KADLI KE PAAT कदली के पात

चतुर नरन की बात में, बात बात में बात ! जिमी कदली के पात में पात पात में पात !!

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मैं मुखौटे बेचता हूं - (हास्य-व्यंग)

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मैं मुखौटे बेचता हूं

राम कृष्ण खुराना


देवी जी, आप बडी देर से दिवार से लगकर उदास-उदास खडीं हैं ! अच्छा तो स्टैनों हैं आप ? आपका बास आपसे खुश नही है ! आपके लिए मैंने यह कोमल मुखौटा विशेष रूप से बनवाया है ! इसे ओढ लीजिए ! बास से हंस-हंस कर बात कीजिए ! यदि वह आफिस टाईम के बाद भी रूकने लिए कहे तो अवश्य रूकिए ! उस समय यह कोमल मुखौटा आपकी बहुत सहायता करेगा ! यदि डिक्टेशन देते वक्त बास की उंगलियां आपके शरीर पर फिसलने लगें तो यह मुखौटा आपके काम आयेगा ! दिल में कैसे भी गुबार उठते हों इस मुखौटे से लचीली मुस्कराहट और कातिल अदा ही बाहर आएगी ! बास आपकी मुट्ठी में रहेगा ! तरक्की के साथ-साथ खाना और पिक्चर फ्री ! आने-जाने के लिए बास की कार आपका इंतज़ार करेगी ! हर तरफ आपकी तूती बोलेगी ! लक्षमी आपके कदमों में डोलेगी ! आजमा कर देख लीजिए ! बात गलत निकलने पर दाम वापिस !

नेताओं के लिए तो मैंने स्पैशल आर्डर देकर मुखौटे बनवाये हैं ! प्रत्येक समय के लिए अलग-अलग मुखौटे ! जब वोट लेने जाना हो तो हल्का मुखौटा लटका लीजिए ! गधे को पापा और गधी को मम्मी कहिए ! प्यार, गुस्सा, डर, धन हर प्रकार का सिक्का चलाईये ! यदि बीवी या बेटी भी दांव पर लगानी पडे तो उससे भी न चूकिए ! मंत्री बनने के बाद कई बीवियां मिल जांयगी ! फिर बेटियों की क्या कमी रहेगी !

सीट मिलने के बाद यह भारी मुखौटा आपके चेहरे पर फिट हो जायगा ! यदि किसी काम के लिए ना कहनी हो तो शायद कहिए ! जहां शायद कहने की जरूरत आन पडे तो हां कह दीजिए ! याद रखिए ना कहने वालों की गिनती राजनेताओं में नहीं होती ! यह दाईं ओर वाले सारे मुखौटे मैंने नेताओं के लिए ही बनवाए हैं ! वक्त की नज़ाकत को देखकर मुखौटा बदल लीजिए ! जीवन भर कुर्सी आपका दामन नहीं छोडेगी ! ल्क्ष्मी कभी मुख नही मोडेगी !
हां श्रीमान जी, आपकी किस चीज़ की दुकान है ! रहने दीजिए, दुकान जैसी भी हो आप यह मुखौटा ले जाईए ! फिर शिव की गद्दी पर बैठ कर जितना मर्जी झूठ बोलिए ! कसमें खा-खाकर कम तौलिए, किसी से नर्मी से तो किसी से गर्मी से बात कीजिए ! पहले आदमी को आंखों-आंखों में तौलिए, फिर जैसा गाल देखो वैसा तमाचा जड दो ! ग्राह्कों को धोखा देने के लिए यह मुखौटा बहुत ही कारगर सिद्ध होगा ! जितना माल हो गोदाम में छुपा दीजिए ! ब्लैक की कमाई का स्वाद ही कुछ और होता है ! यदि आपकी दुकान पर कोई इंसपेक्टर आ जाय तो उसके लिए वो जो नीले हैंगर में मुखौटा टंगा है ना, वो ले जाईये ! थोडा सा इंसपेक्टर को खिला कर बाकी का आप हडप जाईये जब मुंह खाता है तो आंख शरमा जाती है ! उसके साथ ही तेल से भीगी हुए कमीज़ और फटा हुआ पायजामा टंगा है ! यदि कभी सेल्-टैक्स के दफतर में जाना पड जाय तो यह आपके काम आयेंगे ! इन मुखौटों का समयानुसार सदुपयोग करने से आपको किसी प्रकार की कोई भी कठिनाई नहीं होगी !
आपकी शिकायत सही है ! हैं तो आप थानेदार परंतु कोई भी आपकी इज्जत नहीं करता आपका कोई रौब नहीं है ! कोई बात नहीं, मैं आपको भी एक मुखौटा देता हूं ! आज की दुनिया में केवल खाकी वर्दी पर स्टार लगा लेने से कुछ नहीं होता ! यह राकेट युग है ! आपके लिए यह लाल रंग का मुखौटा ठीक रहेगा ! कोई आसामी आती दिखाई दे तो अपने सीधे स्वभाव पर यह मुखौटा ओढ लीजिए ! आपका चेहरा क्रोध से लाल हो जायगा ! फिर उसे मां-बहन की गालियां ऐसे दीजिए जैसे बच्चों को आशीर्वाद दिया जाता है ! बिना कंजूसी के डांट पिला दीजिए ! यदि कोई मिलने वाला आ जाय या कोई सिफारशी पत्र आ जाय तो यह सफेद मुखौटा अटका लीजिए ! बडे प्यार से बात कीजिए ! नहीं-नहीं करते जाईए और रिशवत से जेब भरते जाईए ! सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का ? जो दूसरों को जितना अधिक मूर्ख बना ले वह उतना ही बुधिमान ! तेल की धार के साथ चलना सीखो !

डरिए नहीं ! एक-एक करके आते जाईए और आपना मन पसन्द मुखौटा लेते जाईए ! मैंने सबके लिए मुखौटे बनवा रखे हैं ! आप आफिसर हैं या चपरासी, मालिक हैं या नौकर, मास्टर हैं या विद्यार्थी, प्रोफेसर हैं या स्टूडेंट, लडका हैं या लडकी, सर्विस करते हैं या बिजनेस मतलब यह कि हर प्रकार के तथा हर किस्म के मुखौटे मैं बेचता हूं ! अब आपसे क्या छुपाना, मेरी दुकान की सफलता का भी यही राज़ है ! मैं भी ग्राह्क को देखकर मुखौटा बदल लेता हूं !

राम कृष्ण खुराना

khuranarkk@yahoo.in

Mobile : 9988950584



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37 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shalini के द्वारा
February 12, 2012

वाह! क्या बात है….मज़ा आ गया पद कर…. बहुत अच्छा वयंग्य है

    R K KHURANA के द्वारा
    February 12, 2012

    प्रिय शालिनी जी, मेरी व्यंग रचना पर आपकी प्रतिक्रिया मिली ! आभार ! राम कृष्ण खुराना

आर.एन. शाही के द्वारा
February 11, 2012

आदरणीय खुराना साहब, आपका यह ब्लाग ‘ओल्ड इज गोल्ड’ की तरह बिल्कुल खरा सोना है । एकदम चौबीस कैरेट वाला । समाज में अब मुखौटे के अतिरिक्त कुछ है भी नहीं, मुखौटा ही सच्चाई है । इसे उतारना असम्भव है, बल्कि उतार फ़ेंकने पर ही ज़्यादा अस्वाभाविक दिखेगा, और लोग बिना मुखौटे वाले को कुछ अज़ीब-अज़ीब नज़रों से घूरना शुरू कर देंगे । साधुवाद !

    R K KHURANA के द्वारा
    February 12, 2012

    प्रिय शाही जी, आपकी प्रतिक्रिया मिली ! बहुत बहुत धन्यवाद ! आभार खुराना

div81 के द्वारा
January 13, 2011

एक जाँ है मुझमे एक ही शक्स हूँ मैं फिर भी आईने में देखकर लगता है कितनी ही परछाइयों का अक्स हूँ मैं

    R K KHURANA के द्वारा
    January 14, 2011

    प्रिय दिव्या जी, आपो मकर सक्रांति की शुभकामनायें ! ठीक कहा अपने ! एक एक आदमी के कई अक्स बन गए है आज ! जैसा मुंह देखा वैसी ही बात कर दी ! दुनिया मुखौटों में बात कर रह गयी है ! आपकी प्रतिर्क्रिया के लिए दह्नाय्वाद ! राम कृष्ण खुराना

Vinod Kumar के द्वारा
May 27, 2010

achchha wyang hai

    R K KHURANA के द्वारा
    May 29, 2010

    Dear Mr. Vinod Ji, Thanks for your opinion on my article “Main Mukhoute Bechta Hoon” regards, Khurana

Udit Sood के द्वारा
May 22, 2010

बहुत अच्छा लिखा है आपने

    R K KHURANA के द्वारा
    May 23, 2010

    प्रिय उदित जी, मेरी रचना “मैं मुखौटे बेचता हूँ” आपको अच्छी लगी ! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद् खुराना

Kamal Kant के द्वारा
May 19, 2010

खुराना सर कमाल कर दिया आपने ऐसे सुंदर व्यंग किया है मज़ा आ गया

    R K KHURANA के द्वारा
    May 21, 2010

    प्रिय कमल कान्त जी, मेरी रचना मैं मुखौटे बेचता हूँ पर आपकी प्रतिक्रिया मिली. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद् ! कृपया स्नेह बनाये रखें खुराना

kmmishra के द्वारा
May 10, 2010

व्यंग्य की ऐसी पैनी धार । बहुत खूब ।

    R K KHURANA के द्वारा
    May 11, 2010

    प्रिय मिश्र जी, आपके स्नेह के लिए आभारी हूँ. ! नई रचना “भगवान शंकर – महाशक्ति” आई है ! आपके राय की प्रितिक्षा रहेगी ! राम कृष्ण खुराना

    R K KHURANA के द्वारा
    May 11, 2010

    प्रिय मिश्र जी, मैंने पहले भी आपको उत्तर दिया था पर पता नहीं क्यों यह reply में शो नहीं हो रहा ! शायद मेरे कोम्पुएर में कुछ प्रॉब्लम है ! आपकी टिपण्णी के लिए धन्यवाद्

pranav के द्वारा
May 10, 2010

क्या बात है ! बहुत सुंदर चोट की है !

    R K KHURANA के द्वारा
    May 11, 2010

    प्रिय प्रणव जी, धन्यवाद ऐसे ही स्नेह बनाये रखे !

Neetu के द्वारा
May 7, 2010

इसको पढने पर एक बेहद उम्दा लाइन याद आ गयी “हम असल मैं कभी बड़े नहीं होते सिर्फ समाज में व्यवहार करने का तरीका सीखते है!” सच को लिबास पहनाने के लिए शुक्रिया ………

    R K KHURANA के द्वारा
    May 7, 2010

    प्रिय नीतू जी, आपने ठीक कहा है ! सच बहुत कड़वा होता है ! इसीलिए “मैं मुखौटे बेचता हूँ” फिर भी हम लोग सच को निभाने का झूठा दंभ भरते हैं ! आपकी प्रतिकिर्या के लिए बहुत बहुत धन्यवाद् राम कृष्ण खुराना

mukeshgoyal के द्वारा
May 6, 2010

खुराना साहब, आपकी मुखौटों की दुनिया देख कर मुझे समझ में आ रहा है कि मुझे अधिकांशतः अपना कार्य सिद्ध करने में परेशानी क्यों आती है | क्यों कि मेरे पास मेरा अपना एक ही मुखौटा है | अब आवश्यकता अनुसार आप से मुखौटे खरीदने पड़ेंगे तब इस दुनिया में आसानी से कार्य सिद्ध होंगे | मेरे जैसे लोगों के लिए मुखौटों कि दुकान खोलने के लिए धन्यवाद |

    R K KHURANA के द्वारा
    May 6, 2010

    प्रिय गोयल साहिब, धन्यवाद् क्या करें जमाना ही ऐसा आ गया है की बिना मुखौटा लगाये काम ही नहीं बनता ! आपके लिए मुखौटा हाज़िर है सरकार ! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद् खुराना

Tufail A. Siddequi के द्वारा
April 30, 2010

खुराना साहब अभिवादन, बुरा मत मानियेगा लेकिन ये सच है की सोसाइटी को ठगने, लूटने के सारे तरीके तो आप जैसे बुद्धिजीवी ही बताते है. शम्मी कपूर की फिल्म का एक गीत याद आ रहा है- “तारीफ करू क्या उसकी जिसने तुझे बनाया……”. अभी हाल ही में एक वरिस्थ ने मुझे लताड़ते हुए कहा था- “अबे तू लल्लू नहीं तू तो महा-लल्लू है… तुझे तो एक छोटा सा बच्चा भी उल्लू बना सकता है. अपने आप को बदल, थोडा सा बोल्ड बन…..”. अब सोच रहा हूँ क्यों न आपसे एक मुखौटा खरीद ही लूं. आपका क्या ख्याल है ?. धन्यवाद.

    R K KHURANA के द्वारा
    April 30, 2010

    प्रिय तुफैल जी, जब बच्चा छोटा होता है तो हम कहते बेटा ऐसे मत करो वैसा मत करो जब बच्चा बड़ा हो जाता है तो हम कहते है की ज़रा दुनियादारी सीखो ! यह क्या है ! अलग अलग मुखौटे ही तो हैं. ! मेरी तो दुकान है तो भे आयेगा उसे माल मिलेगा ही ! खैर आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत धन्यवाद खुराना

    Tufail A. Siddequi के द्वारा
    April 30, 2010

    खुराना साहब अभिवादन, आपकी बात १६ आने सही है. समय और परिस्थिति यही कहती है- “जैसा देश वैसा भेष.” धन्यवाद. http://siddequi.jagranjunction.com

    R K KHURANA के द्वारा
    May 1, 2010

    तुफैल जी, धन्यवाद

Gautam के द्वारा
April 28, 2010

kya baat hai khurana ji. aapke mukhoute to kamal ke hain.

    R K KHURANA के द्वारा
    April 28, 2010

    गौतम जी, आपकी राय के लिए धन्यवाद्

manoj के द्वारा
April 27, 2010

क्या बात है लगता है मुखौटो की सेल लगी है. पर आप एक गलती कर बैठे आज कल के नेताओं के पास अगर मुखौटे बचने जाओगे तो खाली हाथ आना पडेगा क्योंकि उनके पास आप से ज्यादा मुखौटे पडे है. आज हर आदमी अपने चेहरे पर मुखौटा लगा कर चलता है और वह एक दो नही कई कई. सुबह घर से निकलते है तो पप्पु के पापा और दिन में ओफिस में गोपी-कन्हैया. बिलकुल सही लिखा आपने.

    R K KHURANA के द्वारा
    April 27, 2010

    प्रिय मनोज जी, आपने सही कहा है ! आज तो मुखौटों का ही जमाना रह गया है ! दिल में कुछ होता है और मुंह पर कुछ और ! हाँ जहाँ तक नेताओं के मुखौटों की बात है तो मैं आपको बता दूं की नेतायों ने मुझसे से ही थोक में मुखौटे खरीद लिए है ! इस लिए चिंता की कोइ बात नहीं है ! मेरी दुकानदारी आप जैसे सज्जनों की कृपा से चल रही है ! आभार सहित राम कृष्ण खुराना

vats के द्वारा
April 27, 2010

मां का दिल, चौगुना दुःख के बाद एक और अच्छी प्रस्तुति. आप ने सहज तरीके से विषय को उठाया और गंभीरता से समापन किया. आप बधाई के पात्र हैं.

    R K KHURANA के द्वारा
    April 27, 2010

    प्रिय वत्स जी, आपको मेरी अन्य रचनाये भे पसंद आईं ! आपकी राय जानकर प्रसंता हुई ! आप जैसे सज्जनों के अनमोल विचार ही और लिखने को प्रेरित करते हैं ! आभार सहित राम कृष्ण खुराना

Subham के द्वारा
April 27, 2010

व्यंग में प्रवाह का अनुपम उदाहरण. बेहतरीन रचना और स्वस्थ हास्य का समावेश. प्रथम श्रेणी की कृति.

    R K KHURANA के द्वारा
    April 27, 2010

    प्रिय शुभम जी, अपनी प्रतिक्रिया के रूप में जो आपने प्यार दिया है वह अनमोल है ! कृपया अन्य लेखो के बारे में भी अपनी राय दें ! धन्यवाद्

Ram Kumar Pandey के द्वारा
April 27, 2010

वाकई शानदार प्रस्तुति. लाजवाब किया आपने. हालांकि मैं आपकी रचनाओं को काफी समय से पढ़ रहा हूँ किन्तु इस बार के अंदाज ने तो कमाल ही कर दिया.

    R K KHURANA के द्वारा
    April 27, 2010

    प्रिय राम कुमार जी, आपको मेरी रचनाये पसंद आईं ! मेरी मेहनत सफल हो गयी ! अन्य रचनायों पर भी अपनी प्रतिक्रिया लिखें ! धन्यवाद्

pankaj singh के द्वारा
April 27, 2010

आपने तो मुखौटे के रूप में आज के सामाजिक स्थिति का जो आइना पेश किया है वो वास्तव में बहुत ही सुन्दर है मेरी तरफ से आपको शुभकामनाये !!!!!

    R K KHURANA के द्वारा
    April 27, 2010

    प्रिय पंकज जी, आपकी प्रतिक्रिया पढ़ कर दिल को बहुत संतोष मिला ! मेरी रचना से समाज का चेहरा सामने आ गया ! धन्यवाद्


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