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KADLI KE PAAT कदली के पात

चतुर नरन की बात में, बात बात में बात ! जिमी कदली के पात में पात पात में पात !!

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R K KHURANA


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के द्वारा: satish yadav

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आदरणीय श्री खुराना जी, लगता है आपने मेरी बातों का गलत अर्थ निकाल लिया...मेरा तो सिर्फ इतना कहना था की ओसामा जो की आतंकवादी था उसके विचार भी आतंकी थे और जितने बुरे विचार उसके थे शायद ही किसी के रहे हो...लेकिन ये आपभी जानते है और हम भी की ओसामा को मानने वाले और उसकी पूजा करने वाले पाकिस्तान समेत पूरे विश्व में है....अब जब अगर ऐसे व्यक्ति को आप इस तरह चोरी से मार गिराते है तो उसकी पूजा करने वाले तो और भी उसे मानने लगेंगे की नहीं...मेरा मानना है की ओसामा को पकड़कर पूरी दुनिया के समक्ष सजा देना चाहिए था...मै आतंक और आतंक के नाम से भी नफरत करता हूँ...और यदि मुझे ओसामा को सजा देने का मौका मिलता तो पूरी दुनिया में सीधा प्रशारण करवाता और उसको सजा देता.....धिक्कार है ऐसे इंसान पर जिसकी वजह से बेगुनाहों की जान जाती है... **************************** एक अकेला आकाश तिवारी *****************************

के द्वारा: Aakash Tiwaari

के द्वारा: subhash

सर प्रणाम ये सही ही कहा गया है की हजार पन्नो की किताब जो पूरी तरह नहीं कह पाती उसे कोई रचनाकार बहुत आसानी से कुछ ही शब्दों में व्यक्त कर देता है ... सत्य को बहुत ही सटीक तरीके से आपने रखा है ....... जिन्दा ओसामा से ज्यादा खतरनाक मृत ओसामा है ... और जो रवैया है चरमपंथियों का वे ओसामा जैसो को रोल माडल बनाने में जरा भी देर नहीं करते .... मै जैन जी की बातो से सहमत हु चरमपंथी हर तरफ है .. अमेरिका चरमपंथ का सबसे कुख्यात उदाहरण है आज जो भी सामने है वह उसके किये का ही परिणाम है जो विश्व भुगत रहा है .. और विश्वा में सबसे ज्यादा हथियार बनाने और बेचने वाला यह देश विश्व को लगातार एक बड़े खतरे की तरफ धकेल रहा है जो कई सारे ओसामाओ से ज्यादा खतरनाक है .. एक बेहतरीन रचना

के द्वारा: nikhil

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सुश्री लता जी, मार्मिक रचना, अच्छी रचना, सुंदर, बहुत बढ़िया आदि आदि प्रतिक्रियाएं तो बहुत मिलती हैं ! परन्तु जब आप के द्वारा दी गयी प्रतिक्रिया जैसी कोइ प्रतिक्रिया मिलती है तो मन को एक सकून सा मिलता है और-और भी ज्यादा लिखने को मन करता है ! मेरी इस कहानी ने आपकी पुरानी यादों को ताज़ा कर दिया और आपको अपने बेटे की उन निगाहों का अर्थ समझ में आ गया ! आप अब सकून की नींद सो सकेंगी ! यह इस रचना के लिए आप लोगो की तरफ से बहुत बड़ा इनाम है ! मैं धन्य हो गया ! ऐसी प्रतिक्रियाएं मैं संजो कर रखता हूँ ! परमात्मा आपके बेटे की आयु लम्बी करे और वो हर दिशा में नाम कमाए ! ऐसे इश्वर से मेरी प्रार्थना है ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद शब्द छोटा पड जायगा ! राम कृष्ण खुराना

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: VICKY

के द्वारा: pooja

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: ajay

अछि प्रस्तुति नि:संदेह बेहद खुबसूरत रचना , पर कुछ अपनी और से कहना चाहूंगी ,रहिमन धागा .............................मत तोड़ो .................उम्दा बात है बहुत बड़ी बात है क्योकि बहुत पुरानी भी. पर प्यार इससे कुछ इतर है प्यार सिर्फ और सिर्फ प्यार होता है देवत्व तुल्य .वहा सीमा और सीमाओ की कोई आवशयकता नहीं होती .आज के पिज्जा और गले में फासी लगाने को प्यार नहीं कहते या किसी प्रकार के समझोते को प्यार नहीं कहते. वो तो एक जिद है जब तक मणि न जाये तीस देती है और पूरी होने के बाद टुकड़े{अनुपमा ]. क्या इसे प्यार की पनोती नहीं कहेंगे जहा प्यार ही गायब है.प्यार चरम है प्यार विश्राम है प्यार धुप है प्यार छाव है.प्यार सुरुवात है प्यार अंत है.

के द्वारा: sushma

के द्वारा: swapnil samadhiya

ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोए, औरन को सीतल करे आपहु सीतल होय ! - काका सादर प्रणाम । आपका लेख पढ़ कर एहसास होता है कि कई बार जोश में हम ऐसा कुछ कह जाते हैं जिससे अगला आहत हो जाता है । वाकई आज आपका यह लेख पढ़ कर प्रेम के कई मूल मंत्र सीखने को मिले । अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है और बुजुर्गों से यही आशा की जाती है कि जब हम गलती करेंगे तब वे धीमें से इशारा कर देंगे ‘बेटा ! ये ऐसे नही, ऐसे है ।’ सीखना चाहो तो सीख लो, तुम्ही को आगे काम आयेगा । इधर आपसे बहुत दिनों से बात नहीं हुयी थी लेकिन याद सबकी बनी रही । चाहे शाही जी हो, बाजपेयी जी हो, पारीक जी हों । अब लौट आया हूं । सबको पैलगी करने जाना है । बहुत बहुत आभार ।

के द्वारा: kmmishra

के द्वारा: globe

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: guddu panday

सर प्रणाम ............... प्रेम की बहुत लम्बी चौड़ी व्याख्या है .हम जितना लिखे कम ही है ........ एक शब्द में कहू तो प्रेम सहज जीवन का आधार है..........अब सहजता शब्द जितना छोटा है उसकी व्याख्या और व्यवहार उतना ही अधिक विस्तृत.... .. प्रेम कुछ भी नहीं मांगता वह सिर्फ देता है .. व्यक्ति में सहज वृत्ति .. समर्पण की वृत्ति और कुछ भी नहीं ये... मांगना तो इच्छा करना हो गया और इछाये वासना का आधार बन जाती है .. जबकि प्रेम तो केवल देता है और देने वाल बनता है ..... राम सीता ,कृष्ण , मीरा .. राधा ,, लैला ,कबीर तुलसी , ऐसे अनगिनत नाम है जिन्होंने व्यक्तिगत प्रेम से लेकर समष्टिगत प्रेम का ज्ञान दिया और उसे जिया .... यहाँ किसी ने नहीं कहा की अपना शीश दो .. या मैंने अपना शीश दिया ... केवल win and win .. अर्थात आराधक भी संतुष्ट और आराध्य भी ... प्रेम भी संतुष्ट और प्रेमिका भी .... बहुत अर्थपूर्ण लेख हमें आपसे बहुत कुछ सिखने को मिलता है ... धन्यवाद और शुभकामनाये...

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

के द्वारा: R K KHURANA

""जाने क्यों आज यह जी करता है, रूठ जांऊ तो मनाये कोई...... "", ""जिस का आगाज़ चोरी-चोरी हो, उसके अंजाम से डर लगता है........."", ""हम रूठें तो किसके भरोसे रूठें ? कौन है जो आयेगा हमे मनाने के लिए ?.................""" बहुत प्यारी शायरिया लगी हमे सर ! प्यार की कोई हमसे परिभाषा पूछे तो हम यही कहते है की .. जब कोई हमे बहुत ज्यादा याद आता है न हम खुद से पूछे के उस में क्या ऐसी बात है और इसका जवाब नही मिले तो शायद यही प्यार होता है ! जो किसे कारण से नही होता है ! कई में से एक हमारी भी fav शायरी है- "खुद्दार तबियत पर हम इल्ज़ाम नही लेंगे , मांगे से जो हाथ आये वो हम जाम नही लेंगे , इजहारे तमन्ना भी तौहीने तमन्ना है , वो खुद ही समझ जाये हम नाम नही लेंगे .."

के द्वारा: Mala Srivastava

आदरणीय श्री खुराना जी, आपका प्रेम पर लिखा ये लेख मुझे बहुत बहुत पसंद आया.....मेरा(आकाश तिवारी का ) मानना है की कोई भी प्रेम की परिभाषा नहीं दे सकता ..क्योंकि जिस चीज की सीमा निर्धारित हो जाए वो चीज अपना महत्व खो देती है और जब तक किसी चीज का ओर-छोर न मिले दुनिया उसी के पीछे परेशान रहती है...प्रेम को कभी भी शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता..यहाँ कुछ लोगों ने प्रेम पर बंदिशों को गलत ठहराया है......मेरा खुद का मानना है की प्रेम पर बंदिशे होनी ही चाहिए अगर प्यार सच्चा है तो वो प्यार दुनिया की सारी दीवारे तोड़ने की ताकत रखता है....मगर जो प्यार प्यार नहीं बल्कि आकर्षण होता है वो अपने ही घर की दीवारों को नहीं फांद पाता..और अगर फांद भी लिया तो भविष्य अंधकारमय हो जाता है......ये बंदिशे ही सच्चे प्यार और आकर्षण का भेद खोलती है.... अपने दो शब्द कहूँगा... ******************************************************** “तन्हा कितना रोता हूँ इसका मुझे अंदाजा नहीं. आज भी तेरा दिल तोड़ने का मेरा इरादा नहीं”.. ********************************************************* http://aakashtiwaary.jagranjunction.com आकाश तिवारी

के द्वारा: Aakash Tiwaari

चाचा जी नमस्ते, चाचा जी आपने बहुत ही अच्छा लिखा है आपने सही कहा है कि प्यार को किसी परिभाषा में बांधना कठिन है और किसी को प्यार के लिए विवश नहीं किया जा सकता बल्कि प्यार तो अपने आप ही हो जाता है चाचा जी प्रेम एक होता है लेकिन प्रेम के मायने बदल जाते हैं एक प्रेमी को अपनी प्रेमिका से शारीरिक प्रेम होता है, एक भक्त को अपने भगवान से भक्ति प्रेम होता है, भाई से भाई का प्रेम भातृत्व प्रेम होता है और एक माँ को अपने बच्चों से वात्सल्यी प्रेम होता है आजकल का प्रेम प्रेम नहीं रहा बल्कि वो अपना कार्य सिद्ध करने का एक मात्र तरीका रह गया है तभी तो आज एक भाई दुसरे भाई की संपत्ति को पाने के लिए क़त्ल कर देता है नवीन कुमार शर्मा बहजोई ( मुरादाबाद ) उ. प्र . मोबाइल नंबर - 09719390576

के द्वारा: NAVEEN KUMAR SHARMA

श्री खुरानाजी , नमस्कार देश की वर्तमान दुर्व्यवस्था का बहुत ही सही वर्णन किया है सत्ता पर आसीन भ्रष्टाचारी , बेईमान ही आज सबसे ऊंचा हो गया है उसमें हैवानियत आ गयी है इंसानियत मर चुकी है और जो ईमानदार लोग हैं उन्हें अपना फ़र्ज़ निभाने के लिए ज़िंदगी की भारी कीमत देनी पड़ती है तब कहीं जाकर हमारे शासन सत्ताधिकारियों के कान खड़े होते हैं और हरकत में आते हैं....अब तो हम सभी को सतर्क रहना होगा एक साथ कई आवाज़े विरोध मे आयें तब ही शायद स्थिति मे कुछ सुधार होने की गुंजाइश हो और फिर क्यों न इन सभी का पत्ता साफ़ किया जाए....... ! आइये सभी एक साथ ही चलें इनका पत्ता साफ़ करें....! इतने अच्छे लेख के लिए धन्यवाद !

के द्वारा: Alka Gupta

आदरणीय खुराना जी..... नमस्कार ....... इस सुंदर लेख के लिए बधाई......... इस मंच पर कई ऐसे लेख पढे जो देश की दुर्दशा पर ध्यान आकृष्ट करते हैं...... कुछ लेख स्वयं मैंने ही लिखे इस विषय पर......... फिर कई ओर लोगों से देश की बिगड़ती दशा पर बातें सुनी...........यहाँ अपने शहर भी 26 जनवरी के दिन मैंने अपने आस पास लगभग सभी को उनकी बातों मे उन्हे देश के लिए कुछ करने को तत्पर पाया..... फिर सोचा की अगर सभी इस दशा से इतने परेशान है तो आखिर दोषी कौन है...? फिर एक नजर दौड़ाई आस पास तो पता चला की लोग आदि हो गए है ...... इसी तरह अपने को दिलासा देने के.......... गंगा स्नान कर के पाप दूर करने की आदत पड़ गयी है। यहाँ लोग आदि है .... 26 जनवरी ओर 15 अगस्त को बड़ी बड़ी बातें करने के पर जब असल मे कुछ करना पड़ता है तो सब गायब......... ये देश बदल सकता है......... बस लोगों को अपना चरित्र बदलना होगा....... ओर हम लोगों को यूं ही प्रयास करने होगे ताकी ये लोग बदल सकें...... सबको ये मानना होगा की शुरवात किसी एक को अकेले ही करनी पड़ती है......... अंत तक एक हुजूम खुद ही खड़ा हो जाता है...... ओर न भी हो तो क्या.......... मुरदों की बस्ती मे एक जीवन बनके मृत्यु को प्राप्त करना अधिक मूल्यवान है........ आपकी इस सार्थक लेख का कुछ असर हो.......... इसी कामना के साथ........

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

चाचा जी नमस्ते, चाचा जी बहुत दिनों के बाद आपकी एक अच्छी पोस्ट पढ़ी चाचा जी देश की हालत का वर्णन बहुत ही अच्छे ढंग से से इस पोस्ट में किया है चाचा जी देश को इस हाल तक पहुँचाने में थोडा बहुत हाथ तो हम सबका भी है हम लोगों ने ही उन नपुंसक लोगों को सत्ता पे बिठाया है जो कोई भी निर्णय लेने में सक्षम नहीं हैं केंद्र सरकार न जाने क्यों घोटालों के दोषियों को सजा देने में हिचकिचा रही है कहीं न कहीं ये सत्तासीन लोग भी इन घोटालों में हिस्सेदार हैं और केंद्र सरकार काले धन के खाताधारियों के नाम भी नहीं खोल रही है उसका कारण ये हो सकता है कि ये काला धन भी कांग्रेसियों का ही हो इसीलिए केंद्र सरकार देर करके अपने नेताओं को ये काला धन दूसरी जगह शिफ्ट करने का समय दे रही है . नवीन कुमार शर्मा बहजोई (मुरादाबाद ) उ . प्र. मोबाइल नंबर - 09719390576

के द्वारा: NAVEEN KUMAR SHARMA

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: kavita

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: vikram singh nagarkoti

के द्वारा: raju verma

प्रिय मिहिर राज जी, आपको कहानी पर ख़ास एतबार नहीं आया ! ठीक है आप डाक्टर है और विज्ञानं के विद्यार्थी है ! विज्ञानं को प्रमाण की आवश्यकता होती है ! परन्तु प्रमाण तो मैं दे नहीं पाउँगा ! क्योंकि यह मेरे पिता श्री ने मुझे सुनाई थी और अब वे इस नश्वर संसार को छोड़ चुके है ! हाँ लगभग एक डेढ़ वर्ष पहले मैंने टी वी पर मानो या न मानो कार्यक्रम में देखा था की एक बालक बचपन से जंगल में भटक जाता है और उसे बन्दर पालते है ! वो बंदरों की तरह पेड़ पर बड़ी आसानी से चढ़ जाता था ! नंगा बदन और नंगे पांव चलने और पेड़ पर चढ़ने में उसे कोइ दिक्कत नहीं होती थी ! लगभग 17 - 18 वर्षों बाद अचनक उसके माँ-बाप को वह मिल गया ! और उसके माता पिता उसे सभ्य इंसान की तरह रहने की तालीम दे रहे थे ! ऐसे कई हैरत अंगेज किस्से देखने सुनने में मिलते है ! फिर भी मैं आपकी भावनायों की कद्र करता हूँ और आपकी आशानुरूप और अच्छा लिखने का प्रयास करूंगा ! समय निकाल कर प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद राम कृष्ण खुराना

के द्वारा: R K KHURANA

खुराना काका सादर प्रणाम । अद्भुत घटना सुनाई आपने और यह असंभव भी नहीं हैं क्योंकि इस तरह की तमाम घटनाएं प्रकाश में आयी हैं जिन्हें अखबार और किताबों के माध्यम से हमने पढ़ा है । रूडयार्ड किपलिंग की जंगल बुक भी ऐसी किसी घटना पर आधारित रही होगी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है आपका कहानी बयां करने का अंदाज । रोमांच से भरपूर । . वैसे इसमें कोयी शक नहीं कि जानवर भी सोचते समझते हैं । ईश्वर ने उनको दिमाग दिया है, विवेक भले ही न दिया हो पर वह अपनी तरह से सोचते समझते खूब हैं । चाहे जंगली जानवर हो या पालतू जानवर । मैंने महसूस किया है कि अगर आपको किसी जानवर से संपर्क करना हो तब आंखे सबसे महत्वपूर्ण माध्यम होती हैं । अगर आपकी आंखों में प्यार है तब फिर चाहे हिंसक शेर ही क्यों न हो वह शांत हो कर बैठ जायेगा । इस प्रयोग को आप कुत्ते और बिल्लियों पर आजमा कर देख सकते हैं । आपका भतीजा के एम मिश्र

के द्वारा: kmmishra

आदरणीय खुराना साहब, आपके पूज्य पिताजी का यह संस्मरण तो रोचक है ही, परन्तु इसकी रोचकता में आपकी सुगम लेखनशैली ने जान डाल दिया है । जानवरों में हाथी सबसे बुद्धिमान प्रजाति में हमेशा से ही जाना जाता है । संवेदनशीलता में हाथी सभी जानवरों में सर्वोत्तम है, तथा इनके समाजवाद को तो मनुष्य से भी उच्च कोटि का स्थान दिया जा सकता है । बच्चों की देखभाल पूरा झुंड मिलकर करता है, एवं समूह के मध्य में सुरक्षित रखते हुए चलता है । यह हाथी ही हैं, जो अपने पुरखों को श्रद्धांजलि देने साल में एक निश्चित समय पर उनकी अस्थियों के पास जाकर कपाल को सूंड में लपेटते हुए आंसू बहाते देखे जाते हैं । साधुवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

प्रिय मिहिर राज जी, क्षमा करना कंप्यूटर में कुछ तकनिकी खराबी आ जाने के कारण पहली पोस्ट अधूरी छाप गयी थी ! मेरी रचना “परमपिता को प्रणाम” पर आपकी प्रतिक्रिया मिली ! अपने कहा है की भगवान और देवी-देवता में क्या अंतर है ! यहाँ परमपिता परमात्मा से अर्थ उस निराकार इश्वर से है ! फिर पुराने ज़माने में बहुत से पीर पैगम्बरों को भी देवी देवता मानकर उनको बलि चढ़ाई जाती थी ! तो इसलिए निराकार ब्रह्म से वे अलग माने जाते है ! ऐसे मेरी तुच्छ बुद्धि का मानना है ! फिर सत्संग में सुनी कहानी को मैंने वैसे का वैसे ही रख दिया है ! आप तो जानते है कि ऐसे कथायों में तर्क - कुतर्क के लिए कोइ स्थान नहीं होता ! पुराने ज़माने में तो बिलकुल ही नहीं ! फिर भी आप या कोइ एनी सदस्य जो ज्यादा अच्छा जनता हो कृपया बताने का कष्ट करें ! धन्यवादी हूँगा ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार राम कृष्ण खुराना

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: Alok Agrawal

प्रिय मुनीश जी, मेरा व्यंग "गाली" पढ़कर आपको अपना बचपन याद आ गया ! आपके बचपन की लड़ाई मेरे व्यंग से मिलती जुलती है ! अच्छा इत्तफाक है ! फर्क सिर्फ नाम का है ! भ्रष्टाचार वही है चेहरे बदल गए है ! आपने कहा है की मैंने कलमाड़ी का ही नाम क्यों लिया ! यह समय की मांग थी ! आज के समय में कलमाड़ी ही भ्रष्टाचार का पर्याय बन गया है ! कलमाड़ी का नाम सुनने के बाद कुछ कहने की जरुरत नहीं होती ! आशय समझ में आ जाता है ! यदि मैं कांग्रेसी का नाम लेता तो लिस्ट बहुत बड़ी हो जाती ! फिर वो वजन नहीं पड़ता जो कलमाड़ी के नाम से पड़ा है ! दूसरी तरह जिमी को भी कांग्रेसी के नाते काटना पड़ता फिर तो पुरु को 14 टीके लगवाने पड़ते ! लेकिन जिमी पुरु को भाई की तरह मानता है वो ऐसे तो नहीं करेगा \ ! खैर......... इतनी गहरी से प्रतिक्रिया देने के लिए आपका आभारी हूँ ! राम कृष्ण खुराना

के द्वारा: R K KHURANA

आदरणीय खुराना जी............. आपकी इस कहानी ने एक छोटा सा सवाल खड़ा किया है....... मैंने ये कई बार देखा है or भोग भी है........... और मज़बूरी वश ढो भी रहा हूँ (मतलब आज भी उन बातों को मानता हूँ...) की लोग क्या कहेंगे, .................. की मौत का ज़रा सा भी गम नहीं ? या मरने वाले के मरने के एक साल तक घर में कोई मांगलिक कार्य नहीं होगा.......... घर वाले मंदिर में नहीं जायेंगे.......... और न जाने क्या.......... पर क्या ये दुःख लोगों को दिखाना जरूरी है............. क्या आप किसी के दुःख में अपने अपनों के लिए खुशियों में शामिल नहीं हो सकते............ क्या फायदा की आप आज चाचा के मरे में मामा के घर खुशियों में नहीं गए और कल मामा को ही कुछ हो गया तो............. क्यों जिंदा से ज्यादा हम उस मृतक को महत्व दे देते हैं.......... जबकि हमारे धर्म ग्रन्थ कहते हैं की वो मरकर कहीं दूसरी जगह जन्म ले लेता हैं............ तो इक जिन्दा आदमी (जो कहीं और जन्म ले चूका है......... )के लिए कई जिन्दों की खुशियों को बढाने में क्या हर्ज़ है..................... ! मैं नंगे पांव ही पप्पू को उसी प्रकार उठाए बाज़ार की ओर दौड पडता हूं ! ये हर बार क्यों नहीं होता............. बेहतरीन लेख के लिए हार्दिक बधाई................

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

आदरणीय श्री खुराना जी प्रणाम । यह जानकार मन प्रसन्‍न हुआ कि आपके दामाद अब स्‍वस्‍थ हैं । मैं भी अस्‍वस्‍थता के कारण इस मंच से अनुपस्थित था । लेकिन आज ही आपकी तीनों रचनाएं जब डाकू अमृतलाल से मेरी भेंट हुई, कलमाडी से बडे तो नहीं व डेढ लाख के हस्ताक्षर पढ़ी । डाकू से भेंट ही मन को कंपा देती है और उस समय तो इनका बोल-बाला था । अंधी व मुर्खतापूर्ण वीरता ना दिखाना ही ठीक था । कलमाड़ी जी के कृत्‍यों को बयां करती आपकी कविता हम हिन्‍दी दिवस है मनाते की तरह अच्‍छी बन पड़ी हैं । आपनें थोड़े में ज्‍यादा बात लिख दी है । प्रिय श्री मिश्र जी ने सही लिखा है कि अपराध कथा का लेखन सहज व सरल नहीं हैं । आपनें बहुत सुंदर रचना लिखी है । एक मछली से सारा तालाब गंदा हो जाता है यही इसका सार भी है । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: bhaijikahin by ARVIND PAREEK

के द्वारा: Raj kumari

के द्वारा: deepak

के द्वारा: amita

के द्वारा: Shibbu Arya-Mathura

खुराना जी आप आजादी के निशानों को आज ढूंढ़ रहे हैं आजादी का तो १६ वर्ष की उम्र में ही अपहरण हो गया था जब देश की संसद में कुछ पूंजीपतियों के आशीर्वाद से कुछ गुंडे / अपराधी / माफिया किश्म के लोगों का आगमन हुआ था आज ६३ वर्ष की बुढ़िया हो गई है आजादी आप की तरह मथुरा नगरी में भी बेचारी बाल विधवाएं/बूढी विधवाए राधे-राधे गा कर आजादी को ढूंढ़ रही हैं \ भारत का मेहनत कश किसान भी लाइन में लगा है आजादी को ढूंढने में क्योंकि जब उसको न तो अपनी फसल की कीमत तय करने दी जाती है और न ही जब उसकी जमीन जबरन छीन कर विकास के नाम पर बड़े बड़े पूंजीपतियो को दे दी जाती है तो जमीन की कीमत भी वह तय नहीं कर सकता है वह भी कराह उठता है कहां है आजादी | देश की सबसे बड़ी पंचायत में अपने केस लड़ने के लिए भी केवल अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता होने से भी सामान्य नागरिक कराह उठता है और उसके मुंह से निकलता है की कहाँ है आजादी ? आज आजादी को बढे -२ मिनिस्टर के बंगलों में मिलेगी, एम् एल ए / एम् पी की कोठियों में मिलेगी, देश के ब्युरोक्रेट के फ्लेट्स में मिलेगी , पूंजीपतियों के आलिशान फ़ार्म - हाउस में मिलेगी सबसे आखिर में अगर देखने की इच्छा हो तो देश के किसी भी क्षेत्र के किसी भी थाने में तशरीफ ले जाईये वहां थाने दार तो थाने दार छोटे से सिपाही को भी पूरी आजादी है आप के साथ कैसा भी व्यवहार करने की चाहे आप स्वयं ही स्वतंत्रता सेनानी रहे हों \ आपके साथ-साथ हम भी ढूंढ़ रहे हैं कभी तो मिलेगी आजादी //////////// एस०पी० सिंह , मेरठ

के द्वारा: s.p.singh

प्रिय अरविन्द जी, आपको मेरी कहानी "कच्चे धागे" छू गयी ! कहानी कहने का मकसद भी यही होता है की पढने के बाद आदमी सोचने पर मजबूर हो जाय ! उसके दिल पर चोट सी लगे ! कहानी को अपने आस पास घटित होता हुआ महसूस करे ! हाँ, आप ने ठीक कहा ! आपके अनुभव की और आपकी पारखी नज़रों की मैं तारीफ करता हूँ ! वास्तव में यह कहानी एक छोटे से सच पर ही आधारित है ! मैंने खुद एक बहन को अपने "बनाये हुए भाई" के हाथों यह पीड़ा भोगते हुए देखा था ! बात बहुत ही पुरानी है ! शायद सन 1962 -63 की होगी ! मैं दिल्ली अपने मामा जी के यहाँ आया हुआ था ! उनका जनरल स्टोर था ! मामा जी के लड़के ने ही ऐसा किया था ! बहुत छोटी सी घटना थी ! मेरे सामने तो वो लड़की आई उसने राखी के लिए कहा तो भाई ने बिना राखी बंधवाए ही उसे पैसे पकड़ा दिए ! बस सिर्फ यही एक लाइन थी जो सच है ! बात मेरे मन में घर कर गयी ! बाकी कहानी तो मेरी कल्पना का ही तानाबाना है ! इधर जागरण से राखी के लिए लिखने का निमंत्रण मिला तो यह बात मेरे मन में कौंध गयी ! सोचा यही सच्चाई बयां कर दूं ! परिणाम आपके सामने है ! आपके स्नेह के लिए आपका धन्यवाद् ! राम कृष्ण खुराना

के द्वारा: R K KHURANA

प्रिय प्रेम जी, "प्रभु का सिमरन सबसे ऊंचा" कहानी आपको बहुत मनोरंजक लगी ! धन्यवाद् ! परन्तु इसके शीर्षक ने आपको बहस में डाल दिया ! शायद आपको प्रभु का सिमरन ऊंचा होने पर आपत्ति है ! जब भी कोइ रचना पढ़ी जाती है तो उसके पढने वाले उसे अपनी सुबिधानुसार अपने अपने विचार से अलग अलग ढंग से लेते है ! किसी को कोइ बात पसंद आती है तो किसी को कोइ और ! कोइ उसी बात को नापसंद करता है तो कोइ उसकी तारीफ ! आपकी बातों में विरोधाभास मिलता है ! आप उसको मानते भी है परन्तु मानने से इंकार भी करना चाहते है ! आप कहानी को मनोरंजन के साधन के रूप में लेते है भाव को छोड़ देते है ! आपने कहा की स्वतंत्रता के पहले केवल श्रद्धालु भक्त मंदिर जाते थे ! यह कहानियां भी आज की नहीं हैं ! उस ज़माने, या उससे भी पहले के ज़माने की ही हैं ! केवल उसका रूप बदला है ! सन्देश वही है ! आपके कहने के अनुसार बहस के कई मुद्दे बन जायेंगे ! परन्तु उनका परिणाम जो होगा वो आप भी जानते हैं और मैं भी जानता हूँ ! बहस इस बात से शुरू हो सकती है की भगवान है या नहीं ! फिर भगवान् को आप मानते हैं या नहीं ! फिर संतो के प्रवचनों को आप किस प्रकार से लेते है ! केवल मोनोरंजन के लिए या उसमे से कुछ और प्राप्त करने के लिए ! आदि....आदि...! आपको सत्संग पर भी कुछ एतराज़ है ! सत्संग या मंदिर प्रार्थना करने या भगवान् का नाम लेने के लिए एक अलग शुद्ध स्थान माना जाता है ! जिस प्रकार हम रसोई में खाना पकाते है ! शयन कक्ष में सोते है ! गुसलखाने में नहाते हैं उसकी प्रकार मंदिर में, सत्संग में प्रार्थना करते है ! बहस करने के लिए तो बहुत विषय है परन्तु मैं फिर कहूँगा की उसके परिणाम सबको मालूम है ! किसे ने कहा है : चमन को देख तो सिर्फ फूल पात को न देख यानि कि जान को पहचान, खाई बिसात को न देख ! यह मत देखो की सामने वाले ने आपको क्या खिलाया है ! यह देखो की उनसे कितने प्यार से, किस भावना से खिलाया है ! बात आप पुराने ज़माने की कर रहे है ! पुराने ज़माने में श्री राम ने पिता के वचन को निभाने के लिए राज पाठ छोड़ कर १४ साल का बनवास जाने को प्रार्थमिकता दी ! शायद आज का "बुद्धिजीवी" पुत्र अपने पापा से विद्रोह कर देता और अपनी पत्नी को लेकर अलग घर बसा कर रहने लगता ! फिर यदि पुत्र मान जाता तो पत्नी तलाक लेकर मायके चली जाती ! यह तो आप पर निर्भर करता है की आप सत्संग से क्या लेकर जाते है ! ढोंगी बाबायों के कारण आज 'भगवान्' पर शक किया जाता है ! लेकिन जरूरी नहीं है की आप ऐसे 'संतो' की बात को अँधा धुंध मान लें ! आप तो अपने मतलब की चीज़ निकल के ले जा सकते है ! आप वहां से क्या लेते है यह तो आप पर ही निर्भर है ! आज के आर्थिक युग में हर चीज़ को पैसे की नज़र से ही देखा जाता है ! इसी लिए आपका कहना भीड़ में पैसा बहुत है जायज है ! लेकिन यह कहानिया पथभ्रष्ट नहीं करती ! पथभ्रष्ट होने के लिए आज के नौजवानों के पास और बहुत से साधन है ! जिन्हें रोकने के लिए आप-हम कुछ भी नहीं करते !.... कितनी बहस करेंगे ? कितनी बहस में पड़ेंगे ? क्या लाभ होगा ? आप कहते जाओ मैं सुनता जाऊँगा ! मैं कहता जाऊँगा आप सुनते रहोगे ! अंत ....??? अंत में क्या .....???? खैर ....आपने समय निकाल कर प्रतिक्रिया की आपका आभारी हूँ ! राम कृष्ण खुराना

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: shivani

बहुत मनोरंजक कहानी है| अच्छी लगी| लेकिन प्रभु का सिमरण सबसे ऊंचा शीर्षक देकर इस कहानी को एक नई संज्ञा देते हुए आप बुद्धिजीवी के मन में एक विवाद खड़ा कर रहे हैं| प्रभु का सिमरण व्यक्तिगत भावना और विश्वास है जो मनुष्य में निरंतर पनपती उस पुण्य आत्मा का अंग है जो उसके जीवन को सार्थक बनाये रखती है| स्वार्थहीन, सत्य का पालन कर वह समाज में अच्छे व्यवहार व कर्मों द्वारा जीवन यापन करता है|  समस्त भारत में भ्रष्टाचार और सामाजिक अनैतिकता के वातावरण में कही यह कहानी और ऐसी ही अन्य कहानियां केवल मनोरंजन हेतु सत्संग में भीड़ एकत्रित करने में अवश्य सफल होती हैं| और हाँ, धर्म के धंधे में बहुत पैसा है| अधिक भीड़, और भी अधिक पैसा| परन्तु प्रश्न है कि सत्संग का क्या हुआ? मंदिर, मस्जिद, गुरद्वारे अथवा दूसरे धार्मिक स्थान को यदि मनोरंजन सभा बना दिया जाये तो धर्म व आदर्श सीखने के लिए कहाँ जाना होगा? स्वतंत्रता के पहले मंदिर बहुत कम संख्या में दूर पहाड़ों में या धार्मिक स्थलों में होते थे जहां केवल श्रदालू भगत पहुँचते थे| जीवन में यह अभ्यास छोटे बड़े सभी में नम्रता को जन्म देता था| घर में बड़े-बूढों के साथ रहते बच्चों में चरित्र का निर्माण होता था| आज जब गली गली मुहल्लों में मंदिर, मस्जिद, और गुरद्वारे स्थित हैं तो इन पन्नों पर भगवान बाबू की प्रतिक्रिया व्यावहारिक रूप से उपयुक्त प्रतीत होती है क्योकि सत्संग में कही इन कहानियों से पथभ्रष्ट हो मनुष्य में प्रभु और धर्म के तत्व को समझने व जीवन में अपनाने की गंभीरता मिट जायेगी|

के द्वारा: प्रेम सिलही

प्रिय निखिल जी, आपने बहुत ही सुंदर प्रश्न किया है ! हमें अपना कर्तव्य तो करना ही होगा ! भाग्य है और अपना रोल अदा करता है ! अपनी अपनी मान्यता है ! मेरी कविता "कोइ गारंटी नहीं" में भी आया है की सफलता किस्मत से मिलती है , हार को आप रोक नहीं सकते ! मैं भाग्य को मानता हूँ ! आपके विचार आपके अपने है ! परन्तु कार्य तो करना ही पड़ेगा ! हाँ, फल "उसने" देना है ! यह तो विश्वास की बात है ! मानो तो देव नहीं तो पत्थर ! इस संसार में और कम से कम हमारे देश में बहुत से लोग भाग्यवादी हैं ! और उनका मानना है कि इन उपायों को करने से उन्हें लाभ होगा ! विश्वास से करने पर लाभ होता भी है ! इन उपायों में से कई उपाय मैंने खुद भी आजमायें है और हमारे परिचितों, मित्रों ने भी किए है और लाभ मिला है ! इन उपायों के बारे में अंतिम तथ्य यह है कि इनको करने में कोइ हर्ज़ नहीं है ! यदि आपको लाभ होता है तो बहुत ही अच्छी बात है ! यदि नहीं भी होता तो मन को एक उम्मीद रहती है ! सभी उपाय सभी जगह कारगर नहीं भी होते ! वो ग्रहों पर निर्भर करते है ! जहाँ तक विश्वास की बात है हमारे यहाँ औरते न मानते हुए भी करवा का व्रत रखना नहीं भूलती ! खैर .....बहस नहीं सर, ....विश्वास है तो कीजिये वरना छोड़ दीजिये ! आपने समय निकाल के प्रतिक्रिया dee और अपनी विचोरों से अवगत कराया ! इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद् ! ram krishna khurana

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: sandeep sharma

के द्वारा: Sunil

आप इस जागरण मंच पर चाचाजी के नाम से जाने जाते है और एक चाचाजी होने के नाते आपने ठीक वैसे ही कहानी सुनाई, चाहे आपने ये कहानी किसी सत्संग से लेकर लिखी हो या खुद कोई फर्क नही पड्ता। आपने अपना काम बखूबी किया है। इस देश के हर गली में, हर घर में यहाँ तक की टीवी के अनगिनत चैनलो पर रोजाना इतनी सारी कहानियाँ गढी जाती है कि अब ये सारी बातो मे कोई रस नही रह गया है, अगर आप इसे प्रभु का सिमरण कहकर उँचा काम बताते है तो मै आपको बता दूँ कि आने वाली पीढियों मे इस प्रभु के लिये बहुत बडा खतरा साबित होगा। खतरा तो मुझे आज भी दिखाई पड रहा है क्योकि बेवजह के सत्संगो मे जाकर लोग और भी अंधेरे मे जा रहे है। जो सिर्फ प्रभु का सिमरण एक तकिया-कलाम की तरह ले रहे है, जिनसे सिफॅ उन्हें प्रभु का भ्रम है, वो प्रभु के डर की वजह से वो सुमिरन कर रहे है, आप ये बताईये कि ये करने से क्या होगा? कब तक ये ढोंग चलता रहेगा? और आपके कहानी मे महानता चोर की है न कि उस सत्संग की, अगर सत्संग मे खूबी होती तो उस सत्सग मे आये और भी हजारो श्रोता जो थे उनकी कहानी छ्पती, न कि चोर कि। जब कोई किसी काम को पूरी तल्लीनता के साथ डूबकर करता है तो एक दिन ऐसा समय आता है जब उसे उस काम से विरक्ति मिल जाती है, यही बात राजा भर्तृहरि के साथ हुआ, वही इस चोर के साथ हुआ है और कुछ नही ....... www.bhagwanbabu.jagranjunction.com

के द्वारा: bhagwanbabu

के द्वारा: gulshan saini

के द्वारा: naveenrastogi

के द्वारा: शिवेंद्र मोहन सिंह

प्रिय श्री खुराना जी, किस्‍सा बस दिल को किस कर गया । बहुत अच्‍छा लगा । आपनें लिखा है - बडे साहब की बात सुनकर हमारा दिल टूट गया ! मरने का सारा जोश खत्म हो गया ! हमारा सारा उत्साह धरा का धरा रह गया ! हमारी मरने की इच्छा ही मर गई ! सोच रहे हैं कि अब मर कर क्या करेंगें ?  लेकिन आज के जमानें में जी कौन रहा हैं यहां तो सभी मुर्दा है । तभी तो भ्रष्‍टाचार जैसे मुद्दे आज भी सर उठाये खड़ें हो और बाबुगिरी की जयजयकार हो रही है । हॉं आपने मुझसे पुछा था कि यह टैग शब्द क्या है ! हम जो शीर्षक देते है उसके अनुसार तो सिमिलर अर्तिक्ले में रचनाये नहीं आ रही ! टैग अलग से बनाना पड़ता है क्या ? टैग वह शब्‍द हैं जो आपके लेख में आए हैं और आप चाहते हैं कि उन शब्‍दों के आधार पर भी विभिन्‍न सर्च इंजन आपके लेख को दिखाएं - जैसे इस लेख 'किस्सा देहदान का' में से किस्‍सा, देहदान, बडे बाबू, इच्छा पत्र (विल फार्म), अस्‍पताल आदि । ये सभी इस लेख के टैग हो सकते हैं और आप चाहें तो ऐसे शब्‍द भी टैग के रूप में जोड़ सकते है जो लेख में नहीं हैं । लेकिन आपको इसके लिए जब आप नई पोस्‍ट Add करते हैं तो Add new पर क्लिक करने के बाद दिखनें वाली स्‍क्रीन पर आपके दायें हाथ की और देखना होगा । वहां Post Tags के ठीक नीचे Add new tag तथा उसके साथ Add लिखा दिखेगा । आप जिन शब्‍दों को टैग के रूप में लेख से जोड़ना चाहते हैं उन्‍हें Add new tag पर क्लिक कर टाईप कर दें अथवा पहले से कहीं टाईप किए शब्‍दों को कॉपी कर यहां पेस्‍ट कर दें फिर Add बटन दबा दें । इस तरह जो शब्‍द आप टैग के रूप में देंगें यदि वही शब्‍द मेरे या मिश्रा जी के या चातक जी आदि के किसी लेख के भी टैग शब्‍द होगें तो उन लेखों के नीचे आपका लेख का शीर्षक सीमिलर आर्टिकल के रूप में नजर आएगा । ये टैग आप अपने पुराने लेखों में भी डाल सकते हैं । इसके लिए आप पहले एडिट करने की प्रक्रिया के अनुसार लेख को एडिट के लिए खोलिए तत्‍पश्‍चात् उपरोक्‍त प्रक्रिया अनुसार ही टैग एड कर दीजिए । आशा है इससे काफी कुछ स्‍पष्‍ट हो गया होगा ।

के द्वारा: Arvind Pareek

के द्वारा: arun kuamr malhotra

के द्वारा: ASHVINI DIXIT

प्रिय श्री खुराना जी, भई वाह मजा आ गया । क्‍या गुदगुदाया है आपने - 'अरविन्द पारीक जी को लैपटाप की सख्त जरूरत थी ! बेचारे कैफे में जाकर अभी कुछ रचनाओं को उलट-पलट कर पूरी तरह से देख भी नहीं पाते हैं कि समय समाप्ति की घोषणा हो जाती है ! जागरण की तरफ से लैपटाप मिल जाता तो रज़ाई में दुबके-दुबके भी अपनी “लैप” खोलते और उस पर “टाप” रख कर लेख लिख मारते !'  लग रहा है लैपटॉप मिल ही गया । जिस तरह आपनें सभी ब्‍लागर्स के चोलों को गुलाबी बना कर मजा दिया हैं उसका कोई जबाव नहीं हैं । सन्‍नी राजन जी को हमारे बुजूर्ग ने जवाब दे दिया अब बाकी आठ की क्‍या जरूरत हैं । हॉं प्रथम पुरस्‍कार पाने के लिए बधाई । जब लैपटॉप मिल जाए तो उसके बारे में भी कुछ बताईएगा । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

प्रिय अदिति, मुझे तो पहले ही पता था की अब मुझे डांट पड़ेगी ही ! यह ब्लागर भाई हैं न यह मुझे ऐसे ही उकसा देते है और मैं जोश में आकर कुछ उल्टा सीधा लिख देता हूँ कुछ लोग इसे गलती से व्यंग कहने लग पड़ते है ! और फिर टीचर दीदी से डांट खानी पड़ती है ! मुझे डांट खिला कर अब इनके कलेजे में ठण्ड पड़ गयी होगी ! आपने भी तो पहली लाइन में ही मेरी झूठी तारीफ करने के लिए लिख दिया है एक अच्छा व्यंग ! प्रिय अदिति जी, शायद प्रतिक्रियाकारा शब्द आपको बुरा लग गया ! नहीं बिटिया रानी मैंने किसी का भी दिल दुखाने के लिए आज तक कुछ भी नहीं लिखा ! मैंने इसीलिए पहले ही माफ़ी माँगी थी ! यदि आपको मेरी कोइ भी बात बुरी लगी है तो मैं आपसे फिर हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगता हूँ ! राम कृष्ण खुराना

के द्वारा: R K KHURANA

चाचाजी, एक अच्छा व्यंग्य, पर शायद आप टाइटल दे कर भूल गए कि आप व्यंग्य किस पर लिख रहे हैं या गलती से गलत टाइटल दे दिया.... क्योंकि गुलाबी रंग की तो ज्यादा बात ही नहीं हुई, बात हुई अदिति जी की प्रतिक्रियायों की, कृष्ण मोहन जी की, सनी जी की (जिसे आपने सुमित राजन लिख दिया) और आपके सपनों के लैपटॉप की.... आपने हमें एक अच्छी प्रतिक्रियाकारा कहा आपका आभार.... अब लगे हाथों जागरण वालों से इसके लिए पुरस्कार भी दिलवा ही दीजिये... हमें अच्छा लगता है जब हम दूसरों की पोस्ट पर प्रतिक्रियाएं देते हैं.... और आपको तो पता है हम पढ़े बिना प्रतिक्रिया नहीं देते हैं.... आपको बताया तो था हमने, जब आपने अपनी पुरानी पोस्ट पर प्रतिक्रिया देने कहा था.... पढ़ने से हमारा ज्ञान तो बढ़ता ही है और प्रतिक्रिया से सामने वाले का हौसला भी बढ़ता है, समय बेशक ज्यादा लगता है...... वैसे आपने एक अच्छा आईडिया सुझा दिया, हमें भी बताइयेगा आप जिस तराजू में तौल कर प्रतिक्रिया देते हैं और वो कहाँ मिलता है, हम भी एक मंगवा लेंगे.... वैसे एक बात अच्छी लगती कि हमारी देखा-देखी ही सही आप भी सभी पोस्ट पर प्रतिक्रिया देने कि कोशिश करते हैं... और तो और जब कोई पोस्ट नहीं बचती तो अपनी ही पोस्ट पर आई प्रतिक्रियों का दो-दो बार जवाब देते हैं, इससे एक तीर से दो निशाना हो जाता है... समय भी कट जाता है और आपकी प्रतिक्रियाओं की संख्या में भी इजाफा हो जाता है.... और तो और कभी-कभी.... खैर छोडिये इन बातों को....

के द्वारा: aditi kailash

प्रणाम सर , लेख को देर से पढने के लिए माफ़ी चाहता हूँ | आप जैसे प्रतिभावान लेखक का हर शब्द अपने आप में संजीवनी से कम नहीं है | अब बात इस पोस्ट की तो , बहुत ही धुंधले विषय पर हाथ लगाया है आपने | बेवक़ूफ़ सभी बन रहे हैं पर अफ़सोस की बहुत गर्व के साथ | रेडीमेड गारमेंट के शोरूम में जाइए , ५०० की पैंट को १५०० का लिखकर , ५०% डिस्काउंट वो भी फ्लैट देने की बात कहते हैं यानी मुनाफा फिर भी २५० . पर हम बड़े ही गर्व से कहते हैं की भाई १५०० की पैंट लाये हैं | दरसल बेवक़ूफ़ बनाने और बनने में हमे अपार ख़ुशी होती है | अगर बनने वाले हम लोग हैं तो बनाने वाले भी हमारे बीच में ही हैं , कभी हम किसी को बनाते हैं , कभी कोई हमे बनाता है , तो कभी कोई और उसे बनाता है जिसने हमे बनाया हुआ होता है | मेरा लेख 'माफिया समाज' भी इन्ही लोगों से सम्बंधित है | मेरी ओर से आपको शुभकामनाएं | धन्यवाद

के द्वारा: ASHISH RAJVANSHI

के द्वारा: शिवेंद्र मोहन सिंह

रेस्पेक्टेद खुर्राना ग, मैंने आपके लाल किताब के टोटके वाला कोलुमं पढ़ा और मुझे महसूस हुआ की आपने एक आदमी की जिंदिगी का पूरा हॉल इस ४ उपाय में समेत दिया है, ऐसा तोह कोई परफेक्ट अस्त्रोलोगेर और मंझा हुआ आदमी हे कर सकता है. सर मेरी अ छोटी सी प्रॉब्लम ज्योतिषियों के लिया बड़ी बन गई है. मैं कितने हे ज्योतिशियन से मिल चूका हूँ सपेसिअल्ली लाल किताब के, क्यों की मैं पुनजब, जालंधर का रहना वाला हूँ, तोह यहाँ लाल किताब प्रचलित है. पैर कोई रिजल्ट निकल कर सामने नहीं आया. माय प्रॉब्लम इस विवाह का योग नहीं बन रहा, बात चल कर रुक जाती है, और कोई सही रिश्ता नहीं आता. किर्पया मेरी कुंडली देख कर मुझे रास्ता दिखाय और उपाय भी बताया. २९.१०.१९७७, टाइम ५.१९ सुबह जालंधर, पंजाब. आप का धन्यवादी राकेश, जालंधर.

के द्वारा: Rakesh Kumar

प्रिय श्री खुराना जी, धर्मेन्‍द्र के स्‍टाइल में धमकी देने की क्‍या जरूरत थी । आप तो वैसे ही आदरणीय है व सदा सबसे आगे ही रहेंगें । गलती तो मेल भेजने वाले की है कि उसने विशेष टिप्‍पणी नोट के रूप में संलग्‍न कर दी । आप ऐसा करिए कि दावा डाल दीजिए 50000 का ताकि 35000 की राशि तो वसूल हो । क्‍यों नहीं जागरण ने मेल में सबसे ऊपर यह नोट डाला, ऐसा उन्‍होंनें धोखा देने व हलवाई के साथ मिलकर कुछ कमाने की नीयत से किया ताकि जिन जिन ब्‍लागर्स को उन्‍होनें यह मेल भेजी वे सभी आपकी तरह कुछ खर्च करें और प्राप्‍त कमीशन से जागरण पुरस्‍कार का वितरण कर सके । खैर सच्‍ची जानकारी देने के लिए शुक्रिया । मैं सावधान हो गया हूँ । बेहतरीन रचना, एक अच्‍छे व मौलिक व्‍यंग्य के लिए बधाई ।

के द्वारा: bhaijikahin

चाचा जी, आपकी लिखी कहानी में कहानी कहाँ है ? ये तो यथार्थ का वृत्त-चित्र है | इसी को आजकल प्यार मान लिया गया है जो महज एक आकर्षण है जिसमे एक पक्ष कभी कभी सही होता है लेकिन कम से कम एक पक्ष हमेशा समझदार खिलाडी ही होता है | फर्क इतना होता है कि खिलाड़ी जब पुरुष हो तो उसे नारी का शोषण कह दिया जाता है और खबर का शीर्षक होता है 'एक और नारी दरिंदगी की भेंट' लेकिन जब खिलाडी स्त्री होती है तो खबर का शीर्षक होता है 'आशनाई में जान दी' | जबकि दोनों दशाओं में खिलाडी को 'दरिंदा' ही कहना चाहिए | आपके इस आशिक के लिए श्रद्धांजलि स्वरुप मेरी कविता की कुछ पंक्तियाँ- लता सी लिपट के वो जिस्म में विष घोलती रही, वफ़ा की आड़ में वो सब्र मेरा तोलती रही, मैं था नादान यकीं कर लिया उसकी मोहब्बत का, वो तो कमज़र्फ थी जज़्बात से बस खेलती रही |

के द्वारा: chaatak

प्रिय अदिति, आपने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है की एक प्रतियोगिता में भाग लेते समय लोग वैसे तो एक दुसरे के प्रतिद्वंदी बन जाते हैं, पर जरुरत में हर कोई साथ होता है ! यहाँ पर मैं एक बात और कहना चाहूँगा की प्रतियोगिता को भी सभी लेखकों को इर्ष्या के भाव से लेना चाहिए "जलन" के भाव से नहीं ! इर्ष्या इस बात की होनी चाहिए की मैं भी अच्छा से अच्छा लिखूं और आगे बढूँ ! टांग खिचाई नहीं होनी चाहिए ! किसी से द्वेष भाव नहीं होना चाहिए ! यदि किसी की रचना अच्छी है तो उसे अच्छी ही कहा जाना चाहिए ! चाहे वो रचना किसी की भी हो ! बाकी जितने भी महानुभाव इस मचंह पर है सभी समझदार है ! किसी को ज्यादा कहने की आवश्यकता नहीं है ! आशा है मेरी बात को आन्यथा नहीं लेंगे ! धन्यवाद् ! राम कृष्ण खुराना

के द्वारा: R K KHURANA

आप सभी के हम बहुत ही शुक्रगुजार हैं, जिन्होंने हमारी परेशानी को अपनी परेशानी समझ कर साथ दिया और तब तक लड़ते रहे, जब तक कि बुराई हार ना जाये… तो देखिये हम सब की एकता की ताकत के आगे बुराई आखिर हार ही गई, अरे भाई उस चोर ने अपने ब्लॉग से इस मंच की रचनाएँ हटा ली है…तो अब हम खुश हैं और आप सभी भी हो जाइये….. इस मंच पर यहीं तो बात अच्छी लगती है कि एक प्रतियोगिता में भाग लेते समय लोग वैसे तो एक दुसरे के प्रतिद्वंदी बन जाते हैं, पर जरुरत में हर कोई साथ होता है….और किसी एक का दुःख सबका होता है….ये मंच एक परिवार ही है….और भगवान से प्रार्थना है कि सभी के बीच ये स्नेह हमेशा बनाये रखे… पर हम सभी को अभी कुछ काम और करने होंगे….हमें इस समस्या का ठोस उपाय सोचना पड़ेगा ताकि भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति ना हो और ये जड़ से ख़त्म हो जाये….तो चलिए मिलजुल कर कुछ सोचे…

के द्वारा: aditi kailash

के द्वारा: ashutosh kumar

पानी भी बरसेगा, इंद्र देवता हैं प्रसन्न ! इस तरह से खराब मत करो अपना मन -वाह चाचू यह बात कह के जीत लिया है अपने मेरा मन- अगली बार जब आप मेरे बारे में रब्ब से और कुछ चाहे न मांगना लेकिन एक सुन्दर मन की लड़की ज़रूर मांगना-कोई दहेज़ नहीं चाहिए-चाहे काली हो+लंगड़ी -लूली हो-अंधी-कानी हो-किसी भी जात की हो-चाहे आमिर न हो- बस आप की सेवा करने वाली हो.... उसको कही अपने अस पास ही ढूंडना अब हमसे अदावत के चक्कर में कही इतनी दूर भी ना निकल जाना की कही आप को कल को कही यह ना कहना पड़ जाये की में तो इस के हाथ का पानी भी नहीं पीना चाहता- वेसे आपकी चुनी हुई कोई भी किसी भी लड़की से मुझको कोई भी शिकायत नहीं होगी-वेसे एक बात मेरी समझ में नहीं आई में तो किसी भी दौड़ में नहीं हु-फिर आप हमसे........

के द्वारा: rajkamal

के द्वारा: aditi kailash

के द्वारा: R K KHURANA

प्रिय टीचर दीदी जी, हमने आपको टीचर इसी लिए माना है की आप से हम कुछ सीख सकें ! मेरा मकसद किसी भी प्रकार से आपको शर्मिंदा करने का नहीं है ! लेखक जो कुछ भी लिखता है उस समय उस को भी नहीं मालूम होता की यह अच्छा लिख रहा है या नहीं ! यह तो पाठक ही बताते हैं ! हर पाठक का अपना अपना विचार होता है और वोह अपने हिसाब से ही प्रतिक्रिया करता है ! एक कहानी या लेख में हर पाठक को अलग अलग चीज़ अच्छी लगती है ! मैंने एक कहानी लिखी थी "सुबह होने से पहले" उस समय तो कम्पुटर होते नहीं थे ! समाचार पत्र या पत्रिका पढ़ कर पाठक पत्र द्वारा अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते थे ! उस कहानी पर मुझे कलकत्ता के एक पाठक ने पत्र द्वारा मेरी एक लाइन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी ! उस पाठक की प्रतिक्रिया से पहले मैंने भी उस लाइन को लितना महत्व नहीं दिया था ! परन्तु उस प्रतिक्रिया के बाद मुझे भी लगा ही हाँ इस कहानी में उस लाइन का बहुत महत्व है ! खुराना

के द्वारा: R K KHURANA

प्रिय दर्शन लाल जी, आपकी जिज्ञाषा शांत करने के लिए आप को बता दूं की यह सच ही है ! औरत की मजबूरी ही है ! जिसे औरत अपनी नियत समझ कर स्वीकार कर लेती है ! पहले की औरते आज कल की तरह इतनी जागरूक नहीं थी ! उनका मानना यही था की हम जिस घर में बहु बन कर आई है यहाँ से हमारी अर्थी ही उठ कर जायगी ! आप इसे चरित्रहीन की संज्ञा देना चाहते है परन्तु नारी नियति की आगया समझ कर इसे स्वीकार कर लेती थी ! पुराने समय में जमींदारों के बारे में आपका क्या विचार है ? इस तरह की कई पिक्चरें आईं है ! जिस से यह बात साबित होती है ! आज दुनिया में हर तरह के लोग हैं ! इसके लिए केवल पुरुष ही दोषी नहीं है ! कई स्त्रियाँ भी है ! आजकल के समाचार पत्र ऐसे ख़बरों से भरे पड़े है ! माता के कुमाता होने के अनेक समाचार मिल रहे है ! आप इसे क्या कहेंगे ? आशा है आपकी जिज्ञाषा शांत हो गयी होगी ! खुराना

के द्वारा: R K Khurana

के द्वारा: darshanbaweja

प्रिय दर्शन लाल जी, मैं कभी भी किसी को आहत करने के लिए नहीं लिखता ! मेरा मकसद तो व्यंग के साथ साथ मनोरंजन करना और बढ रहे भ्रष्टाचार एवं अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का प्रयास करना मात्र है ! यदि फिर भी आप इससे आहत हुए हैं तो मुझे उसका बहुत दुःख है ! क्योंकि मैं बहस नहीं करता ! मैंने तो समाज के सच को उजागर करने का प्रयास किया है ! किसी को भी आहत करना मेरा लक्ष्य नहीं है ! आपके आहत होने से मैं जयादा आहत हुआ हूँ क्योंकि आप आहत हुए ! अभी अभी मेरी मेल में समाचार आया है जो आपको वैसे ही कापी पेस्ट कर के भेज रहा हूँ ! क्या ऐसे समाचार हमें और आपको आहत नहीं करते ? क्या यह सच नहीं है ? "मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में छायन गांव में जमीनी विवाद को लेकर एक जनजातीय व्यक्ति की दो बेटियों के निवस्त्र कर पीटे जाने का मामला सामने आया है. पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, वहीं लापरवाही बरतने वाले सहायक उपनिरीक्षक को निलंबित कर दिया गया है !" आपको मेरी अन्य रचनाये पसंद आईं और आपका मुझे सम्मान देना आपका बड़प्पन ही है ! कृपया अन्यथा न लें ! राम कृष्ण खुराना

के द्वारा: R K Khurana

प्रिय दर्शन लाल जी, हां यह पोस्ट शर्मनाक है ! ऐसी सारी घटनाएँ जो हमारे देश में, हमारे समाज में होती हैं शर्मनाक हैं ! परन्तु हम सच से मुंह नहीं मोड़ सकते ! सच बहुत कड़वा होता है ! सच कहता हूँ सच को सच मानने से इंकार कर देने से सच झूट नहीं हो जाता ! जब हमारी बहु बेटियों के साथ बलात्कार होता है तो हम शर्मसार होते हैं ! जब सरे राह कोइ किसी अबला की इज्जत पर हाथ डालता है तो हम शर्मसार होते है ! बलात्कारी एक भी हो सकता है और जयादा भी ! परन्तु सच तो कहना ही पड़ता है ! शायद आपने अपने आस पास ऐसी त्रासदी होते नहीं देखी मैं ऐसे परिवारों को जानता हूँ ! खास कर गावों में ! शहरों में भी ऐसे केस है ! असल में यह कहानी है ही ऐसी औरत की ! बाकि का ताना बाना तो इसी कहानी को कहने का उपक्रम मात्र है ! आशा है सच को स्वीकार करेंगे ! प्रतिक्रिया के लिय तहे दिल से आभारी हूँ ! राम कृष्ण खुराना

के द्वारा: R K Khurana

चाचाजी, बहुत ही अच्छे विचार हैं आपके.........आपने सुझाव मांगे थे तो टीचर दीदी इतना कहना चाहेगी कि कविता में आपने कोशिश बहुत अच्छी की है........पर कही कहीं लय टूट रहा है........आप कुछ समय इस पर चिंतन करें और कुछ शब्दों का सुधार करें या यूँ कहूँ कि हेर-फेर करें तो ये बहुत ही अच्छी हो सकती है........जैसे तो लीजिए, मेरा आवेदन पत्र कीजिए स्वीकार ! आतंकवादियों को फांसी देने के लिए मैं जल्लाद बनने को हूं तैयार ! कि जगह अगर तो लीजिए, और, कीजिए मेरा आवेदन पत्र स्वीकार ! आतंकवादियों को फांसी देने जल्लाद बनने मैं हूं तैयार ! या तो लीजिए, आवेदन पत्र मेरा स्वीकार कीजिए जल्लाद बनने हूं मैं तैयार आतंकवादियों को फांसी तो दीजिये आप इसमें भी और सुधार कर सकते हैं........इसी तरह नीचे कि पंक्तियों में भी लय कि थोड़ी समस्या है......अगर सुझाव पसंद आये तो विचार कीजिये.......

के द्वारा: aditi kailash

प्रिय टीचर दीदी, आपने पूछा था की मुझे कैसे पता चला की आप टीचिंग के प्रोफेशन में जाना चाहती है ! तो यह तो आपका लेखन बता रहा है ! आपकी भाषा-शैली बता रही है की आप में एक अच्छी अध्यापिका के गुण हैं ! बस उसको समझने वाला चाहिए ! मेरा अनुभव है तथा छटी इन्द्रिय भी ऐसा ही मानती है ! हाँ एक काम दे रहा हूँ आपको ! पता नहीं अपने मेरी अन्य रचनाएँ पढ़ी हैं या नहीं ! मैं आपसे कहना चाहता हूँ की आप मेरी सारी रचनाये पढ़े और मुझे बताये की मैंने कहाँ कहाँ गलती की है ! मेरी रचना में क्या कमी है ! आप जब मेरी एक कहानी पर क्लिक करेंगे तो पोस्ट यौर कमेन्ट के दायीं और previous /next का बटन है उसे क्लिक करके मेरी सारी रचनाये आप देख सकती है ! यदि आपके पास समय हो तो कृपया मुझे मेरी कमजोरी से अवगत कराए ! आपको धन्यवाद् देना तो बहुत हल्का शब्द हो जायगा ! आशीर्वाद ही देना चाहूँगा !

के द्वारा: R K Khurana

के द्वारा: rajkamal

के द्वारा: R K Khurana

प्रिय नेहा जी, मेरे आलेख "भगवान शंकर-महाशक्ति" के बारे में जो आपने प्रश्न पूछा है उसका उत्तर जितना मेरी समझ है मैं दे रहा हूँ ! “ॐ नमः शिवाय” का अर्थ है मैं शिव को प्रणाम करता हूँ ! मैं शिव के आगे झुकता हूँ ! यह महामंत्र कहलाता है ! यह पाच शब्दों का मंत्र है १ ॐ नम-ह शि-वाय ! यह मंत्र कहीं भी किसी के द्वारा भी पढ़ा या मनन किया जा सकता है ! इसके लिए कोइ विशेष विधि विधान नहीं है ! मन से इसका जाप करने से सब प्रकार की इच्छाएं पूरी होती हैं तथा हर प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है ! ऐसा मेरा व विद्वानों का मानना है ! मेरी जितनी समझ थी मैंने आपको बता दिया ! यदि कोइ पाठक अधिक जानकारी रखता हो तो कृपया बताने का कष्ट करें ! आभारी हूँगा ! राम कृष्ण खुराना

के द्वारा: R K Khurana

सर आपने जितनी भी जानकारी दी वो मददगार है .........अभी कुछ दिन पहले ब्लोगर पर कुछ लोगो के ब्लॉग खुलना बंद हो गए थे बल्कि कुछ लोग अपना ही ब्लॉग नहीं देख पा रहे थे तब जब पूरे सिस्टम को समझा गया तब यही नतीजा निकला की ये सब उन लोगो के साथ हो रहा है जो प्राइवेट कंपनी के इंटरनेट कनेक्शन यूस कर रहे है क्युकी कई बार प्राइवेट कंपनिया कुछ साईट बंद कर देती है ........तब जितने भी इंजीनयरो ने इस परेशानी को ठीक किया तब उनका यही कहना था की इस मामले में सभी MTNL या BSNL का इंटरनेट यूस करना चाहिए ये दोनों ही सरकारी है और ये बिना किसी वजह साईट बंद नहीं करते .............लेकिन हाँ इन दोनों को ही काम करने के थोड़ी देर बाद आराम करने की ज़रूरत होती है............

के द्वारा: soni garg

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: Ashish Jain

के द्वारा: Ashish Jain

के द्वारा: Vinod Kumar

के द्वारा: Vinod Kumar

के द्वारा: Rajan Soni

के द्वारा: Rajan Soni

के द्वारा: Jatin Kumar

के द्वारा: Pankaj Singla

के द्वारा: Surinder Singh

के द्वारा: sunny rajan

के द्वारा: शिवेंद्र मोहन सिंह

के द्वारा: ramkumar

के द्वारा: R K KHURANA

प्रिय चौरसिया जी, मेरे लेख \"भगवान शंकर - महाशक्ति\" के बारे में आपके विचार जानकर प्रसन्नता हुई ! आपने कहा है की माता पार्वती पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं फिर वो पर्वत को बेटा कैसे कह सकती है ! तो मैं आपकी बात ही बड़ी करता हूँ. ! माता पार्वती हिमालय पर्वत की पुत्री हैं ! केवल पर्वत की नहीं ! अर्थात हर पर्वत की नहीं ! माता पार्वती भी तो एक ;पुरुष शंकर भगवान् की पत्नी हैं वहीँ वे गणेश जी व कार्तिक जी की माँ भी है ! गणेश जी व कार्तिक जी भी तो पुरुष हैं ! दूसरी बात जहाँ तक मेरी जानकारी है तो मैं आपको बता दूं की हिमालय पर्वत के साथ कोइ भी समुद्र नहीं है ! हाँ ! आपने पूछा है के मैंने यह सन्दर्भ कहाँ से लिया ! लगभग 30 वर्ष पहले की बात है मेरे पिताजी को कैंसर हो गया था ! उनका इलाज वैसे तो पी जी आई चंडीगढ़ में चल रहा था ! तभी किसी ने मुझे बताया की अम्बाला में एक सज्जन हैं जो चुम्बक से रोगों का इलाज करते हैं ! उनके पास कैंसर का भी इलाज है ! मैं पिताजी को लेकर अम्बाला गया तथा उन सज्जन से मिला ! उन्होंने चुम्बक से इलाज शुरू कर दिया ! मुझे लगभग ६-७ दिन वहां रहना पड़ा ! खैर पिताजी स्वस्थ तो नहीं हो पाए तथा १९८६ में उनका स्वर्गवास हो गया ! वह सज्जन शंकर भवान जी के परम भक्त थे ! यह कथा उन्होंने ने ही मुझे सुनाई थी ! मैंने यह भी नोट किया की वे यह कथा हर किसी को सुनाते थे ! मैं आपको एक बात और बता दूं की उस दौरान उन्होंने मुझे ही यह कथा ३-४ बार सुनाई थी ! पिछले दिनों पूजा करते समय मैं ॐ नमो शिवाय की माला का जप कर रहा था तो अचानक मेरे दिमाग में यह कथा कौंध गयी ! मैं कुछ दिनों तक उस कथा का स्मरण और मनन करता रहा फिर सोचा शंकर भगवान् की महिमा का वर्णन ब्लॉग पर भी कर दिया जाय ! मैंने उस कथा को अपनी टूटी-फूटी भाषा में पिरोने का प्रयास किया है ! सबसे बड़ी बात जैसे की आप भी मानते है की शंकर भगवान् देवाधिदेव हैं ! यह सारी कडिया उनको महाशक्ति सिद्ध करने के लिए ही तो पिरोई गयी हैं ! मुख्य उधेश्य तो भगवान् शंकर को महाशक्ति कहना है ! न मानने वाले तो यह भी कहते हैं की हाथी का सर किसी मनुष्य पर लगाना मेडिकल साईंस में संभव ही नहीं है ! आप सरिता को पढ़ लीजिये वो तो इन बातों को अन्धविश्वास का नाम देते हैं ! लेकिन मैंने इन कथाओ को कभी भी आलोचनात्मक द्रष्टि से नहीं देखा ! भगवान् की महिमा गाने में विश्वास रखा है ! बाकी आपकी श्रधा ! आपने इतना खोज कर के टिपण्णी की मैं गदगद हो गया ! मैं आपका तहे दिल से धन्यवाद् करता हूँ ! राम कृष्ण खुराना

के द्वारा: R K KHURANA

सर जी नमस्कार, आपकी कहानी अत्यंत रोचक एवं शिक्षाप्रद है. भगवान् शंकर तो देवताओं के भी देव हैं ,उनकी महिमा अपरम्पार है. मैं एक biotech का स्टुडेंट हूँ और इस सृष्टि का प्रथम Biotechnologist मैं भगवान् शंकर को ही मानता हूँ क्यूंकि अभी तक मनुष्य के सिर पर हाथी का सिर, और कभी बकरी का सिर उन्होंने ही लगाया है और इस तरह के और भी बहुत से प्रयोग उन्होंने ही किये हैं जो आज के वैज्ञानिकों के लिए अभी तक संभव नहीं हो सका है. आपने इस कहानी का सन्दर्भ कहाँ से लिया है ? क्योंकि जहाँ तक मुझे जानकारी है माता पार्वती तो पर्वतराज हिमालय की पुत्री थीं और आपने इस काहानी में लिखा है ( पार्वती जी पर्वत के पास जाकर बोली –“पर्वत बेटा, मैने सुना है कि तुम बहुत बलशाली हो !”) ये कैसे संभव है की माता पार्वती अपने पिता को ही बेटा कहकर संबोधित करें. कृपया मेरी जिज्ञ शांत करने की कृपा करियेगा. धन्यवाद. आपका ही -शार्देश

के द्वारा: shaardeshkchaurasia

के द्वारा: jack

आपके ब्लॉग को पढ़ कर, अभी कुछ दिनों पहले पढ़ी मेल याद आ गई, लीजिये प्रस्तुत है: एक शराबी फुल टाईट होकर घर जा रहा था. रास्ते में एक मंदिर के बाहर पुजारी दिखा.: शराबी ने पुजारी से पूछा, सबसे बड़ा कौन? पुजारी ने पीछा छुड़ाने के लिए कहा मंदिर बड़ा. शराबी बोला मंदिर बड़ा तो धरती पे कैसे खड़ा? पुजारी: मेरे बाप धरती बड़ी. शराबी: धरती बड़ी तो शेषनाग पे क्यूँ खड़ी? पुजारी: शेषनाग बड़ा. शराबी: शेषनाग बड़ा तो शिव के गले में क्यों पड़ा? पुजारी: शिव बड़ा. शराबी: शिव बड़ा तो पर्बत पर क्यों खड़ा? पुजारी: पर्बत बड़ा. शराबी: पर्बत बड़ा तो हनुमान की ऊँगली पे क्यों पड़ा? पुजारी: हनुमान बड़ा. शराबी: हनुमान बड़ा तो राम के चरणों में क्यों पड़ा? पुजारी: राम बड़ा. शराबी: राम बड़ा तो रावण के पीछे क्यूँ पड़ा? पुजारी: अरे मेरे बाप तू बता कौन बड़ा? शराबी: इस दुनिया में वो बड़ा, जो पूरी बोतल पी के अपनी टांगो पे खड़ा.

के द्वारा: शिवेंद्र मोहन सिंह

के द्वारा: Jholi Baba

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: sday

के द्वारा: Gautam

के द्वारा: Ravi

के द्वारा: Gautam

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: शिवेंद्र मोहन सिंह

के द्वारा: prashant singh

प्रिय मनोज जी, आपकी प्रतिक्रिया का धन्यवाद् ! असल में मैं यह मानता हूँ की व्यंग तभी सार्थक होता है जब उसको पढने के पश्चात् दिल में कुछ-कुछ दर्द सा होने लगे ! कुछ ऐसा महसूस हो की - हाँ यार - कहीं न कहीं कुछ कमी है या कुछ ऐसा घट रहा है जो नहीं होना चाहिए ! व्यंग एक सशक्त हथियार (माध्यम) है ! जिसके द्वारा हम अपने दिल की भड़ास निकल सकते हैं ! वैसे तो हम कुछ कर नहीं पाते क्योंकि हमारी व्यवस्था ही ऐसी है की हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते ! तो इसी बहाने सही ! यह मेरा मानना है ! मैं गलत भी हो सकता हूँ ! आप जैसे सुधि मित्रों की प्रतिक्रिया का मुझे हमेशा इंतजार रहता है ! प्रतिक्रियायों से हम जैसे अदना लोग बहुत कुछ सीखते हैं ! मेरे अन्य लेख भी छपे हैं यदि समय निकल सकें तो उन पर भी आपकी प्रतिक्रिया की प्रितिक्षा रहेगी १ एक बार फिर आपका धन्यवाद् करना चाहूँगा ! स्नेह बनाये रखें ! खुराना

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: ASHISH RAJVANSHI

के द्वारा: महेश

के द्वारा: agastee

प्रणाम सर, "पुराने चावल" की दाद यूँ ही नहीं दी जाती और आपने तो यह साबित कर ही रखा है | कुल १५ वाक्यों और ५० शब्दों में आपने अपने देश में होने वाले 'बाहरी निवेश' के दुर्प्रभाव को बखूबी वर्णित किया है | 'काले धन' का जनहित में इससे बेहतर उपयोग और क्या हो सकता है ? परन्तु हमारे देश के लोग यह नहीं समझ पाते की वो किस दलदल में फंसने जा रहे हैं , जहाँ से निकल पाना असम्भव हो जाता है | प्राइवेट सेक्टर की बैंकों ने भारतियों की अनुचित इच्छाओं और लालसाओं को बढ़ावा दिया और अपना उल्लू सीधा किया और कर रहें हैं | कम ब्याज दरों का लालच दिया गया और मनमानी EMI को लागू किया गया | फंसा बेचारा ऋणी, पहले कर्ज से ऐसा दबा की दुसरे लोन के लिए फिर पहुँच गया ऐसी "दुकानों" पर , जहाँ फिर से वोही प्रलोभन जो पहले कर्ज के समय मिला था या फिर उससे भी बड़ा , आखिर competition का दौर है कोई भला किसी से पीछे क्यों रहे | अगर हम अब भी न चेते तो भगवान ही मालिक है | यही कारण है की मेरे पिताजी , एक राष्ट्रीकृत बैंक के वरिष्ट अधिकारी होते हुए भी कभी किसी को लोन लेने की 'नेक' सलाह नहीं देते | भले ही कोई उन्हें बुरा ही क्यों न कहे | सर, आपके 'जनहित में जारी' इस लेख का तहे-दिल से शुक्रिया | धन्यवाद |

के द्वारा: ASHISH RAJVANSHI




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