुत ही सुंदर प्रयोग किया है आपने विशेष रूप से ‘जब से आँख से आँख लगी है ,आँख नहीं लगती ‘. .सभी शिक्षकों को अवश्य ही पढनी चाहिए यह रचना .स्कूलों में पढाई तो अवश्य हो रही है परन्तु शब्दों के अर्थ और उनके अलग -२ प्रयोग की करामात उनसे बहुत दूर है .हाल ऑफ़ फेम में चुने जाने की दिल से बधाई .भले देर से ही सही .आभार.

    R K KHURANA के द्वारा
    March 31, 2011

    सुश्री लता जी, आपको मेरी रचना “आँख नहीं लगती” अच्छी लगी ! जानकर बहुत अच्छा लगा ! जागरण जंक्शन ने मेरी इसी रचना को प्रथम पुरस्कार के समय समाचार पत्रों में भी प्रकाशित किया था ! इस रचना को श्रेष्ठ रचना माना है ! आपका स्नेह पाकर मैं गदगद हो गया ! आपकी बधाई के लिए आभारी हूँ ! धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना

Ritambhara tiwari के द्वारा
September 17, 2010

हाल ऑफ़ द फेम में चुने जाने के लिए बधाई! अच्छा लेखा है!

    R K KHURANA के द्वारा
    September 17, 2010

    प्रिय ऋतंभरा जी, “हाल ऑफ़ फेम” की बधाई के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद् ! आपको मेरा लेख “आँख नहीं लगती” अच्छा लगा ! आपकी प्रतिक्रिया लिए आभार ! राम कृष्ण खुराना

amita के द्वारा
September 11, 2010

बहुत सुंदर है

    R K KHURANA के द्वारा
    September 12, 2010

    प्रिय अमिता जी, मेरी रचना “आँख नहीं लगती” रचना के लिए आपका स्नेह प्राप्त हुआ ! आपका धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना

R K KHURANA के द्वारा
September 10, 2010

प्रिय अरविन्द जी, हाल ऑफ़ फेम में स्थान पाने की बधाई के लिए आपका आभारी हूँ ! आपको मेरी रचना \\"आख नहीं लगती\\" ने आँख से देख कर मुख का रसास्वादन कर दिया ! मन गदगद हो गया ! आप जैसे सज्जनों की ऐसी प्रतिक्रिया से ही लिखने की प्रेरणा मिलती है ! बहुत बहुत धन्यवाद राम कृष्ण खुराना

Arvind Pareek के द्वारा
September 10, 2010

प्रिय श्री खुराना जी, हॉल ऑफ फेम में स्‍थान पानें से ही स्‍पष्‍ट था कि आपकी लेखनी में जादू हैं । और जब ऑंखों ने देखा तो रसास्‍वादन मुख को करा दिया । निस्‍संदेह रचना उत्‍क़ृष्‍ट श्रेणी की है । आपको बहुत-बहुत बधाई । हॉयपर लिंक वास्‍तव में आप ठीक तरह से उपयोग कर पा रहे हैं । यह भी स्‍पष्‍ट हो गया है । अरविन्‍द पारीक

    R K KHURANA के द्वारा
    May 25, 2011

    प्रिय अरविन्द जी, बधाई के लिए आपका अति धनय्वादी हूँ ! आखों से आपने रसास्वादन किया ! हॉयपर लिंक के लिए शुक्रिया राम कृष्ण खुराना

razia mirza के द्वारा
September 9, 2010

बहोत बहोत बधाई ख़ुराना भाई साहब। फ़िर एक और बात साबित कर दिया आपने कि आप “महान” हैं । अपने स्वभाव अपने नम्र व्यक्तित्व और अपने सुंदर लेख से। भाभीजी को मेरा प्रणाम।

    R K KHURANA के द्वारा
    September 9, 2010

    प्रिय रज़िया जी, “आँख नहीं लगती” रचना के लिए आपका स्नेह प्राप्त हुआ ! बधाई के लिए मैं आपको तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूँ ! यह सब आप लोगो के प्यार, विश्वास और बड़ो के आशीर्वाद और उस असीम प्रभु की कृपा से ही संभव हो सका है ! हाँ आपकी भाभी को आपका सन्देश पहुँच जायगा ! आप बीच बीच में कहाँ चली जाती है ! शायद आपकी नौकरी आपको कहीं टिकने नहीं देती ! खैर … फिर से धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना

s.p.singh के द्वारा
September 8, 2010

खुराना जी बहुत खूब, आपने तो कमाल ही कर दिया …………….मै तो यह कहने पर मजबूर हो गया की ….. लड़का कमाल देखो अंखियो से गोली मारे ………… वैसे एक दो वाक्य और समां सकते थे ” जैसे आँख का पानी मरना ” “जिंदाबाद ! जिंदाबाद ! मुर्दाबाद! मुर्दाबाद ! के नारे गूँजते हैं शहर की हवा में |बड़ी चहल-पहल रहती है शहर में पर हत्यारे हैं कि इन सबके बीच से चाक़ू घुमाते निकल जाते हैं ,लोग सब कुछ देखते हैं पर ऑंखें बंद कर लेते हैं “

    R K KHURANA के द्वारा
    September 8, 2010

    प्रिय सिंह साहब, आपको मेरी रचना “आँख नहीं लगती” कमाल की लगी ! आपकी प्रतिक्रिया का धन्यवाद् ! आँख के ऊपर आप लिखना चांहे तो इतना मसाला है की कई पुराण लिखे जा सकते है ! परन्तु हमें लेख लिखते समय स्थान और समय की सीमा को भी याद रखना पड़ता है ! कृपया ऐसे ही स्नेह बनाये रखें ! राम कृष्ण खुराना

rudra के द्वारा
September 8, 2010

श्री खुराना जी नमस्कार आप का ये लेख अत्यंत भा रहा है कोटिश धन्यवाद् और हल ऑफ़ फमे में स्थान पाने के लिए बधाई रूद्र नाथ त्रिपाठी युवा हास्य व्यंगकार,गीतकार वाराणसी

    R K KHURANA के द्वारा
    September 8, 2010

    प्रिय रूद्र नाथ जी, आप वाराणसी के हैं ! आपने तो मेरी पुरानी यांदें ताज़ा कर दी ! मैं बनारस हिन्दू विश्वविध्यालय का छात्र रह चूका हूँ ! 1965 -66 में मैंने Pre University वहीँ से की है ! आप व्यंगकार है तो आपकी रचनाये भी पढने को मिलेंगी ! मेरी रचना “आँख नहीं लगती” के लिए आपकी प्रतिक्रिया का धन्यवाद् ! राम कृष्ण खुराना

Ramesh bajpai के द्वारा
September 7, 2010

फिर न कीजै मेरे गुस्ताख निगाहों का गिला ! देखिए आपने फिर प्यार से देखा मुझको !!” आदरणीय भाई जी बहुत मजा आया . रचना पढ़ कर . रसगुल्ला भी मिल गया . बहुत बहुत बधाई

    R K KHURANA के द्वारा
    September 8, 2010

    प्रिय रमेश जी, आपको मेरी रचना “आँख नहीं लगती” पढ़ कर मज़ा आया तो मैं भी आपका स्नेह पाकर गदगद हो गया ! आप जैसे वरिष्ठ, अनुभवी पारखियों का प्यार ही है जो मुझे उत्साहित करता रहता है ! मैं आपका तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ ! राम कृष्ण खुराना

आर.एन. शाही के द्वारा
September 7, 2010

आदरणीय खुराना साहब, वाक़ई मज़ा आ गया … बधाई । आपके पृष्ठ पर इतनी सुन्दर रचना पर नज़र नहीं पड़ पाई थी, जंक्शन को भी साधुवाद । आप ऐसी मनोरंजक रचनाएं और लेकर आएं, ये अनुरोध है । हमारे चक्षुओं पर इतना कुछ लिखा जा सकता है, यह आपके लेख से ही सीखा जा सकता है ।

    R K KHURANA के द्वारा
    September 7, 2010

    प्रिय शाही जी, आपको मेरी रचना “आँख नहीं लगती” पढ़ कर मज़ा आया ! जानकर बहुत अच्छा लगा ! जागरण जंक्शन ने मेरी इसी रचना को प्रथम पुरस्कार के समय समाचार पत्रों में भी प्रकाशित किया था ! आपके स्नेह को पाकर मैं गदगद हो गया ! धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना

Ashish Jain के द्वारा
May 29, 2010

बहुत सुंदर लेख है !

    R K KHURANA के द्वारा
    May 29, 2010

    प्रिय आशीष जी, मेरी रचना “आँख नहीं लगती” के बारे में आपका स्नेह मिला ! बहुत आभारी हूँ ! आपका धन्यवाद् खुराना

kmmishra के द्वारा
May 3, 2010

रसगुल्ले, गुलाब-जामुन sa meetha lekh. Abhaar

    R K KHURANA के द्वारा
    May 3, 2010

    प्रिय मिश्र जी, …….और इन मिठाईयों की ही तरह मीठी आपकी प्रतिक्रिया ! बहुत बहुत धन्यवाद् खुराना

Ram Kumar Pandey के द्वारा
April 30, 2010

नयनों की भाषा समझ कितने डूबे प्रेम में, कितनों ने किया बर्बाद अपने को, लेकिन फिर भी आखिर तक समझे कि हुए वही आबाद. असर छोड़ने वाली रचना. शानदार!

    R K KHURANA के द्वारा
    April 30, 2010

    प्रिय राम कुमार जी, आँखों की भाषा तो बस आँखे ही समझ सकती हैं ! टिप्पणी के लिए धन्यवाद खुराना


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